लाल आतंक पर अंतिम प्रहार: संयुक्त मध्य प्रदेश में 38 साल की दहशत का हुआ अंत

मध्य प्रदेश के बालाघाट, मंडला और डिंडौरी के घने जंगलों की खामोशी में गोलियों की गूंज सुनाई देती थी। दिन हो या रात, गांवों की पगडंडियां हों या शहर की सड़कें, पुलिसकर्मी हों या आमजन, हर पल एक ही डर सताता रहता था कि कहीं माओवादियों का निशाना न बन जाएं।

संयुक्त मध्य प्रदेश के वे दिन आज इतिहास बनते जा रहे हैं, जब माओवादी समस्या ने 1988 से 1990 के बीच अपनी जड़ें जमाई और देखते ही देखते यह खौफ लगभग चार दशकों तक पसरा रहा। खौफ के चलते विकास पीछे छूटता रहा।

प्रभावितों में उस समय आशा की किरण जगी, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 31 मार्च 2026 के पहले देशभर से माओवादी समस्या खत्म करेंगे। मध्य प्रदेश में पुलिस ने माओवादियों की ऐसी घेराबंदी की है कि वे या तो मारे गए या फिर उन्होंने हथियार डाल दिए।

आखिरकार 10 दिसंबर की रात बचे दो माओवादियों के सरेंडर के साथ शांति का सूरज निकला। मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ एक नवंबर 2000 को अलग हुआ, लेकिन मध्य प्रदेश में घूम रहे माओवादियों में तीन को छोड़ कर सभी छत्तीसगढ़ या दूसरे राज्यों से थे।

छत्तीसगढ़ में अब भी माओवादी मौजूद हैं, पर सरकार ने 31 मार्च के पहले उनके सफाए के लिए कमर कस ली है। मध्य प्रदेश में माओवादियों ने वर्ष 1988 के आसपास जड़े जमाना शुरू कर दी थी।

इसके लगभग दो वर्ष बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामा चरण शुक्ल ने विधानसभा में स्वीकार किया था कि मप्र में माओवादी समस्या ने दस्तक दे दी है। बीते 35 वर्षों में माओवादियों ने 57 आमजन और 38 पुलिसकर्मियों की जान ले ली।

लोगों का दहशतभरा जीवन तब शुरू हुआ जब वर्ष 1991 में बालाघाट के लांजी थाना क्षेत्र में माओवादियों ने एक पुलिस वाहन को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया, जिसमें नौ पुलिसकर्मी बलिदान हो गए।

दूसरी बड़ी घटना बालाघाट के ही रूपझर थाना क्षेत्र के नारंगी गांव में हुई, जिसमें बारूदी सुरंग विस्फोट से एक पुलिस वाहन क्षतिग्रस्त हो गया था। इस घटना में 16 पुलिसकर्मी बलिदान हो गए। 1999 में माओवादियों ने संयुक्त मप्र के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखिराम कांवरे को घर से अगवा कर चौराहे पर उनकी हत्या कर दी। अब मप्र में हालात सामान्य हो गए हैं।

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com