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	<title>हरेला पर्व &#8211; Live Halchal</title>
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		<title> देवभूमि में आज हरेला पर्व का उत्सव, हरियाली के साथ स्वास्थ्य और संस्कृति से जुड़ा है महत्व</title>
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		<pubDate>Wed, 16 Jul 2025 06:08:48 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[हरेला पर्व]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="592" height="324" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83.jpg 592w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83-medium.jpg 300w" sizes="(max-width: 592px) 100vw, 592px" />हरेला पर्व केवल पर्यावरण संतुलन को साधने में ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़े तमाम कारक का भी द्योतक है। इस पर्व पर चर्चा के दौरान आयुष विशेषज्ञों ने भी कई संहिताओं से उदाहरण प्रस्तुत किया। इसमें ऋतुचर्या और ऋतु द्रव्यों के साथ भोजन औषधी को भी जोड़कर देखा जाता है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अवनीश &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="592" height="324" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83.jpg 592w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/2-83-medium.jpg 300w" sizes="(max-width: 592px) 100vw, 592px" />
<p>हरेला पर्व केवल पर्यावरण संतुलन को साधने में ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से जुड़े तमाम कारक का भी द्योतक है। इस पर्व पर चर्चा के दौरान आयुष विशेषज्ञों ने भी कई संहिताओं से उदाहरण प्रस्तुत किया। इसमें ऋतुचर्या और ऋतु द्रव्यों के साथ भोजन औषधी को भी जोड़कर देखा जाता है। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. अवनीश उपाध्याय की मानें तो यह केवल प्रकृति प्रेम ही नहीं शरीर, मन और परिवेश के संतुलन का भी असीम अनुभव कराने वाला पर्व है।</p>



<p>हरेला वैसे ‎उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण चेतना का प्रतीक पर्व है। वहीं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि यह केवल कृषि परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि ऋतुचर्या और देह की प्रकृति के अनुरूप जीवनशैली में बदलाव का संकेतक भी है। ‎‎</p>



<p>आयुर्वेद शोध विशेषज्ञ डॉ. अवनीश उपाध्याय बताते हैं, हरेले के अंकुर पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इनमें क्लोरोफिल, एंजाइम्स, फाइबर और सूक्ष्म खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो पाचन, त्वचा और मनोदशा सुधारने में सहायक होते हैं। इन्हें सुखाकर पाउडर बनाकर भोजन में मिलाना एक प्रकार की आयुर्वेदिक टॉनिक का काम करता है।</p>



<p><strong>आचार्य चरक ने भी किया है वर्णन<br></strong>द्रव्यगुण विशेषज्ञ प्रो. सुरेश चौबे का कहना है कि आचार्य चरक ने संहिता में लिखा है ‘ऋतुभिर्हि गुणा: सर्वे द्रव्याणां भावयन्त्यपि’। अर्थात हर ऋतु द्रव्यों जैसे भोजन, औषधि के गुणों को बदल देती है। हरेला, वर्षा ऋतु के आगमन और ग्रीष्म की अग्नि से तपे शरीर को शीतलता देने का पर्व है। इस समय वात और पित्त दोष की वृद्धि होती है। पाचन अग्नि मंद हो जाती है। ऐसे में हरेला के अवसर पर परंपरागत रूप से खाए जाने वाले हल्के, पचने योग्य और स्निग्ध आहार लेने चाहिए।</p>



<p><strong>सुपाच्य भोजन से शरीर के संतुलन को साधने का पर्व<br></strong>आयुर्वेद विशेषज्ञ व ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज के अगद तंत्र के विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश चंद तिवारी बताते हैं कि इस पर्व से ही यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि भोजन सुपाच्य हो। उनका कहना है कि मंडुवे का रोटी, गहत की दाल, ककड़ी, लौकी, कुल्थ, झंगोरा खीर, लस्सी, और ताजे मौसमी फलों का सेवन आयुर्वेदिक दृष्टि से शरीर के दोषों को संतुलित करता है।</p>



