सुबह उठने के बाद जोड़ों में जकड़न महसूस होती है या दिनभर जोड़ों में दर्द महसूस होता रहता है, तो यह सामान्य चीज नहीं बल्कि रुमेटाइड अर्थराइटिस हो सकता है। विटामिन की कमी या अधिक कामकाज का प्रभाव मानकर इसे अनदेखा कर रहे हैं, तो संभव है ये लक्षण समय के साथ और गंभीर हो जाएं।
यह सही है कि उम्र बढ़ने के साथ घुटनों के दर्द, कूल्हों में अकड़न या शरीर के निचले हिस्से की कमजोरी सामान्य मानी जाती थी। लेकिन अब ये समस्याएं कम उम्र के लोगों में भी देखने में आने लगी हैं। खासकर, महिलाएं इससे अधिक पीड़ित रहती हैं। अगर आप शारीरिक रूप से सक्रिय रहते हैं, चाहे वह टहलने की आदत हो या योग व्यायाम आदि का अभ्यास, तो आप जीवनशैली की अनेक तरह की बीमारियों से बचे रहते हैं।
गठिया जैसी आटोइम्यून विकार के शारीरिक सक्रियता को बेहद महत्वपूर्ण है। यूं कहें कि यदि अपनी दिनचर्या में उचित खानपान के साथ फिजिकल एक्टिविटी का भी ध्यान रखें, तो गठिया और उससे होने वाली तकलीफ को काफी हद तक नियंत्रित कर सकते हैं।
क्या होता है आटोइम्यून विकार?
पर्यावरण प्रदूषण और अनियमित जीवनशैली ने आटोइम्यून विकारों को बढ़ावा दिया है। हालांकि, गठिया में 30 से 40 प्रतिशत कारक जीन होता है। बाहरी कारकों जैसे, प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी (आटोइम्यून रोग), धूमपान व खराब जीवनशैली, कुछ संक्रमण आदि भी इसमें जिम्मेदार होते हैं।
बता दें कि स्वस्थ शरीर अपनी कोशिकाओं और ऊतकों को नुकसान पहुंचाने वाले वायरस या बैक्टीरिया की पहचान कर लेते हैं। इसे सेल्फ टालरेंस कहा जाता है। इसके उलट हमारा शरीर बाहरी कारकों के प्रभाव में आकर अपने ही कोशिकाओं पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट करने या उन्हें शरीर से बाहर निकालने लगता है। इससे सूजन पैदा होती है और आटोइम्यून विकार यानी गठिया जैसे रोगों का कारण बनते हैं।
घुटनों में सक्रियता लाने का करें प्रयास
लंबे समय तक बैठे रहने वाली दिनचर्या के चलते घुटनों से जुड़ी समस्याएं हो रही हैं। ऐसे में घुटनों को मोड़ने का अभ्यास कारगर है। इससे घुटने और कूल्हे के जोड़ मजबूत बनते हैं। साथ ही, इस तरह के अभ्यास से शरीर का संतुलन भी बेहतर होता है। चलने, बैठने व खड़े होने के साथ आप आसानी से सीढ़ियां चढ़ सकते हैं।
दरअसल, इस वर्ष योग दिवस का विषय रहा ‘हेल्दी एजिंग के लिए योग’ के साथ आयुष मंत्रालय ने ‘नी मूवमेंट’ योग अभ्यास का भी उल्लेख किया है।
सूजन बढ़ाने वाले आहार से बचें
अधिक तले-भूने आहार।
चीनी और रिफाइंड कार्ब्स।
शराब व तंबाकू का सेवन
नमक और प्रिजर्वेटिव वाले खाद्य पदार्थ आदि।
खानपान में रखें ध्यान
जोड़ों के दर्द में अमा बढ़ाने वाली चीजें जैसे, दही और इससे से बनी चीजें, नींबू का सेवन कम करने की सलाह दी गई है।
रुमेटाइड आर्थराइटिस में गोभी, बैंगन के बजाय हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चहिए।
केवल गेहूं की रोटी के बजाय हर दिन रागी, जौ, ज्वार आदि का प्रयोग बेहतर रहता है।
मूंग व तुअर का दाल अच्छा है। दाल अधिक गाढ़ी न रखें। छिलके वाली दाल का प्रयोग करें।
मटर और बींस वसा रहित होते हैं। इनमें एंटीआक्सीडेंट्स होते हैं और फोलिक एसिड, मैग्नीशियम, आयरन और जिंक से भरपूर होते हैं।
रिफाइंड अनाज की तुलना में साबुत अनाज का प्रयोग अधिक करें।
थेरेपी है एक बेहतर उपाय
