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	<title>भगवान विष्णु &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>भगवान विष्णु &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>स्वर्ग से अमृत लाने वाले गरुड़ कैसे बने भगवान विष्णु के वाहन?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Sep 2026 05:12:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="473" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg 626w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3-300x230.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को एक अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन किया गया है। अठारह महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को सुनाया गया था। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ हैं। हिंदू धर्म में प्रभु &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="473" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg 626w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3-300x230.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को एक अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन किया गया है। अठारह महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को सुनाया गया था। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ हैं।</p>



<p>हिंदू धर्म में प्रभु के वाहन को शक्ति, गति, निष्ठा और धर्म का प्रतीक माना जाता है। क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना वाहन क्यों बनाया? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके पीछे की वजह के बारे में विस्तार से बताते हैं।</p>



<p><strong>गरुड़ कैसे बने विष्णु जी के वाहन?<br></strong>पौराणिक कथा के अनुसार, गरुड़ की माता का नाम विनता था। वे नागों की माता कद्रू की दासी थीं। कद्रू ने गरुड़ से कहा कि अगर तुम मेरे पुत्रों के लिए स्वर्ग से अमृत ला दोगे, तो तुम्हारी माता दासत्व से मुक्त हो जाएंगी।</p>



<p>समुद्र मंथन से देवताओं ने असुरों से जो अमृत कलश प्राप्त किया था, उसे गरुड़ देवताओं से छीन लाए थे। इसके पीछे की वजह यह थी कि गरुड़ अपनी माता को नागों की माता कद्रू की दासता से छुटकारा दिलाना चाहते थे। जब गरुड़ स्वर्ग पहुंचे, तो उन्होंने वहां से अमृत का कलश ले लिया। सभी देवताओं ने गरुड़ से अमृत का कलश बचाने के लिए खूब प्रयास किया, लेकिन गरुड़ कलश को लेकर उड़ गए। इसके बाद जब गरुड़ कलश लेकर कद्रू के पास पहुंचे, तो उन्होंने कद्रू से कहा कि मैं कलश ले आया हूं। अब आप मेरी माता को मुक्त कर दें। कद्रू ने अपने वचन के अनुसार विनता को मुक्त कर दिया। इसके बाद देवराज इंद्र अमृत का कलश उठाकर वापस स्वर्ग लोक ले गए।</p>



<p>जब इस बात का पता नागों को चला, तो वे बहुत ही दुखी हुए। अमृत की लालसा में वे उस कुशा को ही चाटने लगे जिस पर कलश रखा गया था। कुशा के तेज किनारों की वजह से उनकी जीभ हमेशा के लिए दो हिस्सों में कट गई।</p>



<p>गरुड़ की मातृभक्ति को देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि पक्षीराज मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं और चाहता हूं कि तुम मेरे वाहन के रूप में सदैव मेरे साथ रहो। भगवान विष्णु के इस प्रस्ताव को गरुड़ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। गरुड़ ने कहा कि वे स्वयं को बहुत धन्य मानते हैं और अब से अपना जीवन प्रभु की सेवा में व्यतीत करेंगे। इसी प्रकार गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बने। गरुड़ के वाहन बनने का वर्णन गरुड़ पुराण के आचार खंड में मिलता है।</p>
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		<title>भगवान विष्णु ने कृष्णावतार देवकी और वसुदेव के ही घर क्यों लिया?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Aug 2026 04:59:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="386" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17.jpg 798w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17-300x187.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17-768x479.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में बताया गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध के तीसरे अध्याय में भगवान कृष्ण के जन्म से जुड़ा विस्तृत वर्णन मिलता है। पद्म पुराण सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी उनके अवतार से संबंधित कथाएं बताई गई हैं। धार्मिक मान्यता &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="386" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17.jpg 798w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17-300x187.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/4-17-768x479.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में बताया गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंध के तीसरे अध्याय में भगवान कृष्ण के जन्म से जुड़ा विस्तृत वर्णन मिलता है। पद्म पुराण सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी उनके अवतार से संबंधित कथाएं बताई गई हैं।</p>



<p>धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर जन्म लेने का निर्णय कुछ विशेष कारणों से लिया था। इसके पीछे उनके पिछले जन्मों की तपस्या और भगवान से प्राप्त वरदान था। चलिए इस बारे में विस्&#x200d;तार से समझने का प्रयास करते हैं।</p>



<p><strong>पिछले जन्म में कौन थे देवकी और वसुदेव?<br></strong>धार्मिक कथा के अनुसार पिछले जन्म में देवकी और वसुदेव पृश्नि और सुतपा नाम के दंपती थे। दोनों भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे और उन्होंने भगवान को प्रसन्न करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी।</p>



<p>कहा जाता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। भगवान को अपने सामने देखकर पृश्नि और सुतपा ने उनसे पुत्र रूप में प्राप्त होने की इच्छा व्यक्त की।</p>



