सामाजिक भेदभाव और विभाजन की प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार करते हुए सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि मंदिर, पानी और श्मशान पर सभी का समान अधिकार होना चाहिए।
उन्होंने दो टूक संदेश दिया कि समाज को बांटने वाली मानसिकता अब बदलनी होगी, क्योंकि बंधुभाव के बिना कोई व्यवस्था टिक नहीं सकती।
भागवत ने सामाजिक समरसता को राष्ट्र की मजबूती से जोड़ते हुए कहा कि आस्था स्थल हों या जीवन के अंतिम संस्कार से जुड़े स्थान, इन पर किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं हो सकता।
उन्होंने दोहराया कि सामाजिक विभाजन का कोई प्रविधान शास्त्रों में भी नहीं है। स्वार्थ के कारण व्यवस्था में भेद पैदा किया गया, जिसे अब समाप्त करना समय की जरूरत है।
फूट से पराधीनता, एकता से उत्थान
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भारत को किसी विदेशी आक्रमणकारी ने अपनी ताकत से नहीं जीता, बल्कि समाज की फूट ने विदेशी ताकतों को यहां शासन का अवसर दिया।
बंधुभाव नहीं रहेगा तो कोई कानून हमारी रक्षा नहीं कर सकेगा। उन्होंने स्वीकारा कि समाज को एक करना आसान नहीं, लेकिन इसी लक्ष्य को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगातार कार्य कर रहा है।
विभाजन भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं
सेक्युलर सोच को लेकर उन्होंने कहा कि यह भारतीय अवधारणा नहीं, न ही विभाजन भारत की संस्कृति है।
हम भी आजादी के समय कह सकते थे कि हम केवल अपनों के लिए हैं, लेकिन हमने कहा हम भी सही हैं, आप भी सही हैं। भारत का स्वभाव जोड़ने का है, लड़ने का नहीं।
स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दे सकते पूर्व सैनिक
उन्हाेंने पूर्व सैनिकों से कहा कि स्वयंसेवक वैचारिक रूप से देश के लिए तैयार रहता है। आवश्यकता पड़ने पर पूर्व सैनिक स्वयंसेवकों को शस्त्र या अन्य प्रशिक्षण देकर देश के लिए तैयार कर सकते हैं।
युवाओं को स्किल प्रशिक्षण देने, रोजगार सृजन और परंपरागत कार्यों को सम्मान दिलाने पर भी उन्होंने जोर दिया। नई पीढ़ी को संदेश दिया कि कमाने में कम हो चलेगा, बांटने में कम नहीं होना चाहिए।
अग्निवीर योजना की समीक्षा हो
उन्होंने कहा कि नए कानून बनाते समय सरकार को जमीन पर काम करने वालों से फीडबैक लेना चाहिए। सेना के मनोबल, कल्याण और न्याय में संतुलन को उन्होंने जरूरी बताया।
अग्निवीर योजना की समीक्षा व आवश्यक सुधार की वकालत की। जनसंख्या असंतुलन को वैश्विक चुनौती बताते हुए कहा कि कानून सभी पर समान रूप से लागू हो।
देश को बड़ा करना है संघ को नहीं
एक समान नागरिक संहिता के पक्ष में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इसे पूरे देश में लागू करना बेहतर होगा, बशर्ते निर्माण की प्रक्रिया उत्तराखंड जैसी हो।
डा. मोहन भागवत ने सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय पुनरुत्थान को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि संघ को देश को बड़ा करने के लिए चलना है, अपने को बड़ा करने के लिए नहीं।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal