फर्जी मतदान रोकने के लिए मतदान केंद्रों पर फिंगर (अंगुली) और आइरिस (आंख की पुतली के बाहर का हिस्सा) बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य से जवाब तलब किया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि इस मांग पर कुछ राज्यों में चल रहे मौजूदा विधानसभा चुनावों के लिए विचार नहीं किया जा सकता। अगले संसदीय चुनाव या राज्य विधानसभा चुनावों से पहले इस तरह के उपाय को अपनाया जाना चाहिए, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
शीर्ष अदालत ने अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और कई राज्यों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा।
स्वयं पेश हुए उपाध्याय ने पीठ को बताया कि याचिका में की गई मांग से रिश्वतखोरी और प्राक्सी वोटिंग (किसी और की जगह मतदान) को रोका जा सकेगा।
पीठ ने टिप्पणी की कि इसके लिए नियमों में बड़े बदलाव करने होंगे और इससे भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। याचिका में कहा गया है कि आयोग अनुच्छेद-324 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का उपयोग करते हुए मतदाता की पहचान मजबूत करने और रिश्वतखोरी, अनुचित प्रभाव व फर्जी वोटिंग को खत्म करने के लिए फिंगर और आइरिस आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण लागू कर सकता है।
उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि वह पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों के संबंध में यह मांग नहीं कर रहे हैं। याचिका में दावा किया गया है कि वर्तमान में मतदाता की पहचान वोटर आइडी कार्ड और मैनुअल वैरिफिकेशन सत्यापन पर आधारित है, जिनका दुरुपयोग होने की आशंका रहती है। इसका कारण पुरानी तस्वीरें, लिपिकीय त्रुटियां और वास्तविक समय में सत्यापन की कमी है।
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