भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम हैं और हर नाम के पीछे उनकी किसी न किसी लीला, गुण या स्वरूप की कहानी जुड़ी हुई है। भक्त उन्हें कान्हा, गोपाल, मुरलीधर, गिरधर और नंदलाल जैसे नामों से पुकारते हैं। इन्हीं नामों में एक नाम ‘कुंज बिहारी’ भी है। जन्माष्टमी के अवसर पर गाई जाने वाली प्रसिद्ध आरती ‘आरती कुंज बिहारी की’ में श्रीकृष्ण के इसी मनमोहक स्वरूप का वर्णन किया जाता है।
क्यों पड़ा श्रीकृष्ण का नाम कुंज बिहारी?
‘कुंज’ का अर्थ होता है पेड़-पौधों, लताओं और झाड़ियों से घिरा हुआ सुंदर प्राकृतिक स्थान। वहीं ‘बिहारी’ का अर्थ है विहार करने वाला। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन के सुंदर कुंजों में अनेक बाल और प्रेमपूर्ण लीलाएं की थीं। राधा रानी और गोपियों के साथ उनके कुंज-विहार का वर्णन मिलता है। इसी कारण श्रीकृष्ण को प्रेम से ‘कुंज बिहारी’ कहा जाता है।
‘आरती कुंज बिहारी की’ का महत्व
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर पूजा के दौरान ‘आरती कुंज बिहारी की’ गाने की परंपरा है। इस आरती में श्रीकृष्ण के सुंदर स्वरूप, उनके श्रृंगार, आभूषण और लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन किया जाता है। आरती गाते समय भक्त भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं। श्रीकृष्ण की यही आरती इसलिए भी गाई जाती है क्योंकि इसमें उनके बाल से लेकर युवा स्वरूप तक का वर्णन मिलता है।
मन को मिलती है शांति
श्रद्धा के साथ ‘आरती कुंज बिहारी की’ गाने या सुनने से भक्तों को मानसिक सुकून और सकारात्मक भाव का अनुभव होता है। जन्माष्टमी के दिन जब मंदिरों और घरों में आरती के दौरान घंटियां, शंख और भक्ति संगीत गूंजता है, तो वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
भक्ति और समर्पण का संदेश
इस आरती का मुख्य भाव भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण है। भक्त उनके रूप और लीलाओं का स्मरण करते हुए अपने मन को ईश्वर से जोड़ने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण का स्मरण जीवन में प्रेम, धैर्य और विश्वास का भाव बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
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