<p><strong>हरेला पर्व औषधीय साधना का पर्व है<br></strong>ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज परिसर के निदेशक डॉ. डीसी सिंह का कहना है कि हरेला बोने की प्रक्रिया ही एक प्रकार की औषधीय ध्यान साधना है। 5 से 11 प्रकार के अनाज गेहूं, जौ, मक्का, उड़द, तिल आदि को मिलाकर मिट्टी में बोया जाता है। यह मिश्रण ‘नवधान्य’ कहलाता है, जिसका उल्लेख काश्यप संहिता में भी है। जब यह हरे अंकुरित होते हैं, तो इन्हें देवता के रूप में पूजा जाता है और परिवार के बुजुर्गों से आशीर्वाद लेकर सिर पर रखा जाता है।</p>



<p><strong>‎मानसिक और शारीरिक समन्वय को बेहतर बनाने का अवसर<br></strong>पंचकर्म विशेषज्ञ डॉ. पारुल शर्मा का कहना है कि हरेला पर्व के दौरान बच्चों और युवाओं की ओर से खेली जाने वाली परंपरागत खेल सब शरीर को सक्रिय करने वाले प्राकृतिक व्यायाम हैं। यह मानसिक और शारीरिक समन्वय को बेहतर बनाते हैं, जिसे आयुर्वेद में ‘व्यास-बल-वर्धन’ कहा गया है। हरियाली लगाना केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं है। आयुर्वेद में यह वनस्पति चिकित्सा का हिस्सा है। नीम, तुलसी, आंवला, पीपल, अर्जुन जैसे पौधे लगाए जाते हैं, जो पंचकर्म चिकित्सा में उपयोगी हैं।</p>



<p><strong>जीवनशैली को प्रकृति के अनुरुप लाने का काल<br></strong>योग विशेषज्ञ डॉ. रुचिता उपाध्याय का कहना है कि हरेला जीवनशैली को प्रकृति के अनुरूप लाने का काल है, जब हम अपने आसपास के वातावरण को औषधीय बनाते हैं और स्वयं भी शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक सक्षम होते हैं। हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की प्रयोगशाला है, जहां प्रकृति, संस्कृति और चिकित्सा का अद्भुत समागम होता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि स्वास्थ्य केवल शरीर की स्थिति नहीं, बल्कि मन, पर्यावरण और समाज के साथ संतुलन में जीने की एक कला है।</p>
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		<title> हरेला पर प्रदेश में रिकॉर्ड बनाने की तैयारी, एक दिन में लगाए जाएंगे पांच लाख पौधे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 07:09:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तराखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="582" height="328" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22.jpg 582w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22-medium.jpg 300w" sizes="(max-width: 582px) 100vw, 582px" />राज्य में हरेला पर्व (16 जुलाई) पर पांच लाख पौधे लगाकर रिकॉर्ड बनाने की तैयारी है। इससे पहले वर्ष-2016 में हरेला पर ही दो लाख पौधे रोपे गए थे। इस बार पांच लाख पौधे एक दिन में लगाने का लक्ष्य रखा गया है, इसमें तीन लाख गढ़वाल और दो लाख पौधे कुमाऊं मंडल में लगाए &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="582" height="328" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22.jpg 582w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/5-22-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 582px) 100vw, 582px" />
<p>राज्य में <a href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5)">हरेला पर्व</a> (16 जुलाई) पर पांच लाख पौधे लगाकर रिकॉर्ड बनाने की तैयारी है। इससे पहले वर्ष-2016 में हरेला पर ही दो लाख पौधे रोपे गए थे। इस बार पांच लाख पौधे एक दिन में लगाने का लक्ष्य रखा गया है, इसमें तीन लाख गढ़वाल और दो लाख पौधे कुमाऊं मंडल में लगाए जाएंगे। इसके लिए शासन स्तर पर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।</p>