<p><strong>भगवान विष्णु ने दिया था वरदान<br></strong>पृश्नि और सुतपा की भक्ति से भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न हुए। उनकी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि वे तीन जन्मों में उनके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।</p>



<p>इस वरदान के कारण भगवान विष्णु का तीन अलग-अलग जन्मों में उनके पुत्र के रूप में आने का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। जब इस दंपती ने देवकी और वसुदेव के रूप में जन्म लिया तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में उनके घर अवतार लिया।</p>



<p><strong>पहला जन्म: पृश्निगर्भ<br></strong>मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने सबसे पहले पृश्नि और सुतपा के पुत्र के रूप में जन्म लिया। इस अवतार को पृश्निगर्भ नाम से जाना जाता है।</p>



<p>यह भगवान विष्णु के उस वरदान की पहली पूर्ति मानी जाती है, जो उन्होंने पृश्नि और सुतपा को दिया था</p>



<p><strong>दूसरा जन्म: वामन अवतार<br></strong>इसके बाद वही दंपती दूसरे जन्म में कश्यप और अदिति के रूप में जन्मे। इस जन्म में भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में वामन अवतार लिया।</p>



<p>वामन अवतार में भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी। धार्मिक कथा के अनुसार तीन पग में उन्होंने पृथ्वी, आकाश और अन्य लोकों को नाप लिया था।</p>



<p><strong>तीसरा जन्म: श्रीकृष्ण<br></strong>तीसरे जन्म में पृश्नि और सुतपा का जन्म देवकी और वसुदेव के रूप में हुआ। अपने पुराने वरदान को पूरा करने के लिए भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार लिया।</p>



<p>भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में हुआ, जहां देवकी और वसुदेव को कंस ने बंदी बना रखा था। जन्म के बाद वसुदेव ने कृष्ण को गोकुल पहुंचाया, जहां उनका पालन-पोषण नंद और यशोदा के घर हुआ।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>भगवान विष्णु को करना है प्रसन्न? तो इस शुभ मुहूर्त में करें परम एकादशी व्रत का पारण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 05:07:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="495" height="326" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6.jpg 495w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6-300x198.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6-310x205.jpg 310w" sizes="auto, (max-width: 495px) 100vw, 495px" />हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान किया जाता है। इससे साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ (अधिक) मास के कृष्ण पक्ष में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="495" height="326" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6.jpg 495w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6-300x198.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/2-6-310x205.jpg 310w" sizes="auto, (max-width: 495px) 100vw, 495px" />
<p>हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान किया जाता है। इससे साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ (अधिक) मास के कृष्ण पक्ष में परम एकादशी व्रत किया जाता है।</p>



<p>धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। ऐसा माना जाता है कि परम एकादशी व्रत का पारण न करने से साधक को व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। इसलिए शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण जरूर करें। ऐसे में आइए आपको बताते हैं कि कब और कैसे करें परम एकादशी व्रत का पारण?</p>



<p><strong>परम एकादशी 2026 डेट और शुभ मुहूर्त (Parama Ekadashi 2026 Date and Shubh Muhurat)<br></strong>वैदिक पंचांग के अनुसार, परम एकादशी व्रत 11 जून को किया जाएगा।<br>अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत- 11 जून को रात 12 बजकर 57 मिनट पर<br>अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का समापन- 11 जून को रात 10 बजकर 36 मिनट पर<br>व्रत का पारण करने का समय- 12 जून को सुबह 05 बजकर 23 मिनट से 08 बजकर 10 मिनट तक</p>



<p>ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 42 मिनट से 04 बजकर 42 मिनट तक<br>अभिजित मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 53 मिनट से 12 बजकर 49 मिनट तक<br>विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 40 मिनट से 02 बजकर 36 मिनट तक<br>गोधूलि मुहूर्त – शाम 07 बजकर 18 मिनट से 07 बजकर 38 मिनट तक<br>निशिता मुहूर्त – रात 12 बजकर 01 मिनट से 12 बजकर 41 मिनट तक</p>



<p>सर्वार्थ सिद्धि योग- पूरे दिन</p>



<p><strong>व्रत पारण विधि<br></strong>एकादशी व्रत का पारण द्वादशी के दिन करना चाहिए।<br>इस दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े धारण करें।<br>गंगाजल का छिड़काव कर शुद्ध करें।<br>इसके बाद देसी घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की साधना करें।<br>सच्चे मन से मंत्रों का जप और विष्णु चालीसा का पाठ करें।<br>प्रभु का सात्विक भोजन का भोग लगाएं।<br>जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति के लिए कामना करें।<br>द्वादशी के दिन अन्न-धन समेत आदि चीजों का दान जरूर करना चाहिए। इससे साधक को व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।<br>आखिर लोगों में प्रसाद बांटें और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>क्षीरसागर में शेषनाग पर क्यों विराजते हैं भगवान विष्णु?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2026 04:54:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="409" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7.jpg 738w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7-300x198.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7-310x205.jpg 310w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति के लिए व्रत भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीहरि की साधना करने से साधक के जीवन में खुशियों का आगमन होता है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="409" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7.jpg 738w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7-300x198.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/7-7-310x205.jpg 310w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को समर्पित है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति के लिए व्रत भी किया जाता है।</p>