जोड़ों के दर्द और सूजन से राहत मिलती है।
इससे दैनिक सक्रियता बढ़ती है।
बीमारी बढ़ने की गति को धीमा कर देती है।
जोड़ों पर दवाब और नुकसान कम होता है।
इन बातों का रहे ध्यान
शारीरिक सक्रियता और स्वस्थ आहार का ध्यान रखना आवश्यक है।
तनाव का प्रबंधन बहुत जरूरी है। टहलना, प्राणायाम और संगीत का सहारा ले सकते हैं।
खानपान ऐसा हो कि वजन नियंत्रित रहे। मोटापे के चलते पीठ, घुटनों और जोड़ों पर दबाव बढ़ता है।
अगर जोड़ों में दर्द और जकड़न बनी रहती है, काम करने में दिक्कत आ रही है, दर्द के साथ लाल धब्बे बन रहे हैं तो तुरंत डाक्टर से मिलें।
दवा से न करें समझौता
डॉ. उमा कुमार (विभागाध्यक्ष, रुमेटोलाजी, एम्स, नई दिल्ली) कहती हैं कि गठिया के साथ मरीज दूसरी बीमारियां भी झेल रहा है तो परेशानी और भी जटिल हो जाती है। गठिया केवल शारीरिक दर्द ही नहीं देता, बल्कि इससे मानसिक सेहत भी प्रभावित होती है। चिंता, अवसाद गठिया के प्रबंधन को मुश्किल बना सकते हैं। एम्स, दिल्ली के विशेषज्ञों ने शोध में पाया है कि नियमित शारीरिक सक्रियता और योग आदि उपायों से जोड़ों में लचक बढ़ती है, मांसपेशियां मजबूत बनती हैं। साथ ही तनाव से भी राहत मिलती है। हालांकि, दवाइयों से समझौता नहीं करना है। यह समझना है कि सक्रियता बढ़ाएं, तो दवाओं का प्रभाव बेहतर होता है।
समय पर निदान, होगा समाधान
प्रो. शालिनी मिश्रा (स्वस्थ वृत्ति व योग विभाग, आयुर्वेद एवं अनुसंधान संस्थान, जामनगर) बताती हैं कि अक्सर लोग इस समस्या को पहचानने में लापरवाही कर देते हैं। अगर सुबह उठते समय आपको जकड़न महसूस होती है, तो यह गठिया का शुरुआती लक्षण भी हो सकता है। ऐसे में दिनचर्या में सुधार जैसे छोटे उपाय तो शुरू ही कर देने चाहिए। दर्द अधिक है और आप कसरत नहीं कर रहे हैं, तो भी शरीर में सक्रियता लाने का प्रयास करते रहें। केवल सूक्ष्म व्यायाम से भी आप फर्क महसूस करेंगे।
आपको भ्रामरी, उज्जयी आदि का भी अभ्यास करना चाहिए। आपको शारीरिक स्थिति के अनुसार, खानपान और दिनचर्या में भी सुधार करना चाहिए। खासकर, जिन महिलाओं को जल्दी मेनोपॉज होता है, वे विशेष ध्यान रखें कि डॉक्टर के परामर्श से कैल्शियम लेते रहें। खाली दूध अच्छा नहीं लगता तो उसका स्वाद बढ़ा कर सेवन किया जा सकता है। सोने जागने का एक समय तय रखें। अन्यथा शरीर से जहरीले पदार्थ जमा होने लगते हैं। ये अमा के रूप में जोड़ों में सूजन और दर्द पैदा करते हैं।
बलगम से बचना होगा
डॉ. एम फारुक (आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बिया कालेज एवं अस्पताल, नई दिल्ली) ते मुताबिक यूनानी पद्धति में यह मान्यता है कि बीमारियों का प्रमुख कारण अखलात होते हैं। हम जो कुछ भी खाते हैं उनसे चार प्रकार के अखलात बनते हैं-दम, बलगम, सफरा व सौदा। रुमेटाइड आर्थराइटिस यानी गठिया का कारण बलगम होता है। खराब खानपान जैसे अनेक कारण इसमें जिम्मेदार होते हैं। प्रयास करें कि अपना आहार संतुलन में रखें। ध्यान रखें कि अगर आप शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं तो बलगम तेजी से फैलता है और जोड़ों में जाकर जमा होने लगता है। जो इसके मरीज हैं, वे वादी चीजें जैसे, अरबी, शकरकंद, बैंगन आदि यहां तक कि आलू भी कम से कम खाएं। कब्ज की समस्या से बचने का उपाय करें।
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