<p>मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर इस बार हरेला का त्योहार मनाओ, धरती मां का ऋण चुकाओ और एक पेड़-मां के नाम की थीम पर यह पौधरोपण आयोजित किया जाएगा। पूरे माह इस पर्व के तहत कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस अभियान को लेकर प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु ने निर्देश जारी किए हैं। इसमें हर जिले में संबंधित जिलाधिकारी नोडल अधिकारी होंगे। उनकी अध्यक्षता में एक समिति होगी। यह समिति के माध्यम से जिलों में सार्वजनिक स्थानों आदि का पौधारोपण के लिए चयन करेगी। अभियान में स्थानीय लोगों की बड़े स्तर पर सहभागिता को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। जिला स्तर पर नामित डीएफओ निःशुल्क पौध की व्यवस्था करने के लिए नोडल अधिकारी होंगे।</p>



<p><strong>50 प्रतिशत फलदार पौधे लगाए जाएंगे<br></strong>अभियान के तहत जो पौधरोपण किया जाएगा, उसमें 50 प्रतिशत प्रजाति फलदार पौधों की होगी। इनका रखरखाव संंबंधित विभाग, स्थानीय ग्रामीणों, संबंधित लाभार्थियों, वन पंचायतों, महिला/युवा मंगल दलों के माध्यम से होगा। हरेला कार्यक्रम के दौरान संबंधित विभागों को दो पौध प्रति परिवार के अनुसार पौध उपलब्ध कराए जाने के लिए जनपद स्तरीय विभागीय अधिकारी का दायित्व होगा। कार्यक्रम के पहले तीन दिनों में 50 प्रतिशत पौध रोपित करने का भी निर्देश दिया गया है।</p>



<p><strong>यह भी पढ़े &#8211; </strong><a href="https://livehalchal.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b2%e0%a4%96%e0%a4%a8/622301">आज से दो दिवसीय दौरे पर लखनऊ आएंगे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह</a></p>



<p><strong>पंचायत क्षेत्र के राजकीय कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि नहीं हो सकेंगे शामिल<br></strong>राज्य निर्वाचन आयोग ने हरेला पर्व के आयोजन तथा कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों के प्रतिभाग किए जाने की अनुमति इस प्रतिबंध के साथ दी गई है कि राजकीय कार्यक्रमों में नगर क्षेत्रों, वन क्षेत्रों व हरिद्वार जिले में जनप्रतिनिधि प्रतिभाग कर सकते हैं। लेकिन ग्रामीण पंचायती निर्वाचन क्षेत्र के राजकीय कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि अतिथि के रूप में प्रतिभाग नहीं कर सकेंगे और न ही निःशुल्क पौध वितरण करेंगे। निःशुल्क पौध वितरण के संबंध में अधिकारियों, कर्मचारियों पर प्रतिबंध नहीं होगा।</p>



<p><strong>पांच लाख पौधे रोपित कर हरेला पर स्थापित होगा नया कीर्तिमान: सीएम<br></strong>मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड की संस्कृति में हरेला मात्र एक पर्व नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की एक जीवंत और पवित्र परंपरा है। यह पर्व हमारी लोकसंस्कृति, आस्था और पर्यावरण संरक्षण के मूल्यों का प्रतीक है। 16 जुलाई को हरेला पर्व के पहले दिन पर प्रदेश में पांच लाख पौधे रोपित करने का संकल्प लिया गया है। यह केवल पौधरोपण नहीं बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए एक हरित धरोहर की नींव रखने का प्रयास है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में इस वर्ष की थीम हरेला का त्योहार मनाओ, धरती मां का ऋण चुकाओ–एक पेड़ मां के नाम केवल एक संदेश नहीं बल्कि एक जनआंदोलन का आह्वान है। आइए, हम सब मिलकर इस पुनीत पर्व को उत्तराखंड की संस्कृति, प्रकृति और भविष्य से जोड़ते हुए एक समृद्ध और हरित राज्य की ओर दृढ़ कदम बढ़ाएं।</p>
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