<p>धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रीहरि की साधना करने से साधक के जीवन में खुशियों का आगमन होता है और कामों में आ रही बाधा दूर होती है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में विशाल शेषनाग की शय्या पर शांत मुद्रा में विश्राम करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर क्यों विश्राम करते हैं। अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए आपको बताते हैं इसकी वजह के बारे में।</p>



<p><strong>क्या है क्षीरसागर का अर्थ<br></strong>क्षीर का अर्थ दूध है। दूध सात्विकता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। भवगान विष्णु जी का दूध के सागर में वास यह दर्शाता है कि ईश्वर हमेशा शुद्ध और पवित्र हृदय में ही निवास करते हैं। यदि मन दूध की तरह साफ होगा, तो वहां ईश्वर का वास जरूर होगा।</p>



<p><strong>शेषनाग का रहस्य<br></strong>शेष का अर्थ है जो अंत में बच जाए। जब पूरी दुनिया नष्ट हो जाती है। इसके बाद भी वह शेषनाग बचा रहता है। शेषनाग इसी अनंत समय के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन करना यह बताता है कि परमेश्वर समय और काल से भी ऊपर हैं।</p>



<p>भगवान विष्णु का क्षीरसागर में शेषनाग पर विराजते हुए यह दर्शाता है कि लोगों के जीवन में चाहे कितनी भी परेशानी आ जाए, लेकिन अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए। इसके अलावा भगवान विष्णु का शेषनाग पर विश्राम करना यह भी दर्शाता है कि श्री हरि ने अपनी इच्छाओं और मोह-माया को अपने काबू में कर रखा है। क्षीरसागर में भगवान विष्णु के शेषनाग पर लेटने की इस अवस्था को योगनिद्रा के नाम से जाना जाता है। वह इस दौरान में गहरे ध्यान में ब्रह्मांड के संचालन का चिंतन कर रहे होते हैं।</p>



<p><strong>शास्त्रों में मिलता है वर्णन<br></strong>भगवान विष्णु की इस महिमा का विस्तार से वर्णन विष्णु पुराण में देखने को मिलता है। इसमें बताया गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पहले विष्णु जी शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन रहते हैं।</p>
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		<title>जल के अलावा तुलसी में चढ़ाएं ये चीजें, पाएं मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 05:27:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="396" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1.jpg 910w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1-300x192.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1-768x492.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। इसका संबंध प्रभु श्रीहरि से माना जाता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि तुलसी में लक्ष्मी जी का वास होता है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, कि तुलसी में जल के अलावा और कौन-कौन सी चीजें अर्पित &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="396" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1.jpg 910w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1-300x192.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/78-1-768x492.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>तुलसी के पौधे को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया जाता है। इसका संबंध प्रभु श्रीहरि से माना जाता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि तुलसी में लक्ष्मी जी का वास होता है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं, कि तुलसी में जल के अलावा और कौन-कौन सी चीजें अर्पित करने से आपको भगवान विष्णु और धन की देवी की कृपा मिल सकती है।</p>



<p><strong>घर में बनी रहेगी सुख-शांति<br></strong>गुरुवार या शुक्रवार को आप तुलसी में जल में थोड़ा-सा कच्चा दूध मिलाकर अर्पित कर सकते हैं। ऐसा करने से साधक को भगवान विष्णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी की भी कृपा की प्राप्ति होती है। जिससे साधक के लिए धन लाभ के योग बनने लगते हैं और घर में सुख-शांति बनी रहती है।</p>



<p><strong>दूर होंगे सभी कष्ट<br></strong>जल के अलावा आप तुलसी में गन्ने का रस भी अर्पित कर सकते हैं। हर महीने की पंचमी तिथि पर तुलसी की जड़ में गन्ने का रस अर्पित करना काफी शुभ माना गया है। इससे जातक के जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है।</p>



<p><strong>धन-धान्य का मिलेगा आशीर्वाद<br></strong>आप तुलसी में जल अर्पित करते समय उसमें एक चुटकी हल्दी या केसर मिलाकर भी अर्पित कर सकते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से दरिद्रता दूर होती है। इसके साथ ही आप जल में थोड़ी- सी मिश्री मिलाकर भी तुलसी में अर्पित कर सकते हैं। इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और साधक को धन-धान्य का आशीर्वाद देती हैं।</p>



<p><strong>जरूर करें ये काम<br></strong>तुलसी के पौधे (Tulsi Puja) में हर महीने एक कलावा या रक्षा सूत्र जरूर बांधना चाहिए। ऐसा करना बहुत ही शुभ माना जाता है, जिससे घर में मौजूद नकारात्मकता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। इसके अलावा आप रोजाना शाम को तुलसी के पास घी का दीपक भी जरूर जलाएं, जो विशेष फलदायी माना जाता है।</p>
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