एंटीमाइक्रोबियल (एंटीबायोटिक, एंटीवायरल, एंटी फंगल) दवाएं आधुनिक चिकित्सा की आधारशिला हैं इनसे कई सारी जानलेवा बीमारियों का उपचार होता रहा है, लेकिन अब सामान्य संक्रमण होने पर भी ये दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं।
वहीं निमोनिया या यूटीआई (मूत्रमार्ग संक्रमण) जैसी गंभीर बीमारियों का तो इन दवाओं से इलाज असंभव होता जा रहा है। दुनिया भर में इन दवाओं को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन दवाओं के दुरुपयोग पर चिंता प्रकट करते हुए लोगों से विशेष रूप से सतर्कता बरतने की अपील की है।
आइसीएमआर की रिपोर्ट यहां तक कहती है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कोई भविष्य का खतरा नहीं है, बल्कि लोग इसकी चपेट में तेजी से आने लगे हैं। हर साल दुनिया भर में इससे 12 लाख से अधिक मौतें हो रही हैं। कुल मिलाकर कहें तो एएमआर ने माडर्न मेडिसिन की तमाम उपलब्धियों पर पानी फेरना शुरू कर दिया है। इससे संक्रमण के साथ-साथ सर्जरी, सिजेरियन और कैंसर कीमोथेरेपी भी मुश्किलें आने लगी हैं। इसके अर्थिक बोझ को अगर विश्व बैंक के शब्दों में समझें तो वर्ष 2050 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर एक खरब डालर का अतिरिक्त बोझ बढ़ने वाला है और वर्ष 2030 तक हर वर्ष विश्व आर्थिकी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
क्यों चिंताजनक स्थिति है यह
रोगाणुओं पर दवाओं का प्रभाव खत्म हो जाने को एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस माना जाता है। ऐसा होने पर सामान्य संक्रमण का भी उपचार मुश्किल हो जाता है। एएमआर प्रभावित व्यक्तियों के बार-बार संक्रमित होने, इम्यून सिस्टम के कमजोर होने और बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाती है। दरअसल, एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के अत्यधिक और कई बार अनावश्यक प्रयोग के चलते रोगाणु दवाओं के प्रभाव से लड़ने के लिए खुद को पूरी तरह सक्षम बना लेते हैं। धीरे-धीरे ये प्रतिरोधी सुपरबग्स का स्म ले लेते हैं।
10 लाख से अधिक मौतें हुई प्रतिरोधी रोगाणुओं के चलते 2021 में दुनियाभर में जामा नेटवर्क के अनुसार
4 करोड़ से अधिक मौतें हो सकती हैं एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के चलते 2050 तक
29 प्रतिशत तक( सर्वाधिक) मृत्यु आशंका होती है पसिनोबैक्टर बाउमानी बैक्टीरिया के चलते, जिससे निमोनिया, ब्लड स्ट्रीम संक्रमण और मूत्र मार्ग संक्रमण होता है।
2.6 लाख मौतें अलग-अलग संक्रमण के चलते हुई भारत में 2021 में, जिसमें एएमआर का सीधा प्रभाव रहा।
एएमआर से जुड़ी अधिकांश मौतें 1990 में पांच वर्ष कम आयु के बच्चों में होती थी, लेकिन 2021 में ऐसी मौतों का आंकड़ा 70 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा रहा।
साल 2015 में 10 अस्पतालों में हुए एक अध्ययन के अनुसार, एएमआर से होने वाली मौत की आशंका सामान्य संक्रमण की तुलना में दोगुणा पाई गई। यह खतरा अब तीन गुणा तक बढ़ चुका है।
गंभीरता को समझने की जरूरत
कमजोर प्रतिरक्षा (कैंसर, अंग प्रत्यारोपण, एचआइवी या लगातार दवाओं के प्रयोग), नवजात 65 वर्ष से अधिक आयु के लोग और डायबिटीज, किडनी, फेफड़े की समस्या से जूझ रहे लोगों में एएमआर होने की आशंका सर्वाधिक रहती है। लंबे समय तक एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग, अस्पताल में रहने से भी यह समस्या गंभीर होती है। हाथों की पर्याप्त सफाई नहीं होने, अस्पताल में अस्वच्छता होने, भीड़भाड़, दूषित भोजन या पेयजल और संक्रमित इलाकों में जाने से भी एएमआर हो सकता है एक साइलेंट महामारी के रूप में यह समस्या बड़े जन समूह को अपनी गिरफ्त में लेने जा रही है।
साइड इफैक्ट्स क्यों हैं चिंताजनक
एंटीबायोटिक के प्रति रेजिस्टेंस होने की दशा में कई एंटीबायोटिक के प्रति रेजिस्टेंस होने की दशा में कई सारी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं जैसे-
एएमआर होने पर सेकंड और थर्ड लाइन ट्रीटमेंट की जरूरत होती है, जिससे मरीज को अनेक साइड इफेक्ट्स, जैसे अंग खराब होने लंबे समय तक इलाज की जरूरत हो सकती है।
