हिंदू धर्म में शनि देव को ‘न्याय का देवता’ माना जाता है। बहुत से लोग उनसे डरते हैं, लेकिन असल में शनि देव बुरे नहीं, बल्कि हमारे कर्मों का हिसाब रखने वाले देवता हैं। उनकी व्रत कथा हमें धैर्य और अहंकार से दूर रहने की सीख देती है।
अक्सर हम अपनी सफलता और शक्ति के नशे में यह भूल जाते हैं कि समय कभी भी बदल सकता है। शनि देव की व्रत कथा भी एक ऐसे ही प्रतापी राजा ‘विक्रमादित्य’ की कहानी है, जिनका अहंकार शनि देव के एक फैसले ने चूर-चूर कर दिया था।
शनिवार व्रत कथा
एक समय स्वर्गलोक में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि नौ ग्रहों में से सबसे बड़ा कौन है। यह विवाद इतना आगे चला गया कि यह एक युद्ध की स्थिति बन गई। इस बात के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुंच गए। उन्होंने कहा, ‘हे देवराज! अब आप ही निर्णय करें कि हम सब में से बड़ा कौन है।
देवताओें द्वारा पूछा गए सवाल से देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए। इंद्र देव ने कहा कि मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता हूं। मैं असमर्थ हूं। इस सवाल का जवाब पाने के लिए वो सभी पृथ्वीलोक में उज्जयिनी नगरी के राजा विक्रमादित्य के पास गए।
राजा विक्रमादित्य के महल पहुंचकर सभी देवताओं ने प्रश्न किया। इस पर राजा विक्रमादित्य भी असमंजस में पड़ गए। वो सोच रहे थे कि सभी के पास अपनी-अपनी शक्तियां हैं जिसके चलते वो महान हैं। अगर किसी को छोटा या बड़ा कहा गया तो उन्हें क्रोध के कारण काफी हानि हो सकती है। इसी बीच राजा को एक तरीका सूझा।
उन्होंने 9 तरह की धातु बनवाई जिसमें स्वर्ण, रजत (चांदी), कांसा, ताम्र (तांबा), सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे शामिल थे। राज ने सभी धातुओं को एक-एक आसन के पीछे रख दिया। इसके बाद उन्होंने सभी देवताओें को सिंहासन पर बैठने के लिए कहा। धातुओं के गुणों के अनुसार, सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवाकर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा।
जब सभी देवताओं ने अपना-अपना आसन ग्रहण कर लिया तब राजा विक्रमादित्य ने कहा- ‘इस बात का निर्णया हो चुका है। जो सबसे पहले सिंहासन पर बैठा है वही बड़ा है।’ यह देखकर शनि देवता बहुत नाराज हुए उन्होंने कहा, ‘राजा विक्रमादित्य! यह मेरा अपमान है। तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाया है। मैं तुम्हारा विनाश कर दूंगा। तुम मेरी शक्तियों को नहीं जानते हो।’
शनि ने कहा- ‘एक राशि पर सूर्य एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं। लेकिन मैं किसी भी राशि पर साढ़े सात वर्ष रहता हूं। मैंने अपने प्रकोप से बड़े-बड़े देवताओं को पीड़ित किया है। वो मेरा ही प्रकोप था कि राम को वन में जाकर रहना पड़ा था क्योंकि उनपर साढ़े साती थी। रावण की मृत्यु भी इसी कारण हुई। अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच पाएगा। शनिदेव ने बेहद क्रोध में वहां से विदा ली। वहीं, बाकी के देवता खुशी-खुशी वहां से चले गए।
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