अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन से एक और हाई-प्रोफाइल विदाई की खबर सामने आई है। देश की ‘डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस’ (DNI) तुलसी गबार्ड को अपने पद से हटना पड़ा है। वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि नीतियों पर गहरे मतभेदों के चलते गबार्ड के लिए व्हाइट हाउस में ‘डू नॉट इनवाइट’ (आमंत्रित न करें) जैसी स्थिति बन चुकी थी।
आधिकारिक तौर पर उनके हटने का कारण पारिवारिक बताया गया है, लेकिन इसके पीछे प्रशासन के भीतर चल रही गहरी खींचतान को मुख्य वजह माना जा रहा है।
ट्रम्प की नीतियों से अलग था ‘एंटी-वार’ रुख
तुलसी गबार्ड शुरुआत से ही युद्ध-विरोधी (Anti-war) और विदेशी मामलों में अमेरिकी दखलंदाजी के खिलाफ रही हैं। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी चुनाव के दौरान युद्ध न करने के वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका प्रशासन ईरान, वेनेजुएला और रूस-यूक्रेन जैसे वैश्विक मोर्चों पर सीधे या परोक्ष रूप से शामिल हो गया।
गबार्ड और ट्रम्प प्रशासन के बीच की यह खाई पिछले साल जून में तब और चौड़ी हो गई जब गबार्ड ने एक वीडियो जारी कर अमेरिकी नीतियों की आलोचना करते हुए कहा था कि “राजनीतिक अभिजात वर्ग जानबूझकर परमाणु शक्तियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है।” इसके कुछ ही समय बाद अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला कर दिया था।
पारिवारिक वजह या व्हाइट हाउस का दबाव?
आधिकारिक पक्ष: गबार्ड के हटने के पीछे उनके पति अब्राहम विलियम्स को ‘बोन कैंसर’ (हड्डी का कैंसर) होने की पारिवारिक वजह बताई गई है।
अंदरूनी रिपोर्टों के मुताबिक, गबार्ड पर पद छोड़ने के लिए काफी समय से दबाव बनाया जा रहा था, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े उनके बयान ट्रम्प प्रशासन की लाइन से मेल नहीं खा रहे थे।
खुफिया एजेंसियों के भीतर अलगाव और टकराव
गबार्ड की पृष्ठभूमि पेशेवर खुफिया अधिकारी की नहीं थी, जिसके चलते उन्हें अमेरिकी खुफिया तंत्र (Intelligence Community) के भीतर संस्थागत समर्थन नहीं मिल पाया। इसके अलावा, सीआईए (CIA) के निदेशक जॉन रैटक्लिफ के साथ उनके रिश्ते काफी तनावपूर्ण रहे। गबार्ड का मानना था कि रैटक्लिफ उन्हें दरकिनार कर सीधे राष्ट्रपति से संपर्क कर रहे थे।
वाशिंगटन में खुफिया प्रमुख होने का पहला नियम यह है कि आपके पास राष्ट्रपति का भरोसा होना चाहिए। अगर आपके पास राष्ट्रपति का कान और उनका भरोसा नहीं है, तो आप इस पद पर प्रभावी नहीं रह सकते। -मार्क पॉलिमेरोपोलोस (पूर्व सीआईए अधिकारी)
‘अमेरिका फर्स्ट’ बनाम ‘इजरायल फर्स्ट’ पर आंतरिक कलह
प्रशासन के भीतर इस बात को लेकर भी आंतरिक शीतयुद्ध चल रहा था कि ट्रम्प की मौजूदा विदेश नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ के बजाय ‘इजरायल फर्स्ट’ की ओर झुक गई है। दक्षिणपंथी धड़े के टकर कार्लसन और स्टीव बैनन जैसे नेता भी ईरान के साथ बढ़ते तनाव से असहमत थे।
गबार्ड इसी युद्ध-विरोधी गुट का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। स्थिति यह थी कि जब ट्रम्प की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम मार-ए-लागो में वेनेजुएला सैन्य अभियान की समीक्षा कर रही थी, तब गबार्ड उस बैठक से नदारद होकर हवाई (Hawaii) में थीं।
कैबिनेट में चौथा बड़ा विकेट
वाशिंगटन के विश्लेषक गबार्ड के इस इस्तीफे को ट्रम्प प्रशासन के एक खास पैटर्न से जोड़कर देख रहे हैं। तुलसी गबार्ड कैबिनेट छोड़ने वाली चौथी बड़ी महिला अधिकारी बन गई हैं। इनसे पहले क्रिस्टी नोएम (होमलैंड सिक्योरिटी प्रमुख), पाम बोंडी (अटॉर्नी जनरल), लोरी चावेज़-डेरेमर (श्रम सचिव) को भी अलग-अलग विवादों, विफलताओं या आज्ञाकारिता की कमी के कारण बाहर का रास्ता देखना पड़ा था।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प के दरबार में महिलाओं को प्रतीकात्मक रूप से बड़ी जिम्मेदारियां तो मिलती हैं, लेकिन विवाद होने या लाइन से अलग हटने पर उन्हें पुरुषों के मुकाबले बहुत कम मौका दिया जाता है।
ईरान ने कसा तंज
तुलसी गबार्ड की विदाई पर प्रतिक्रिया देते हुए आर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास के आधिकारिक अकाउंट से एक पोस्ट कर तंज कसा गया है। ईरान ने गबार्ड के पति के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हुए लिखा कि यह बेहद दुखद है कि तुलसी गबार्ड सरकार में रहकर भी ईरान के बारे में सच बोल रही थीं, जिसे ट्रम्प प्रशासन पसंद नहीं करता था। आखिरकार उन्हें उस सरकार ने किनारे कर दिया जो खुद इजरायल की प्रॉक्सी बन चुकी है।
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