संक्रमण के उपचार के लिए पूरी तरह से अभी एंटीबायटिक पर निर्भरता है, जैसे- ज्वाइंट रिप्लेसमेंट, अंग प्रत्यारोपण, कैंसर थेरपी और अनेक क्रॉनिक बीमारियों में इसकी जरूरत होती है।
कई मामलों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस में उपचार का कोई विकल्प ही नहीं बचता।
अगर किसी एंटीबायोटिक का असर पूरी तरह से खत्म हो गया है, तो इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती उत्पन्न हो सकती है।
5 बातें आपको जानना आवश्यक
एएमआर किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को अस्पताल में लंबे समय तक भर्ती कराने, फालोअप विजिट की जरूरत होती है। इलाज काफी महंगा हो सकता है।
स्वस्थ आदतें आपको संक्रमित होने से बचाएंगी और इससे कीटाणुओं का फैलाव भी कम होगा।
एंटीबायोटिक का सेवन डाक्टर के परामर्श पर ही करना चाहिए। सर्दी, जुकाम और वायरल बुखार में एंटीबायोटिक का प्रयोग जरूरी नहीं होता। एंटीबायोटिक दवाएं जीवन बचाती हैं, पर इनका दुष्प्रभाव जानलेवा साबित हो सकता है।
एएमआर दुनिया के हर हिस्से में पाया जाता है, इसलिए देश के बाहर जाने या उपचार लेने की जानकारी आपको अपने डाक्टर के साथ अवश्य साझा करनी चाहिए।
दवाओं के सेवन के दौरान अगर तीन से चार बार डायरिया की समस्या होती है, तो इसकी जानकारी डाक्टर को अवश्य देनी चाहिए।
डॉ. विक्रम सिंह (सीएमएस व एचओडी, जनरल मेडिसिन, लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ) बताते हैं कि जनस्वास्थ्य का संकट है एएमआर। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस भारत सहित पूरे विश्व में एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या बन चुका है। इसका एक प्रमुख कारण है प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त जांच के बिना ही एंटीबायोटिक का शुरू कर देना।
वायरल संक्रमण जैसे सर्दी, खांसी और बुखार में एंटीबायोटिक का उपयोग एक गंभीर त्रुटि है, क्योंकि इनमें एंटीबायोटिक प्रभावी नहीं होती। आइसीयू में गंभीर रोगियों के उपचार के दौरान ब्राड – स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का लंबे समय तक और बिना नियमित समीक्षा के प्रयोग करने से भी समस्या गंभीर होती है। लोग बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवाएं लेते हैं और अक्सर पूरा कोर्स नहीं करते। इन सभी कारणों से रेजिस्टेंट संक्रमण बढ़ रहा है, जिससे मृत्यु दर तथा उपचार की लागत में वृद्धि हो रही है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के अनुसार, भारत में सामान्य संक्रमणों में प्रयुक्त कई एंटीबायोटिक दवाएं अब प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी प्रकार डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत एवं दक्षिण- पूर्व एशिया में हर तीन में से एक बैक्टीरियल संक्रमण एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो चुका है। भारत में ई. कोलाई, क्लेब्सिएला और स्टेफाइलोकोकस आरियस जैसे सामान्य रोगजनकों में तीसरी पीढ़ी की सेफालोस्पोरिन, फ्लुओरोक्विनोलोन तथा अन्य प्रमुख एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध लगातार बढ़ रहा है।
यदि इस स्थिति पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो मामूली संक्रमण भी असाध्य बन सकते हैं, सर्जरी और कैंसर जैसी चिकित्सा जोखिमपूर्ण हो जाएंगी तथा नवजात, बुजुर्ग और गंभीर रोगियों की मृत्यु दर में काफी वृद्धि होगी। अतः एंटीबायोटिक का तर्कसंगत उपयोग अत्यंत आवश्यक है। सही रोगी को सही दवा, सही मात्रा और सही अवधि के लिए ही एंटीबायोटिक दी जाए। वायरल संक्रमणों में एंटीबायोटिक से परहेज, ओवर-द-काउंटर बिक्री पर सख्त नियंत्रण, प्रयोगशाला जांच आधारित उपचार, एंटीमाइक्रोबियल स्टूवर्डशिप कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन तथा व्यापक जन- जागरूकता ही इस गंभीर जनस्वास्थ्य संकट से निपटने का एकमात्र प्रभावी मार्ग है।
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