16 मई, 2014. आम चुनावों के बाद मतगणना का दिन. जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया वैसे-वैसे हिंदुस्तान की सियासी तारीख बदलती गई. पहली बार बीजेपी अपने दम से स्पष्ट बहुमत के साथ सियासी फलक पर उभरी. इस जीत के नायक बने नरेंद्र मोदी. उस मोदी लहर के बाद से पूरे देश में पीएम मोदी की लोकप्रियता में इजाफा ही होता गया है. भारतीय राजनीति में यह अपनी किस्म का विरला अनुभव है जब किसी लहर पर सवार होकर कोई राजनेता प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठा हो और तीन साल सत्ता में रहने के बाद भी उसकी चमक बरकरार हो.

इसकी बानगी इस बात से समझी जा सकती है कि 2014 के बाद से बीजेपी लगातार एक के बाद दूसरे महत्वपूर्ण राज्य जीतती जा रही है. यानी स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों के भरोसे में कोई गिरावट नहीं दर्ज की गई है. स्वच्छ भारत अभियान, शौचालयों का निर्माण, उज्ज्वला योजना, जनधन योजना, डिजिधन योजना, डिजिटल क्रांति, फसल बीमा योजना और मृदा (सोइल) कार्ड जैसी योजनाओं को अमजीजामा पहनाया गया तो नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे साहसिक फैसले लिए गए.
आगे की राह
हालांकि सरकार की कई योजनाएं लोकप्रिय हुई हैं लेकिन जानकारों के मुताबिक रोजगार सृजन के मामले में सरकार अभी तक अपने वायदों की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है. सुकमा में हाल में 25 सुरक्षाबल शहीद हो गए. कश्मीर का मसला गंभीर बना हुआ है. इन सब मोर्चों पर सरकार को ठोस कदम उठाने हैं. अपने बाकी बचे कार्यकाल में इन चुनौतियों से निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है.
कमजोर विपक्ष
इस दौर में एक बड़ी बात यह भी रही है कि विपक्ष की तरफ से पीएम मोदी को चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं उभर पाया है. कांग्रेस अभी अच्छी स्थिति में नहीं है. विपक्ष सरकार को घेरने लायक मुद्दे भी नहीं उठा पाया है. इन मौजूदा परिस्थितियों में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन तैयार करने और नेता चुनने की है.
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