पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में ऑटिज्म को पहचानना क्यों होता है मुश्किल?

अक्सर ऑटिज्म का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में छोटे लड़कों की छवि उभरती है। लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि यह समस्या कम उम्र के लड़कों में ज्यादा आम है, लेकिन हाल ही में आई एक नई रिपोर्ट ने इन पुराने अनुमानों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और एक नई सच्चाई सामने रखी है।

क्या आपको भी लगता है कि ऑटिज्म केवल लड़कों को होने वाली समस्या है? अगर हां, तो यह खबर आपकी सोच बदल सकती है। सालों से हम यही मानते आए हैं कि यह बीमारी कम उम्र के लड़कों में सबसे ज्यादा होती है, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस पुराने दावे को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है। विज्ञान की दुनिया में आए इस नए मोड़ ने शोधकर्ताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

क्या ऑटिज्म सिर्फ लड़कों को होता है?
ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) महिलाओं और पुरुषों दोनों में समान रूप से हो सकता है। यह जानकारी उन प्रचलित दावों का खंडन करती है जो इसे केवल लड़कों की बीमारी मानते थे। शोधकर्ताओं का मानना है कि अब हमें इस समस्या को देखने का नजरिया बदलना होगा।

किशोर लड़कियों में बढ़ते मामले
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द बीएमजे’ में प्रकाशित एक अध्ययन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि किशोर लड़कियों में ऑटिज्म के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत देता है कि बचपन में लड़कियों में इस समस्या की पहचान नहीं हो पाती, और अक्सर किशोरावस्था तक पहुंचने पर ही इसका पता चलता है। यही कारण है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं में इसका निदान काफी देरी से होता है।

आंकड़े क्या कहते हैं?
पिछले तीन दशकों में एएसडी (ASD) के मामलों में व्यापक बढ़ोतरी हुई है। आंकड़ों पर नजर डालें तो अभी भी पहचान का अनुपात पुरुषों के पक्ष में झुका हुआ है- यानी हर एक महिला के मुकाबले तीन पुरुषों में इसकी पहचान हो रही है। आम तौर पर, ऑटिज्म की पहचान बचपन में लगभग 10 वर्ष की आयु तक हो जाती है, लेकिन लड़कियों के मामले में यह पैटर्न बदल रहा है।

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