दुनिया की सबसे ताकतवर जांच एजेंसियों में शुमार फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) की शुरुआत किसी बड़े कानून के जरिए नहीं हुई थी, बल्कि यह एक राष्ट्रीय त्रासदी के बाद लिए गए एक त्वरित प्रशासनिक फैसले का परिणाम था।
साल 1901 में आतंकवादियों ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम मैककिनले की गोली मारकर हत्या कर दी, तो देश की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुल गई। इस घटना के बाद नए राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने गहराई से महसूस किया कि तेजी से विकसित होते अमेरिका को अपनी एक अलग और समर्पित संघीय जांच एजेंसी की सख्त जरूरत है।
जांच के लिए एजेंट उधार लेने की मजबूरी
उस दौर में न्याय विभाग के पास अपने खुद के जांच अधिकारी नहीं होते थे। स्थिति यह थी कि किसी भी बड़े मामले की जांच के लिए उन्हें ट्रेजरी विभाग की सीक्रेट सर्विस से एजेंट उधार लेने पड़ते थे। इस समस्या को खत्म करने के लिए जब सरकार ने अपनी एक स्वतंत्र जांच एजेंसी बनाने का प्रस्ताव रखा, तो अमेरिकी संसद ने इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया।
दरअसल, सांसदों को इस बात का डर सता रहा था कि सरकार इस नई और शक्तिशाली पुलिस फोर्स का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों और साथी सांसदों की जासूसी के लिए कर सकती है।
नेपोलियन के पोते ने निकाला बीच का रास्ता
कांग्रेस की इस कड़ी नामंजूरी के बावजूद न्याय विभाग के तत्कालीन अटॉर्नी जनरल चार्ल्स जे. बोनापार्ट ने हार नहीं मानी और एक नया रास्ता खोज निकाला। 26 जुलाई 1908 को, कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी का इंतजार किए बिना, उन्होंने एक प्रशासनिक आदेश जारी कर न्याय विभाग के भीतर ही 34 विशेष जांच अधिकारियों की एक छोटी सी टीम बना दी।
इतिहास का एक बेहद दिलचस्प पहलू यह भी है कि चार्ल्स जे. बोनापार्ट, फ्रांस के मशहूर सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट के सबसे छोटे भाई जेरोम बोनापार्ट के पोते थे। उनके द्वारा बनाई गई यही छोटी सी टीम आगे चलकर आधुनिक एफबीआई में तब्दील हो गई।
जे. एडगर हूवर के दौर में एजेंसी का कायाकल्प
शुरुआती दिनों में इस एजेंसी का दायरा काफी सीमित था और यह मुख्य रूप से जमीन घोटालों, बैंक धोखाधड़ी और संघीय कानूनों के उल्लंघन की जांच तक ही सीमित थी। लेकिन एजेंसी की असली तस्वीर साल 1924 में बदलनी शुरू हुई, जब महज 29 साल की उम्र में जे. एडगर हूवर इसके निदेशक बने। हूवर ने एजेंसी की कार्यप्रणाली में कई क्रांतिकारी बदलाव किए।
उन्होंने एजेंटों की भर्ती प्रक्रिया को बेहद सख्त कर दिया, सभी के लिए पेशेवर प्रशिक्षण अनिवार्य किया और अपराध सुलझाने में वैज्ञानिक तथा फोरेंसिक जांच को सबसे ज्यादा अहमियत दी। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते 1935 में एजेंसी का नाम आधिकारिक तौर पर बदलकर फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कर दिया गया।
हूवर ने लगातार 48 सालों तक इस एजेंसी का नेतृत्व किया। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अपने गठन के 68 सालों तक यह एजेंसी न्याय विभाग के दफ्तरों से ही काम करती रही, और 1975 में जाकर इसे अपना स्थायी मुख्यालय नसीब हुआ।
दुनिया को एफबीआई की ऐतिहासिक देन
एफबीआई ने सिर्फ अमेरिका में ही अपराधियों को नहीं पकड़ा, बल्कि पूरी दुनिया को अपराध विज्ञान और पुलिसिंग के आधुनिक तरीके भी सिखाए। साल 1924 में एफबीआई ने पहली बार अलग-अलग राज्यों के बिखरे हुए फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड को एक ही राष्ट्रीय डेटाबेस में जोड़ना शुरू किया, जिसने आज के आधुनिक बायोमेट्रिक डेटाबेस की मजबूत नींव रखी।
इसके बाद 1932 में एक कमरे और सिर्फ एक वैज्ञानिक के साथ शुरू हुई एफबीआई की फोरेंसिक लैब आज दुनिया की सबसे बड़ी लैब बन चुकी है। यहीं पर हथियारों की जांच, दस्तावेजों की जांच और रसायन विज्ञान जैसी वैज्ञानिक जांचें एक ही छत के नीचे शुरू हुईं।
इसके अलावा, अपराधियों को पकड़ने के लिए वांटेड पोस्टरों का बेहतरीन इस्तेमाल भी एफबीआई की ही देन है, जिसने पूरे अमेरिका में वांछित अपराधियों की जानकारी साझा करने और अलग-अलग राज्यों की पुलिस के बीच तालमेल बिठाने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
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