यमुना के सफाई अभियान को फिर लगा ब्रेक, रुकावट दूर करने के लिए जांच टीम ने एनजीटी से लगाई गुहार

दिल्ली में यमुना नदी की सफाई को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। लंबे समय से चल रही यमुना को साफ करने की कोशिशें अब एक नई रुकावट में फंस गई हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देश पर आईआईटी दिल्ली की एक विशेषज्ञ टीम को दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स में लगे यूवी सिस्टम की जांच करनी थी, ताकि यह पता चल सके कि गंदे पानी में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया को सही तरीके से खत्म किया जा रहा है या नहीं।

लेकिन, हैरानी की बात यह है कि जांच टीम को अब तक न तो जरूरी आंकड़े मिले हैं, न ही प्लांट्स में प्रवेश की अनुमति और न ही तकनीकी सहयोग। मजबूर होकर आईआईटी की टीम ने एनजीटी से शिकायत की है कि इन बुनियादी सुविधाओं के बिना जांच पूरी करना संभव नहीं है। मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि यमुना पहले से ही अत्यधिक प्रदूषण, बदबू और बैक्टीरिया की समस्या से जूझ रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जांच में हो रही यह देरी यमुना की सेहत के लिए और खतरा पैदा कर सकती है। अगर समय रहते एसटीपी की खामियों को नहीं सुधारा गया, तो नदी की हालत और बिगड़ सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब खुद अदालत के आदेश पर जांच होनी है, तो फिर जरूरी सहयोग क्यों नहीं दिया जा रहा।

यमुना की सफाई की दिशा में यह रुकावट अब प्रशासनिक लापरवाही पर भी सवाल खड़े कर रही है। यह मामला फरवरी 2024 में एक मीडिया रिपोर्ट से शुरू हुआ, जिसमें बताया गया था कि दिल्ली के 75 फीसदी एसटीपी बैक्टीरिया जैसे फीकल कोलीफॉर्म को ठीक से साफ नहीं कर पा रहे, जिससे यमुना में बदबू और प्रदूषण बढ़ रहा है। एनजीटी ने खुद ही इस पर संज्ञान लिया और अगस्त 2025 में आईआईटी दिल्ली को जांच सौंपी।

यूवी (अल्ट्रावायलेट) सिस्टम की जांच के हैं निर्देश
(एनजीटी) ने आईआईटी दिल्ली की सिविल इंजीनियरिंग विभाग की विशेषज्ञ टीम को निर्देश दिया था। इसमें दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) में लगे यूवी (अल्ट्रावायलेट) सिस्टम की जांच करें और यह पता लगाएं कि पानी में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया, विशेषकर फीकल कोलीफॉर्म, कितनी कुशलता से नष्ट हो रहे हैं। आईआईटी की टीम में प्रोफेसर एके मित्तल (हेड), अरुण कुमार, वी आर्या और सोविक दास शामिल हैं। उन्होंने कहा है कि वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार करने के लिए उन्हें एसटीपी का दौरा करना, पानी के सैंपल लेना और डाटा प्राप्त करना जरूरी है। लेकिन टीम अब तक डाटा, प्लांट्स में प्रवेश और लॉजिस्टिक सहायता नहीं पा सकी है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की जुलाई 2025 की रिपोर्ट और एसटीपी के इनलेट-आउटलेट डाटा अभी तक नहीं मिले हैं।

फंड व सपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देशों के बावजूद सहयोग नहीं
आईआईटी की रिपोर्ट के अनुसार, हर प्लांट के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने और फंड व सपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देशों के बावजूद कोई सहयोग नहीं हुआ। टीम ने इस संबंध में कई पत्र लिखे हैं, जिनकी तारीखें 18 सितंबर, 26 सितंबर, 27 अक्तूबर और 3 दिसंबर 2025 हैं, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि बिना इन संसाधनों के रिपोर्ट तैयार करना संभव नहीं है। एनजीटी ने 11 नवंबर 2025 को डीजेबी और डीपीसीसी को रिमाइंडर भेजा और अगली सुनवाई 23 दिसंबर 2025 के लिए निर्धारित की।

दिल्ली में हैं कुल 37 एसटीपी
दिल्ली में कुल 37 एसटीपी हैं, जिनमें से 11 में क्लोरीनेशन सिस्टम, 14 में यूवी और बाकी में मिक्स्ड सिस्टम लगे हैं। डीपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से 14 एसटीपी बैक्टीरिया मानकों पर फेल हैं। यूवी सिस्टम की प्रभावशीलता पानी की गुणवत्ता और ट्रीटमेंट प्रक्रिया पर निर्भर करती है, लेकिन इसके लिए आवश्यक ठोस डाटा नहीं मिलने से टीम सही मूल्यांकन नहीं कर पा रही है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 75 प्रतिशत एसटीपी फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया से निपटने के लिए पर्याप्त सक्षम नहीं हैं, जिससे यमुना की स्थिति गंभीर बनी हुई है।

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