बिहार में अंतिम चरण के मतदान के लिए सियासी सरगर्मी चरम पर है। गयाजी जिले के हर नुक्कड़, चौपाल और खेत-खलिहान में एक ही चर्चा है कि क्या जीतन राम मांझी अपनी साख बचा पाएंगे? क्या कांग्रेस अपने प्रदेश अध्यक्ष को जीत दिलाकर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब होगी? गयाजी, मगध और औरंगाबाद विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मांझी की साख और कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर है। वहीं, औरंगाबाद शहर से कांग्रेस उम्मीदवार आनंद शंकर और भाजपा के उम्मीदवार त्रिविक्रम सिंह में कांटे की टक्कर है।
मांझी की छह सीटों पर सियासी परीक्षा
केंद्रीय मंत्री मांझी अपनी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) की सभी छह सीटें इमामगंज, बाराचट्टी, टिकारी, सिकंदरा, अतरी और कुटुम्बा में दो हफ्तों से डेरा जमाए हुए हैं। इमामगंज में उनकी बहू दीपा मांझी, बाराचट्टी में दीपा की मां ज्योति देवी मैदान में हैं। दोनों सीटों पर मांझी की राजनीति की परीक्षा भी हैं।
दो बार के विधायक की प्रतिष्ठा दांव पर
कुटुम्बा सीट कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है। यहां पिछले दो बार से विधायक प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम फिर मैदान में हैं। इनके सामने एनडीए के हम उम्मीदवार ललन राम हैं। कांग्रेस ने जमीन बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
गयाजी में बदला जातीय समीकरण
गयाजी-बोधगया क्षेत्र में जातीय समीकरण पहले जैसे नहीं रहे। दलित, महादलित व अति पिछड़े वर्गों के वोट इस बार विभाजित हो रहे हैं। मुस्लिम-यादव महागठबंधन पर भरोसा जता रहा है, तो मांझी की एनडीए के पक्ष में मजबूत पकड़ दिखाई देती है।
तय होगा सत्ता का समीकरण
दूसरे चरण में मांझी और कांग्रेस दोनों का भविष्य इन छह सीटों पर निर्भर है। अगर मांझी की पार्टी तीन से ज्यादा सीटें जीतती है, तो वह एनडीए में मजबूत स्थिति में होंगे। वहीं, कांग्रेस कुटुम्बा जीत जाती है, तो यह उसके संगठनात्मक मनोबल के लिए बड़ी राहत होगी। मगध की धरती पर यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
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