पूजा की थाली और व्रत के साथ न भूलें यह कथा, वरना अधूरा रह जाएगा संकल्प

जानकी जयंती का दिन स्त्री शक्ति, धैर्य और पवित्रता का प्रतीक है। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस साल यह पावन तिथि 09 फरवरी यानी आज के दिन पड़ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ इसकी व्रत कथा का पाठ करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसके बिना पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता है, तो आइए पढ़ते हैं –

जानकी जयंती व्रत कथा
माता सीता के जन्म को लेकर कई सारी कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक यह कथा भी है। पौराणिक कथा के अनुसार, मिथिला के राजा जनक परम ज्ञानी थे, लेकिन उनके राज्य में एक बार भीषण अकाल पड़ा। बारिश न होने की वजह से पूरे राज्य में भारी संकट आ गया। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा जनक ने ऋषियों से पूछा। ऋषियों ने उन्हें खुद खेत में हल चलाने का सुझाव दिया। राजा जनक ने ऋषियों की आज्ञा मानकर स्वर्ण का हल धारण किया और खेत जोतना प्रारंभ किया। हल चलाते समय अचानक हल की नोक एक धातु से टकराई। जब राजा जनक ने उसे बाहर निकालकर खोला, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसमें एक बहुत सुंदर और तेजस्वी कन्या खेल रही थी। हल की नोक यानी ‘सीत’ के टकराने से कन्या प्रकट हुई थी, इसलिए उनका नाम ‘सीता’ रखा गया।

राजा जनक ने उस दिव्य कन्या को ईश्वर का आशीर्वाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। राजा जनक की पुत्री होने के कारण वे जानकी और मिथिला की राजकुमारी होने के कारण मैथिली कहलाईं, जिस दिन माता सीता प्रकट हुई थीं, उस दिन फाल्गुन अष्टमी तिथि थी, इसीलिए इसे ‘जानकी जयंती’ के रूप में पूजा जाता है।

व्रत का पूर्ण फल कैसे पाएं?
पूजा के बाद एकाग्र मन से इस कथा को पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
कथा के बाद माता सीता को सुहाग की सामग्री चढ़ाएं और उसे किसी जरूरतमंद सुहागिन महिला को दान दें।
माता सीता प्रभु राम की शक्ति हैं, इसलिए कथा के अंत में “सिया-राम” का नाम जप करें। इससे सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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