जन्माष्टमी: भगवान बलराम के ‘गर्भ-प्रत्यारोपण’ का पहला प्रमाण आया सामने

मध्य प्रदेश के सागर स्थित प्रसिद्ध पुरास्थल एरण से भारतीय इतिहास और पुरातात्विक जगत को चौंकाने वाला पांचवीं-छठवीं शताब्दी (गुप्तकाल) का दुर्लभ शिलापट्ट मिला है। लगभग 1700 साल पुराना यह पत्थर संपूर्ण भारत में पहला ऐसा प्रमाण है, जिस पर भगवान बलराम के जन्म और पौराणिक ‘गर्भ-प्रत्यारोपण’ की कथा को तीन जीवंत दृश्यों में उकेरा गया है। पुरातन स्थल एरण में अनेक उत्खनन कार्यों में सहभागी रहे सागर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नागेश दुबे तथा उनके सहयोगी डॉ. मोहन लाल चढ़ार ने एरण में मिले इन शिलाफलकों का विश्लेषण किया है।

अश्विनी कुमार और प्राचीन ‘गर्भ-प्रत्यारोपण’:
पौराणिक कथा के अनुसार देवकी के सातवें गर्भ को माता रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित किया गया था। शिलापट्ट पर इस प्रक्रिया में सहायता करते देवताओं के चिकित्सक ‘अश्विनी कुमारों’ को दो अश्वमुख (घोड़े के चेहरे) वाली आकृतियों में दर्शाया गया है।

पांच फीट लंबे शिलापट्ट पर उकेरे गए तीन अलौकिक दृश्य
क्षीरसागर में शेषशायी विष्णु: प्रथम दृश्य में भगवान विष्णु क्षीरसागर (8 लहरों के रूप में चित्रित) में 7 फणों वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं। नाभि-कमल पर ब्रह्मा जी और चरणों में माता लक्ष्मी विराजित हैं, जबकि वासुदेव और देवकी हाथ जोड़कर विष्णुधर्मोत्तर पुराण की परंपरा के अनुसार स्तुति करते दिख रहे हैं।

माता रोहिणी का वात्सल्य:
तीसरे दृश्य में लेटी हुई माता रोहिणी नवजात बलराम को स्तनपान करा रही हैं। उनका सिर माता यशोदा की गोद में है। पास ही नंद बाबा, वृद्ध सेविका और सुंदर आभूषणों-केशविन्यास से सजी नारी आकृतियों के साथ संपूर्ण नंदगांव का मनमोहक वातावरण उकेरा गया है।

भारतीय कला और विज्ञान का अनमोल साक्ष्य
एरण पुरास्थल से पहले भी बलराम जी की हल और सुरा-पात्र (मदिरा) धारण की हुई गुप्तकालीन प्रतिमाएं मिल चुकी हैं। हालांकि, यह नया शिलापट्ट यह साबित करता है कि 1700 साल पहले भी भारतीय शिल्पकला में पौराणिक कथाओं के साथ-साथ गूढ़ जैविक प्रक्रियाओं को उकेरने की अद्भुत क्षमता थी। इतिहास और संस्कृति के शोधकर्ताओं के लिए यह खोज एक अनमोल धरोहर बन गई है।

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com