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	<title>सर्वपितृ अमावस्या है पितृ ऋण उतारने का दिन &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>सर्वपितृ अमावस्या है पितृ ऋण उतारने का दिन &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>सर्वपितृ अमावस्या है पितृ ऋण उतारने का दिन, पढ़िए विशेष बाते</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Sep 2020 04:18:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़िए विशेष बाते]]></category>
		<category><![CDATA[सर्वपितृ अमावस्या है पितृ ऋण उतारने का दिन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="347" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg-300x168.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />&#8216;पितृपक्ष&#8217; एक प्रकार से पितरों का सामूहिक मेला होता है। इस पक्ष में सभी पितर पृथ्वीलोक में रहने वाले अपने-अपने सगे-संबंधियों के यहां बिना आह्वान किए भी पहुंचते हैं तथा अपने सगे-संबंधियों द्वारा प्रदान किए प्रसाद से तृप्त होकर उन्हें अनेकानेक शुभाशीर्वाद प्रदान करते हैं जिनके फलस्वरूप श्राद्धकर्ता अनेक सुखों को प्राप्त करते हैं। अत: &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="347" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg-300x168.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>&#8216;पितृपक्ष&#8217; एक प्रकार से पितरों का सामूहिक मेला होता है। इस पक्ष में सभी पितर पृथ्वीलोक में रहने वाले अपने-अपने सगे-संबंधियों के यहां बिना आह्वान किए भी पहुंचते हैं तथा अपने सगे-संबंधियों द्वारा प्रदान किए प्रसाद से तृप्त होकर उन्हें अनेकानेक शुभाशीर्वाद प्रदान करते हैं जिनके फलस्वरूप श्राद्धकर्ता अनेक सुखों को प्राप्त करते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-372750 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg" alt="" width="740" height="415" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/09/rrfg-300x168.jpg 300w" sizes="(max-width: 740px) 100vw, 740px" /></p>
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<div id="div-gpt-ad-1593067077351-0" data-google-query-id="CMn9wIfk5-sCFQsO1QodBJ4EBA">
<div>अत: श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों की संतुष्टि हेतु तथा अनंत व अक्षय तृप्ति हेतु एवं उनका शुभाशीर्वाद प्राप्त करने हेतु प्रत्येक मनुष्य को अपने पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जो लोग अपने पूर्वजों अर्थात पितरों की संपत्ति का उपभोग तो करते हैं, लेकिन उनका श्राद्ध नहीं करते, ऐसे लोग अपने ही पितरों द्वारा शप्त होकर नाना प्रकार के दुखों का भाजन बनते हैं।</div>
<div></div>
<div>जिस मृत पिता के एक से अधिक पुत्र हों और उनमें पिता की धन-संपत्ति का बंटवारा न हुआ हो तथा सभी संयुक्त रूप से एक जगह ही रहते हों तो ऐसी स्थिति में पिता का श्राद्ध आदि पितृकर्म सबसे बड़े पुत्र को ही करना चाहिए। सब भाइयों को अलग-अलग नहीं करना चाहिए।</div>
<div></div>
<div>यदि मृत पिता की संपत्ति का बंटवारा हो चुका हो तथा सभी पु&#x200d;त्र अलग-अलग रहते हों तो सभी पुत्रों को अलग-अलग श्राद्ध करना चाहिए। प्रत्येक सनातनधर्मी को अपने पूर्व की तीन पीढ़ियों- पिता, पितामही तथा प्रपितामही के साथ ही अपने नाना तथा नानी का भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।</div>
<div></div>
<div>इनके अतिरिक्त उपाध्याय, गुरु, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा, भाई, बहनोई, भतीजा,&#x200d; शिष्य, जामाता, भानजा, फूफा, मौसा, पुत्र, मित्र, विमाता के पिता एवं इनकी पत्नियों का भी श्राद्ध करने का शास्त्रों में निर्देश दिया गया है।</div>
<div></div>
