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	<title>माता हिंगलाज जयंती &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी, माता हिंगलाज जयंती, जानिए 10 रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Apr 2021 04:28:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए 10 रहस्य]]></category>
		<category><![CDATA[माता हिंगलाज जयंती]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />इस वर्ष माता हिंगलाज की जयंती 9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी। हिन्दू कैलेंडर अनुसार चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को यह जयंती मनाई जाएगी। पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है माता हिंगलाज का मंदिर जो 51 शक्तिपीठों में से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>इस वर्ष माता हिंगलाज की जयंती 9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी। हिन्दू कैलेंडर अनुसार चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को यह जयंती मनाई जाएगी। पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है माता हिंगलाज का मंदिर जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। आओ जानते हैं खास जानकारी।</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-434473 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" alt="" width="740" height="555" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 740px) 100vw, 740px" /></p>
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<div>1. माता का मंदिर प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिंगलाज ही वह जगह है, जहां माता का सिर गिरा था। यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान शंकर भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। बृहन्नील तंत्रानुसार यहां सती का &#8216;ब्रह्मरंध्र&#8217; गिरा था। देवी के शक्तिपीठों में कामाख्या, कांची, त्रिपुरा, हिंगलाज प्रमुख शक्तिपीठ हैं। हिंगुला का अर्थ सिन्दूर है।</div>
<div></div>
<div>2. इस मंदिर की माता को संपूर्ण पाकिस्तान में नानी मां का मंदिर भी कहा जाता है। यहां की यात्रा को &#8216;नानी का हज&#8217; भी कहा जाता है। मुसलमान हिंगुला देवी को &#8216;नानी&#8217; तथा वहां की यात्रा को &#8216;नानी का हज&#8217; कहते हैं। हिन्दू से ज्यादा मुस्लिम माता को मानते हैं। पूरे बलूचिस्तान के मुसलमान भी इनकी उपासना एवं पूजा करते हैं। वे मुस्लिम स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है। मुसलमानों के लिए यह नानी पीर का स्थान है।</p>
<div>3. हिंगलाज क्षत्रिय समाज की कुल देवी हैं। कहते हैं, जब 21 बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम आए, तब बचे राजागण माता हिंगलाज देवी की शरण में गए और अपनी रक्षा की याचना की, तब मां ने उन्हें ब्रह्म क्षत्रिय कहकर अभयदान दिया। हिंगलाज शक्तिपीठ पश्चिमी राजस्थान के हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर पर गहरी आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, काशी के पानी में स्नान क्यों ना कर ले, अयोध्या के मंदिर में पूजा-पाठ क्यों ना कर लें, लेकिन अगर वह हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं करता तो यह सब व्यर्थ हो जाता है। प्रमुख रूप से यह मंदिर चारण वंश के लोगों की कुल देवी मानी जाती है। यह क्षे&#x200d;त्र भारत का हिन्सा ही था तब यहां लाखों हिन्दू एकजुट होते थे।</p>
<div>4. मां के मंदिर के नीचे अघोर नदी है। कहते हैं कि रावण वध के पश्चात् ऋषियों ने राम से ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति हेतु हिंगलाज में यज्ञ करके कबूतरों को दाना चुगाने को कहा। श्रीराम ने वैसे ही किया। उन्होंने ग्वार के दाने हिंगोस नदी में डाले। वे दाने ठूमरा बनकर उभरे, तब उन्हें ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति मिली। वे दाने आज भी यात्री वहां से जमा करके ले जाते हैं।</div>
<div></div>
<div>5. इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता व्याप्त है। कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।</div>
<div></div>
<div>6. भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तपस्या की थी। उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान अब भी यहां उपस्थित है। कहा जाता है कि इस प्रसिद्ध मंदिर में माता की पूजा करने को गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे महान आध्यात्मिक संत आ चुके हैं। 16वीं सदी में खाकी अखाड़ा के महंत भगवानदास जी ने सांसारिक लोगों के कल्याण के लिए बाड़ी में मां हिंगलाज को ज्योति के रूप में स्थापित किया था।</div>
<div></div>
<div>7. यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा में गुफा भी है। यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं। हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।</div>
<div></div>
<div>8. मुस्लिम काल में इस मंदिर पर मुस्लिम आक्रांतानों ने कई हमले किए लेकिन स्थानीय हिन्दू और मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं कि जब यह हिस्सा भारत के हाथों से जाता रहा तब कुछ आतंकवादियों ने इस मंदिर को क्षती पहुंचाने का प्रयास किया था लेकिन वे सभी के सभी एक चमत्कार से हवा में लटक गए थे।</div>
<div></div>
<div>9. हिंगलाज की यात्रा कराची से 10 किलोमीटर दूर हॉव नदी से शुरू होती है। हिंगलाज जाने के पहले लासबेला में माता की मूर्ति का दर्शन करना होता है। यह दर्शन छड़ीदार (पुरोहित) कराते हैं। वहां से शिवकुण्ड (चंद्रकूप) जाते हैं, जहां अपने पाप की घोषणा कर नारियल चढ़ाते हैं, जिनकी पाप मुक्ति हो गई और दरबार की आज्ञा मिल गई, उनका नारियल तथा भेंट स्वीकार हो जाती है वरना नारियल वापस लौट आता है। हिंगलाज को &#8216;आग्नेय शक्तिपीठ तीर्थ&#8217; भी कहते हैं, क्योंकि वहां जाने से पूर्व अग्नि उगलते चंद्रकूप पर यात्री को जोर-जोर से अपने गुप्त पापों का विवरण देना पड़ता है तथा भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न करने का वचन भी देना पड़ता है। इसके बाद चंद्रकूप दरबार की आज्ञा मिलती है। चंद्रकूप तीर्थ पहाड़ियों के बीच में धूम्र उगलता एक ऊंचा पहाड़ है। वहां विशाल बुलबुले उठते रहते हैं। आग तो नहीं दिखती किंतु अंदर से यह खौलता, भाप उगलता ज्वालामुखी है।</div>
<div></div>
<div>कहते हैं कि एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चूल चलेगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। चूल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बहार 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं और ये माता का चमत्कार ही है की मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती है और ना ही शरीर को किसी प्रकार का नुकसान होता है, लेकीन आपकी मन्नत जरूर पूरी होती है। हालांकि आजकल यह परंपरा नहीं रही।</div>
<div></div>
<div>10. इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं- एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। कराची से छह-सात मील चलकर &#8220;हाव&#8221; नदी पड़ती है। यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है। यहीं शपथ ग्रहण की क्रिया सम्पन्न होती है, यहीं पर लौटने तक की अवधि तक के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है। यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है। रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।</div>
</div>
</div>
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