ईरान और अमेरिका (Iran-America War) के बीच युद्ध भले ही थोड़े दिनों के लिए थम गया हो, लेकिन 24 दिनों तक लगातार चली इस जंग ने पूरी दुनिया को महंगाई के मोर्चे पर हिलाकर रख दिया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और सप्लाई चैन बाधित होने से व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है। इसके चलते प्रीमियम पेट्रोल व इंडस्ट्रियल डीजल की कीमतें बढ़ चुकी हैं और अब अन्य सेक्टर की कंपनियों को भी लागत के मोर्चे पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में इस बात की आशंका गहरा गई है कि क्या दवाओं (Drug Prices) के दाम बढ़ सकते हैं, क्योंकि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ अक्सर ग्राहकों पर डाल देती हैं।
कई प्लांट में उत्पादन ठप
ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, फार्मा सेक्टर के टॉप अफसरों ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं के कारण प्रमुख सॉल्वैंट्स और इंटरमीडिएट्स पदार्थों की कीमतों में उछाल ने भारत के थोक दवा निर्माताओं को लागत संकट में धकेल दिया है, जिससे कई इकाइयों को उत्पादन रोकना पड़ा है।
पैरासिटामोल के मुख्य घटक का भाव बढ़ा
देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली दवाओं में से एक, पैरासिटामोल तनाव का सबसे स्पष्ट संकेत है। पैरासिटामोल में मौजूद मुख्य घटक (एपीआई) की कीमत हाल के हफ्तों में दोगुनी से भी अधिक हो गई है – पहले लगभग ₹220-240 प्रति किलोग्राम थी, जो अब बढ़कर ₹550-600 हो गई है। इसका मुख्य कारण आवश्यक कच्चे माल और ऊर्जा स्रोतों की कमी है।
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