किशोरों और युवाओं में बर्दाश्त करने की क्षमता कम हो रही है। जरा सी बात पर वे अवसाद में आ जाते हैं। आवेगी निर्णय पर भी नियंत्रण नहीं रख पाते और घातक कदम उठा लेते हैं। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के बाल एवं किशोरावस्था क्लीनिक में ऐसे मामले लगातार आ रहे हैं। मनोरोगियों के हिस्ट्री से पता चला है कि इसके लिए दुलार भरी पैरेंटिंग भी जिम्मेदार है।
हर चीज तुरंत सुलभ होने पर वे कोई अनचाही घटना होने पर तनाव में आ जाते हैं। किशोरों और युवाओं के बदलते पर मिजाज पर जो अध्ययन किया गया है, उसमें हर एक मामले में मोबाइल की स्क्रीन का दखल भी मिला है। मनोरोग प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय चौधरी का कहना है कि संयुक्त परिवार टूटने और एकाकी परिवार होने से मां-बाप दुलार में बच्चों की हर बात जल्दी मान लेते हैं।
डेढ़ साल में ओपीडी में 250 रोगी आए
किसी एक बात के इनकार पर उनमें क्रोध भर जाता है। इस क्रोध से बर्दाश्त की क्षमता कम हो गई है। इसके अलावा स्क्रीन इसे और बढ़ा रहा है। गेमिंग में मारधाड़ देखते हैं। यह भी उनमें आवेगी प्रवृत्ति बढ़ाने लगता है। ऐसे बच्चों की फ्रेंड सर्किल विस्तृत नहीं होती। अब उन्हें दादा-नानी की दंत कथाएं कोई नहीं सुनाता। साइकेट्रिस्ट डॉ. कृतिका चावला ने बताया कि डेढ़ साल में ओपीडी में 250 रोगी आए हैं। इनका आयु वर्ग पांच साल से 17 वर्ष रहा है।
ये भी हैं कारण
एक बच्चा होना, सभी का उस पर फोकस रहना।
30 सेकंड की रील देखकर कम धैर्य का माइंडसेट बनना।
ऑनलाइन तुरंत सवाल का जवाब मिला, इससे सब्र घटता है।
एआई आदि से गलत सूचना मिल जाना।
आत्मसम्मान को जल्दी चोट पहुंचना।
दोस्तों की सर्किल का दायरा सिमट जाना।
भावनात्मक रूप से संतुष्ट न रहना।
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