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		<title>हर क्षेत्र में विजय दिलाती है विजया एकादशी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rishabh]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 24 Feb 2019 05:07:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="435" height="326" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg 435w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 435px) 100vw, 435px" />हिंदू धर्म में एकादशी के व्रत का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। विजया एकादशी अपने नामानुसार विजय प्रदान करने वाली है। भयंकर शत्रुओं से जब आप घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो उस विकट स्थिति में विजया &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="435" height="326" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg 435w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 435px) 100vw, 435px" /><p><strong>हिंदू </strong>धर्म में एकादशी के व्रत का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। विजया एकादशी अपने नामानुसार विजय प्रदान करने वाली है। भयंकर शत्रुओं से जब आप घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो उस विकट स्थिति में विजया नामक एकादशी आपको विजय दिलाने की क्षमता रखता है।<img decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-210886" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg" alt="" width="435" height="326" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019.jpg 435w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/02/vijya_ekadashi_23_02_2019-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 435px) 100vw, 435px" /></p>
<p>प्राचीन काल में कई राजा महाराजाओं ने इस व्रत के प्रभाव से अपनी निश्चित हार को जीत में बदल चुके हैं। इस महाव्रत के विषय में पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में अति सुन्दर वर्णन मिलता है।</p>
<div class="relativeNews">
<div class="h3">फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहते हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने सभी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है।</div>
</div>
<p><strong>विजया एकादशी व्रत कथा<br />
</strong></p>
<div class="relativeNews">
<div class="h3">एक बार देवर्षि नारद ने जगत पिता ब्रह्माजी से कहा- &#8216;हे ब्रह्माजी! आप मुझे फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत तथा उसकी विधि बताने की कृपा करें।&#8221;</div>
</div>
<div class="relativeNews">
<div class="h3">नारद की बात सुन ब्रह्माजी ने कहा- &#8216;हे पुत्र! विजया एकादशी का उपवास पूर्व के पाप तथा वर्तमान के पापों को नष्ट करने वाला है। इस एकादशी का विधान मैंने आज तक किसी से नहीं कहा परंतु तुम्हें बताता हूं, यह उपवास करने वाले सभी मनुष्यों को विजय प्रदान करती है।&#8221;</div>
</div>
<p>अब श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करो- श्रीराम को जब चौदह वर्ष का वनवास मिला, तब वह भ्राता लक्ष्मण तथा माता सीता सहित पंचवटी में निवास करने लगे। उस समय महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया। इस दु:खद घटना से श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी अत्यंत दुखी हुए और सीताजी की खोज में वन-वन भटकने लगे। जंगल-जंगल घूमते हुए, वे मरणासन्ना जटायु के पास जा पहुंचे।</p>
<p>जटायु ने उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीराम की गोद में प्राण त्यागकर स्वर्ग की तरफ प्रस्थान किया। कुछ आगे चलकर श्रीराम व लक्ष्मण की सुग्रीवजी के साथ मित्रता हो गई और वहां उन्होंने बालि का वध किया। श्रीराम भक्त हनुमानजी ने लंका में जाकर माता सीता का पता लगाया और माता से श्रीरामजी तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया।</p>
<p>वहां से लौटकर हनुमानजी श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत कह सुनाया। सब हाल जानने के बाद श्रीरामचंद्रजी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों तथा भालुओं की सेना सहित लंका की तरफ प्रस्थान किया। समुद्र किनारे पहुंचने पर श्रीरामजी ने विशाल समुद्र को घड़ियालों से भरा देखकर लक्ष्मणजी से कहा-&#8216;हे लक्ष्मण! अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरे इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?&#8221;</p>
<div class="relativeNews">
<div class="h3">प्रभु श्रीराम की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने कहा- &#8216;भ्राताश्री! आप पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहां से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं।&#8221;</div>
</div>
<p>अपने छोटे भाई लक्ष्मणजी के वचनों को सुन श्रीरामजी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम कर एक ओर बैठ गए। अपने आश्रम में श्रीराम को आया देख महर्षि वकदाल्भ्य ने पूछा- &#8216;हे श्रीराम! आपने किस प्रयोजन से मेरी कुटिया को पवित्र किया है, कृपा कर अपना प्रयोजन कहें प्रभु!&#8221;</p>
<p>मुनि के मधुर वचनों को सुन श्रीरामजी ने कहा &#8211; &#8216;हे ऋषिवर! मैं सेना सहित यहां आया हूं और राक्षसराज रावण को जीतने की इच्छा से लंका जा रहा हूं। कृपा कर आप समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।&#8221;</p>
<p>महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- &#8216;हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसके करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी।&#8221;</p>
<p><strong>विजया एकादशी व्रत विधि<br />
</strong></p>
<p>यह कैसा व्रत है मुनिश्रेष्ठ! जिसे करने से समस्त क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है? जिज्ञासु हो श्रीराम ने पूछा। इस पर महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- &#8216;हे श्रीराम! फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप अवश्य ही समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी। हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश बनाएं।</p>
<p>उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीचे सतनजा अर्थात मिले हुए सात अनाज और ऊपर जौ रखें। उस पर विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित करें। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान श्रीहरि का पूजन करें।</p>
<p>वह सारा दिन भक्तिपूर्वक कलश के सामने व्यतीत करें और रात को भी उसी तरह बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नदी या तालाब के किनारे स्नान आदि से निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें। हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री आपका वरण करेगी।&#8221; मुनि के वचन सुन तब श्रीरामचंद्रजी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।</p>
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