दिवालिया मामलों को लेकर नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। NCLAT ने कहा कि अगर कोई नियोक्ता या कंपनी अपने कर्मचारियों के लिए अलग से PF और ग्रेच्युटी फंड मेंटेन नहीं भी करती है, तो भी कंपनी बंद या दिवालिया होने पर उससे जुड़े कर्मचारियों को अपने पूरे पीएफ और ग्रेच्युटी का पूरा पैसा मिलेगा।
नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने जेट एयरवेज के सैकड़ों पूर्व कर्मचारियों के इन कानूनी बकायों को एयरलाइन की लिक्विडेशन एस्टेट (संपत्ति) से अलग पाने के अधिकार को सुरक्षित रखते हुए SBI और अन्य फाइनेंशियल क्रेडिटर्स की अपीलों को खारिज कर दिया।
NCLAT ने कहा कि कर्मचारी अपना पूरा प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का बकाया पाने के हकदार हैं, भले ही उनके एम्प्लॉयर ने प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी के लिए अलग अकाउंट न बनाए हों। इसे वैधानिक बकाया कंपनी की परिसमापन संपत्ति का हिस्सा नहीं माना जाएगा और कर्मचारियों को इसका भुगतान करना होगा।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, यह विवाद नवंबर 2024 में शुरू हुआ, जब जलान-फ्रिट्श कंसोर्टियम का रेजोल्यूशन प्लान फेल होने के बाद जेट एयरवेज लिक्विडेशन में चली गई। इसमें काम करने वाले कर्मचारियों का तर्क था कि उनका प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का बकाया इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 36(4)(a)(iii) के तहत लिक्विडेशन एस्टेट का हिस्सा नहीं होना चाहिए।
लेकिन लेंडर्स का कहना था कि ऐसी सुरक्षा तभी लागू होती है जब लिक्विडेशन शुरू होने की तारीख पर अलग प्रोविडेंट फंड या ग्रेच्युटी फंड मौजूद हों।
लेंडर्स की दलील को खारिज करते हुए, NCLAT ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के फरवरी के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें लिक्विडेटर को लिक्विडेशन एस्टेट से बाहर ये बकाया चुकाने का निर्देश दिया गया था।
लिक्विडेशन एस्टेट का हिस्सा नहीं है बकाया
NCLAT ने फैसला सुनाते हुए कहा, “लिक्विडेटर कर्मचारियों को प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी का बकाया चुकाने के लिए जिम्मेदार है, जैसा कि एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स एक्ट, 1952 और पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के प्रावधानों के तहत देय है, और ऐसा बकाया लिक्विडेशन एस्टेट का हिस्सा नहीं होगा।”
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने कर्मचारियों की उस मांग को अस्वीकार कर दिया है, जिसमें जनवरी से मार्च 2019 तक के वेतन बकाये के लिए डिप्टी लेबर कमिश्नर द्वारा जारी रिकवरी सर्टिफिकेट को लिक्विडेशन एस्टेट से बाहर रखने को कहा गया था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि वेतन के इन दावों को कर्मचारियों के बकाये पर लागू होने वाले IBC के वॉटरफॉल मैकेनिज्म के तहत निपटाया जाना चाहिए।
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