एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस एक ऐसी गंभीर समस्या है, जो आज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बनकर सामने आया है। जब कोई जर्म खुद को मारने के लिए बनाई गई दवाओं के खिलाफ रेजिस्टेंस क्षमता विकसित कर लेता है, तो उसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहते हैं।
आमतौर पर माना जाता है कि एंटीबायोटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी वजह है, लेकिन हाल ही में हुए एक नई रिसर्च ने इसके एक और नए पहलु को उजागर किया है। आइए जानें क्या है यह नई वजह।
क्या सिर्फ एंटीबायोटिक दवाएं हैं जिम्मेदार?
किंग्स कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स ने हाल ही में एक स्टडी की, जिसमें यह बात सामने आई है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की मुख्य वजह सिर्फ एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल नहीं है। दरअसल, इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक असमानता और हमारे रहने-सहने की स्थितियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। भीड़-भाड़ वाले इलाकों में रहना और साफ-सफाई की सुविधाओं की कमी होना, इस खतरे को तेजी से बढ़ा रहा है।
अगले 25 सालों में 3.9 करोड़ मौतों का खतरा
यह संकट कितना बड़ा है, इसका अंदाजा आप द लैंसेट जर्नल में छपे अनुमानों से लगा सकते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण अगले 25 वर्षों में दुनिया भर में 3.9 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान जाने की आशंका है। यही वजह है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है।
क्या कहती है रिसर्च?
किंग्स कॉलेज लंदन में साइंस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की प्रोफेसर और इस रिसर्च की सीनियर लेखक तानिया डाटोरिनी ने इस रिसर्च के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने कहा कि हमारा अध्ययन एक मल्टी-स्केल, मल्टी-मॉडल अप्रोच का इस्तेमाल करता है, जिसे पहले कभी इस तरह से लागू नहीं किया गया है।
यह पता लगाकर कि कौन से प्रतिरोधक गुण बढ़ रहे हैं, वे कहां फैल रहे हैं और उन्हें क्या बढ़ावा दे रहा है, हम उन खतरों के प्रति निगरानी, नीति और हस्तक्षेप को बेहतर ढंग से लक्षित कर सकते हैं, जिनके वैश्विक स्वास्थ्य पर असर पड़ने की आशंका है।
प्रोफेसर तानिया डाटोरिनी का मानना है कि इस खतरे से निपटने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के जिम्मेदारी से इस्तेमाल के साथ-साथ असमानता, साफ-सफाई, पोषण और स्वास्थ्य समानता जैसे मुद्दों पर भी बड़े और संरचनात्मक बदलाव करने की सख्त जरूरत है।
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