<div>इन सभी दिवंगत व्यक्तियों की पुण्यतिथि के दिन ही इनका श्राद्ध करना चाहिए। मृत्युतिथि से तात्पर्य उस तिथि से है, जो तिथि अंतिम-श्वास परित्याग के समय विद्यमान हो। उसी तिथि को श्राद्धपक्ष में दोपहर के समय (दोपहर के समय साढ़े बारह से एक बजे तक) श्राद्ध करना चाहिए। अगर तिथि ज्ञात न हो तो सर्व पितृ अमावस्या को श्राद्ध करें।</div>
<div></div>
<div><strong>श्राद्ध संबंधी अन्य जानकारी &#8211;<br />
</strong></div>
<div></div>
<div>1. जिन व्यक्तियों की सामान्य एवं स्वाभाविक मृत्यु चतुर्दशी को हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को कदापि नहीं करना चाहिए, बल्कि पितृपक्ष की त्रयोदशी अथवा अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध करना चाहिए।</div>
<div></div>
<div>2. जिन व्यक्तियों की अपमृत्यु हुई हो, अर्थात किसी प्रकार की दुर्घटना, सर्पदंश, विष, शस्&#x200d;त्रप्रहार, हत्या, आत्महत्या या अन्य किसी प्रकार से अस्वा&#x200d;भाविक मृत्यु हुई हो, तो उनका श्राद्ध मृत्यु तिथि वाले दिन कदापि नहीं करना चाहिए। अपमृत्यु वाले व्यक्तियों को श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी ति&#x200d;थि को हुई हो।</div>
<div></div>
<div>3. सौभाग्यवती स्&#x200d;त्रियों की अर्थात पति के जीवित रहते हुए ही मरने वाली सुहागिन स्&#x200d;त्रियों का श्राद्ध भी केवल पितृपक्ष की नवमी तिथि को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी ति&#x200d;थि को हुई हो।</div>
<div></div>
<div>4. संन्यासियों का श्राद्ध केवल पितृपक्ष की द्वादशी को ही किया जाता है, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि को हुई हो।</div>
<div></div>
<div>5. नाना तथा नानी का श्राद्ध भी केवल अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को ही करना चाहिए, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो।</div>
<div></div>
<div>6.स्वाभाविक रूप से मरने वालों का श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा अथवा आश्विन कृष्ण अमावस्या को करना चाहिए।</p>
<div></div>
<div><strong>सर्वपितृ अमावस्या : पितृ ऋण  उतारने का दिन<br />
</strong></div>
<div></div>
<div>शास्त्रों में मनुष्य के तीन ऋण कहे गए हैं- देव ऋण, गुरु ऋण व पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है।</div>
<div></div>
<div>शास्त्रों में कहा गया है कि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य तथा सुख-सौभाग्य की वृद्धि के लिए अनेक प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निरर्थक होता है। इसे उतारना आवश्यक होता है।</div>
<div>
वर्षभर में एक बार अर्थात उनकी मृत्यु तिथि को जल, तिल, जौ, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करके और गौग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से यह ऋण उतर जाता है।</div>
<div></div>
<div>अत: सरलता से साध्य होने वाले इस कार्य की हमें उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इसके लिए जिस मास की &#x200d;जिस तिथि को माता-पिता आदि का देहावसान हुआ हो, उस तिथि पर श्राद्ध आदि करने के अलावा आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जब श्राद्ध लगे हों उसी &#x200d;तिथि को श्राद्ध, तर्पण, गौग्रास और ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है।</p>
<p>इससे पितृगण प्रसन्न होते हैं। लेकिन यदि तिथि ज्ञात न हो तो समस्त पितृ गण की उपस्थिति वाले अंतिम दिन उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए। और विधिविधान से श्राद्ध करना चाहिए।</p>
<p>सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने से किसी भी प्रकार का पितृ ऋण हो उससे मुक्ति मिलती है। लेकिन श्राद्ध और तर्पण &#x200d;\सुनियोजित ढंग से करना आवश्यक है।</p></div>
</div>
</div>
</div>
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