इंदौर का अधूरा टूटा बीआरटीएस अब नगर निगम के लिए परेशानी की वजह बनता जा रहा है। ठेकेदार ने फायदा न होने के चक्कर में काम छोड़ दिया है और नए ठेकेदार राजी नहीं हैं। इस कारण अब बीआरटीएस नगर निगम ने खुद तोड़ने का फैसला लिया है।
दरअसल प्रदेश सरकार के फैसले के बाद दस माह पहले नगर निगम ने ही हाईकोर्ट से बीआरटीएस तोड़ने की अनुमति मांगी थी और यह कहा था कि बीआरटीएस के चौराहों पर आठ ब्रिज बनाए जाना हैं। कोर्ट ने अनुमति दे दी, लेकिन दस माह बाद भी बीआरटीएस की रेलिंग और बस स्टेशन नहीं टूट पाए हैं।
हाईकोर्ट की अनुमति मिलने के बाद नगर निगम ने बीआरटीएस में लगे सामान की कीमत तीन करोड़ रुपये आंकी थी और इसके टेंडर जारी किए थे, लेकिन किसी एजेंसी ने इस काम में हाथ नहीं डाला। इसके बाद कीमत कम कर टेंडर आंके गए और बीआरटीएस तोड़े जाने से निगम को होने वाली ढाई करोड़ की आय को देखते हुए एक ठेकेदार के टेंडर को मंजूरी दी गई, लेकिन ठेकेदार को उसमें भी फायदा नहीं हुआ और वह काम छोड़कर चला गया।
वर्षभर में बीआरटीएस को लेकर हुई सुनवाई में बीआरटीएस नहीं तोड़े जाने का मामला उठता रहा। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अफसरों को यह तक कह दिया कि कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। उससे पहले भी कोर्ट कह चुका है कि मकानों के निर्माण तोड़ने में निगम को दो-तीन दिन भी नहीं लगते, बीआरटीएस तोड़ने में इतना समय क्यों लग रहा है। कोर्ट ने इसके लिए एक कमेटी गठित की है। कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट कोर्ट के सौंप दी। जिसमें कहा गया है कि एक स्टेशन तोड़ने में दस माह का समय लग गया। रैलिगं भी एक तरफ के हटाए गए।
आपको बता दें कि ढाई सौ करोड़ की लागत से इंदौर में निरंजनपुर से राजीव गांधी प्रतिमा तक साढ़े 11 किलोमीटर लंबा बीआरटीएस तैयार किया गया था। इसके लिए 300 से ज्यादा निर्माण और दो हजार से ज्यादा पेड़ काटे गए थे, लेकिन पिछले साल मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बीआरटीएस तोड़ने की घोषणा की थी।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal