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	<title>वैज्ञानिकों ने चेताया &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>वैज्ञानिकों ने चेताया &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>दक्षिण भारत में बढ़ती जा रही है भारी बारिश और बाढ़ के संकेत , वैज्ञानिकों ने चेताया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Feb 2021 07:06:00 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[दक्षिण भारत में बढ़ती जा रही है भारी बारिश और बाढ़ के संकेत]]></category>
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					<description><![CDATA[भविष्य में जलवायु परिवर्तन से उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टी (पृथ्वी की भूमध्य रेखा के पास भारी वर्षा की एक संकीर्ण पट्टी) के असमान स्थानांतरण से भारत के कई हिस्सों में बाढ़ आने का सिलसिला बढ़ने की आशंका है। पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात को लेकर सचेत किया गया है। इसके &#8230;]]></description>
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<p>भविष्य में जलवायु परिवर्तन से उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टी (पृथ्वी की भूमध्य रेखा के पास भारी वर्षा की एक संकीर्ण पट्टी) के असमान स्थानांतरण से भारत के कई हिस्सों में बाढ़ आने का सिलसिला बढ़ने की आशंका है। पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात को लेकर सचेत किया गया है। इसके तहत 27 अत्याधुनिक जलवायु मॉडल का अध्ययन किया गया और भविष्य के उस परिदृश्य को लेकर उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टी की प्रतिक्रिया को मापा गया, जिसमें वर्तमान सदी के अंत तक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। इस अध्ययन के अनुसार, पूर्वी अफ्रीका और हिंद महासागर के ऊपर उष्णकटिबंधीय वर्षा पट्टी के उत्तर की ओर स्थानांतरित होने से दक्षिण भारत में बाढ़ की तीव्रता बढ़ सकती है और इससे 2100 तक वैश्विक जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="650" height="540" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/sxgvfdhbfh.jpg" alt="" class="wp-image-419080" /></figure>



<p>अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) के वैज्ञानिक इस अध्ययन में शामिल थे। उन्होंने कहा कि वर्षा पट्टी में यह बड़ा बदलाव जलवायु परिवर्तन के वैश्विक असर संबंधी पहले के अध्ययनों में सामने नहीं आया था। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया और उत्तर अटलांटिक महासागर में तापमान बढ़ा है। इस ताजा अध्ययन के तहत पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध क्षेत्र में प्रतिक्रिया को अलग-अलग करके भारत में आगामी दशकों में आने वाले बड़े बदलावों को रेखांकित किया गया है। अध्ययन के सह-लेखक एवं यूसी इरविन के वैज्ञानिक जेम्स रैंडरसन ने कहा कि एरोसोल उत्सर्जन में अनुमानित कमी, हिमालयी क्षेत्र में हिमनदी के पिघलने और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तरी क्षेत्रों में बर्फ का आवरण हटने से एशिया में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले अधिक तेजी से तापमान बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि इस गर्मी के कारण वर्षा पट्टी का स्थानांतरण और पूर्वी गोलार्ध में उत्तर की ओर इसकी गतिविधि जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों के अनुरूप है।</p>



<p><strong>एरोसोल</strong></p>



<p>सूक्ष्म ठोस कणों अथवा तरल बूंदों के हवा या किसी अन्य गैस में कोलाइड को एरोसोल कहा जाता है। एरोसोल प्राकृतिक या मानव जनित हो सकते हैं। हवा में उपस्थित एरोसोल को वायुमंडलीय एरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, वायुमंडलीय प्रदूषक कण तथा धुआं एरोसोल के उदाहरण हैं। सामान्य बातचीत में, एरोसोल फुहार को संदर्भित करता है, जो कि एक डब्बे या सदृश पात्र में उपभोक्ता उत्पाद के रूप में वितरित किया जाता है। तरल या ठोस कणों का व्यास 1 माइक्रोन या उससे भी छोटा होता है। बीते कुछ सालों में शोधकर्ताओं ने अब इस बात पर भी जोर देना शुरू किया है कि वाहनों के धुएं से, अधजले फसल अवशेषों से तथा धूल और रासायनिक अपशिष्ट से निकलने वाला एरोसोल जीवनदायी बरसात के मौसम को और भी अधिक कमज़ोर कर रहा है।&nbsp;</p>
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		<title>डिस्पोजेबल प्लास्टिक कप बिगाड़ते हैं आपकी सेहत, वैज्ञानिकों ने चेताया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 31 Jan 2021 07:02:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slide]]></category>
		<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[डिस्पोजेबल प्लास्टिक कप बिगाड़ते हैं आपकी सेहत]]></category>
		<category><![CDATA[वैज्ञानिकों ने चेताया]]></category>
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					<description><![CDATA[दुनिया में कई जगहों पर इस बात को लेकर लगातार अध्ययन हो रहा है कि पैकेज्ड और डिस्पोजेबल सामान आपके स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए किस तरह से हानिकारक हैं। इसी फेहरिस्त में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड्गपुर के एक अध्ययन में डिस्पोजेबल कप के इस्तेमाल को लेकर भी एक हिदायत दी गई है। इस &#8230;]]></description>
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<p>दुनिया में कई जगहों पर इस बात को लेकर लगातार अध्ययन हो रहा है कि पैकेज्ड और डिस्पोजेबल सामान आपके स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए किस तरह से हानिकारक हैं। इसी फेहरिस्त में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड्गपुर के एक अध्ययन में डिस्पोजेबल कप के इस्तेमाल को लेकर भी एक हिदायत दी गई है। इस अध्ययन में कहा गया है कि डिस्पोजेबल कप में चाय के इस्तेमाल से आपकी सेहत बिगड़ती है। सिविल इंजीनियरिंग विभाग की शोधकर्ता और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सुधा गोयल और पर्यावरण इंजीनियरिंग एवं प्रबंधन में अध्ययन कर रहे शोधकर्ता वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसेफ ने यह शोध किया है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="650" height="540" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/czaxzx.jpg" alt="" class="wp-image-416157" /></figure>



<p>रिसर्च में इस बात की पुष्टि हुई है कि कप के भीतर के अस्तर में इस्तेमाल सामग्री में सूक्ष्म-प्लास्टिक और अन्य खतरनाक घटकों की उपस्थिति होती है और उसमें गर्म तरल पदार्थ परोसने से उसमें दूषित कण आ जाते हैं। इन कपों को बनाने के लिए आम तौर पर हाइड्रोफोबिक फिल्म की एक परत चढ़ाई जाती है, जो मुख्तय: प्लास्टिक की बनी होती है। इसकी मदद से कप में तरल पदार्थ टिका रहता है। यह परत गर्म पानी डालने पर 15 मिनट के भीतर गलने लगती है।</p>



<p><strong>इतना प्लास्टिक निगल जाते हैं आप</strong></p>



<p>प्रोफेसर सुधा गोयल ने कहा कि हमारे अध्ययन के अनुसार एक पेपर कप में रखा 100 मिलीलीटर गर्म तरल पदार्थ 25,000 माइक्रोन आकार (10 माइक्रोन से 1000 माइक्रोन) के सूक्ष्म प्लास्टिक के कण छोड़ता है और यह प्रक्रिया कुल 15 मिनट में पूरी हो जाती है। इस प्रकार यदि एक औसत व्यक्ति प्रतिदिन तीन कप चाय या कॉफी पीता है तो वह मानव आंखों के लिए अदृश्य 75,000 छोटे सूक्ष्म प्लास्टिक के कणों को निगलता है।</p>



<p><strong>ऐसे किया गया शोध</strong></p>



<p>इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक कप में तरल पेय के उपयोग के कारण होने वाले हानिकारक सूक्ष्म कणों के रिसाव का अध्ययन दो तरीकों से किया है। सर्वप्रथम, 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी को पेपर कपों में डाला गया और फिर उन कपों में सूक्ष्म प्लास्टिक कणों एवं अन्य आयनों के रिसाव का अध्ययन किया गया है। दूसरी प्रक्रिया में, पेपर कपों को गुनगुने पानी (30-40 डिग्री सेल्सियस) में डाला गया और फिर जल-रोधी परत को सावधानीपूर्वक अलग कर लिया गया। अलग की गई प्लास्टिक परत को 85-90 डिग्री सेल्सियस पर गर्म विशुद्ध पानी के संपर्क में 15 मिनट तक रखा गया और फिर उसके भौतिक, रासायनिक एवं यांत्रिक गुणों का अध्ययन किया गया है।</p>



<p><strong>इसलिए तय किया गया 15 मिनट का समय</strong></p>



<p>15 मिनट का समय तय किये जाने के बारे में बताते हुए प्रो. गोयल ने कहा कि एक सर्वेक्षण में उत्तरदाताओं ने बताया कि चाय या कॉफी को कप में डाले जाने के 15 मिनट के भीतर उन्&#x200d;होंने इसे पी लिया था। इसी बात को आधार बनाकर यह शोध समय तय किया गया। सर्वेक्षण के परिणाम के अलावा, यह भी देखा गया कि इस अवधि में पेय अपने परिवेश के तापमान के अनुरूप हो गया।</p>



<p><strong>स्वास्थ्य के लिए है बेहद खतरनाक</strong></p>



<p>शोधकर्ताओं का कहना है कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण आयन, विषाक्त भारी धातुओं – पैलेडियम, क्रोमियम, कैडमियम और अन्य जैविक तत्वों के वाहक के रूप में कार्य करते हैं। अगर इन कणों की बात करें तो ये जल में घुलनशील नहीं है, जब ये मानव शरीर में प्रवेश करते हैं तो स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालकर आपको बीमार कर सकते हैं।</p>



<p><strong>क्या मिट्टी के उत्पाद हैं बेहतर</strong></p>



<p>क्या पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों का डिस्पोजेबल उत्&#x200d;पादों के स्&#x200d;थान पर इस्&#x200d;तेमाल किया जाना चाहिए? इस सवाल पर आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रो. वीरेंद्र के तिवारी ने कहा, “इस शोध से यह साबित होता है कि किसी भी अन्&#x200d;य उत्&#x200d;पाद के इस्&#x200d;तेमाल को बढ़ावा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह उत्&#x200d;पाद पर्यावरण के लिए प्रदूषक और जैविक दृष्टि से खतरनाक न हो। हमने प्लास्टिक और शीशे से बने उत्&#x200d;पादों को डिस्पोजेबल पेपर उत्&#x200d;पादों से बदलने में जल्&#x200d;दबाजी की थी, जबकि जरूरत इस बात की थी कि हम पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की तलाश करते। भारत पारंपरिक रूप से एक स्थायी जीवन शैली को बढ़ावा देने वाला देश रहा है और शायद अब समय आ गया है, जब हमें स्थिति में सुधार लाने के लिए अपने पिछले अनुभवों से सीखना होगा।</p>



<p><strong>अमेरिकी संस्था एफडीए ने प्लास्टिक को लेकर दी है चेतावनी</strong></p>



<p>अमेरिकी संस्था फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की मानें तो जब प्लास्टिक गर्म होता है तो उसमें से 50 से 60 अलग-अलग तरह के केमिकल्स निकलते हैं। ये सारे केमिकल्स हमारे शरीर के अंदर जाकर हमें कई तरह की बीमारियां देते हैं जैसे- ओवेरी से जुड़ी बीमारियां, ब्रेस्ट कैंसर, कोलोन कैंसर, प्रॉस्टेट कैंसर, पीसीओडी आदि।</p>



<p><strong>हर साल 10 हजार प्लास्टिक के कण खा रहा है इंसान!</strong></p>



<p>इंवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, वयस्क इंसान एक साल में माइक्रोप्लास्टिक के करीब 52,000 टुकड़े अपने शरीर में डाल सकता है। उदाहरण के लिए, जिस तरह की प्रदूषित हवा में हम जी रहे हैं, उसमें केवल सांस के जरिए ही 1.21 लाख माइक्रोप्लास्टिक के कण शरीर में जा सकते हैं, यानी कि हर दिन करीब 320 प्लास्टिक के टुकड़े। इसके अलावा अगर कोई इंसान सिर्फ बोतलबंद पानी पीता है तो एक साल में उसके शरीर में करीब 90,000 प्लास्टिक के टुकड़े जा सकते हैं। रिपोर्ट के लेखकों ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि ये आंकड़े अनुमान हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी इंसान के शरीर में प्लास्टिक के कितने कण जाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह कहां रहता है और क्या खाता है। &nbsp;</p>
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