करेवा विवाह सामाजिक समरसता का माध्यम: हाईकोर्ट ने कहा-इसे पुनर्विवाह मानकर परिवार पेंशन रोकना गलत

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत मान्य करेवा विवाह जिसमें विधवा अपने दिवंगत पति के भाई से विवाह करती है, इसका सामाजिक उद्देश्य है। यह परंपरा नाबालिग बच्चों को संरक्षण, विधवा की गरिमा की रक्षा और वृद्ध माता-पिता की देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करती है।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने परिवार पेंशन के सामाजिक उद्देश्य को पुनः रेखांकित करते हुए आदेश दिया है कि मृत कर्मचारी की विधवा द्वारा देवर से किया गया ‘करेवा विवाह’ पुनर्विवाह की श्रेणी में नहीं है बल्कि यह सामाजिक समरसता का माध्यम है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवाह के आधार पर विधवा को परिवार पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता और राज्य को नसीहत दी कि वह आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार करे।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने दो संबंधित रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत विधवा की परिवार पेंशन बंद कर दी गई थी और बाद में वसूली के आदेश भी जारी किए गए थे। अदालत ने पेंशन तत्काल बहाल करने के निर्देश दिया है।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत मान्य करेवा विवाह जिसमें विधवा अपने दिवंगत पति के भाई से विवाह करती है, इसका सामाजिक उद्देश्य है। यह परंपरा नाबालिग बच्चों को संरक्षण, विधवा की गरिमा की रक्षा और वृद्ध माता-पिता की देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करती है। पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे विवाह से मृतक कर्मचारी के परिवार से विधवा और उसके बच्चों का संबंध समाप्त नहीं होता। परिवार की संरचना और आर्थिक जिम्मेदारियों में कोई विखंडन नहीं होता, क्योंकि बच्चे उसी संरक्षक व्यवस्था में रहते हैं और बुजुर्ग माता-पिता भी उसी घर में निवास करते हैं।

अदालत ने कहा कि सेवा नियमों में पुनर्विवाह पर अयोग्यता का प्रावधान इस धारणा पर आधारित है कि विधवा की जिम्मेदारी अब नया परिवार उठाएगा। लेकिन ‘करेवा विवाह’ की स्थिति में यह धारणा लागू नहीं होती। नियमों की यांत्रिक और कठोर व्याख्या करना सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी करना होगा। इससे परिवार पेंशन जैसे कल्याणकारी प्रावधानों की मूल भावना ही समाप्त हो जाएगी।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को केवल इस आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता कि उसने पुनर्विवाह किया, जबकि उसके दूसरे विवाह से मृतक पति के अन्य आश्रितों को कोई नुकसान या अनुचित लाभ नहीं हुआ। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार पेंशन केवल विधवा का अधिकार नहीं, बल्कि मृत कर्मचारी के सभी निकट आश्रितों का सामूहिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी इसमें शामिल है। कई परिवारों के लिए सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन ही आजीविका का एकमात्र साधन होते हैं।

20 साल बाद 12.66 लाख की वसूली पर रोक
संबंधित याचिका में वर्ष 1996 से 2019 तक कथित रूप से अधिक भुगतान होने के आधार पर 12,66,082 रुपये की वसूली शुरू की गई थी। अदालत ने पाया कि न तो याचिकाकर्ता और न ही उसकी बेटी द्वारा कोई धोखाधड़ी या गलत जानकारी दी गई थी। अदालत ने कहा कि जब अतिरिक्त भुगतान का पता दो दशक से अधिक समय बाद चला, तो इतनी देरी से वसूली की मांग करना न्यायसंगत नहीं है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित प्राधिकारी याचिकाकर्ताओं की परिवार पेंशन तत्काल बहाल करें।

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