<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>पाठ &#8211; Live Halchal</title>
	<atom:link href="https://livehalchal.com/tag/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://livehalchal.com</link>
	<description>Latest News, Updated News, Hindi News Portal</description>
	<lastBuildDate>Fri, 12 Dec 2025 04:47:26 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2023/10/cropped-Live-Halchal-512-32x32.jpg</url>
	<title>पाठ &#8211; Live Halchal</title>
	<link>https://livehalchal.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>धन की देवी को प्रसन्न करने का महामंत्र, हर शुक्रवार करें श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%87/648329</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Dec 2025 04:30:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पाठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://livehalchal.com/?p=648329</guid>

					<description><![CDATA[<img width="341" height="370" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj.jpg 341w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj-medium.jpg 276w" sizes="(max-width: 341px) 100vw, 341px" />वैसे, तो मां लक्ष्मी का स्मरण प्रतिदिन करना चाहिए, लेकिन शुक्रवार का दिन विशेष रूप से धन की देवी के लिए समर्पित है। इसलिए, शुक्रवार के दिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसे में चलिए पढ़ते हैं श्री लक्ष्मी चालीसा। श्री लक्ष्मी चालीसा दोहा मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="341" height="370" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj.jpg 341w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/ikj-medium.jpg 276w" sizes="(max-width: 341px) 100vw, 341px" />
<p>वैसे, तो मां लक्ष्मी का स्मरण प्रतिदिन करना चाहिए, लेकिन शुक्रवार का दिन विशेष रूप से धन की देवी के लिए समर्पित है। इसलिए, शुक्रवार के दिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। ऐसे में चलिए पढ़ते हैं श्री लक्ष्मी चालीसा।</p>



<p><strong>श्री लक्ष्मी चालीसा <br></strong>दोहा</p>



<p>मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।</p>



<p>मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥</p>



<p>सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।</p>



<p>ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥</p>



<p>सोरठा</p>



<p>यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।</p>



<p>सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥</p>



<p>॥ चौपाई ॥</p>



<p>सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥</p>



<p>तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥</p>



<p>जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥</p>



<p>तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥</p>



<p>जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥</p>



<p>विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।</p>



<p>केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥</p>



<p>कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥</p>



<p>ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥</p>



<p>क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥</p>



<p>चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥</p>



<p>जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥</p>



<p>स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥</p>



<p>तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥</p>



<p>अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥</p>



<p>तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥</p>



<p>मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥</p>



<p>तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥</p>



<p>और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥</p>



<p>ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥</p>



<p>त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥</p>



<p>जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥</p>



<p>ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।</p>



<p>पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥</p>



<p>विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥</p>



<p>पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥</p>



<p>सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥</p>



<p>बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥</p>



<p>प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥</p>



<p>बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥</p>



<p>करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥</p>



<p>जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥</p>



<p>तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥</p>



<p>मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥</p>



<p>भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥</p>



<p>बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥</p>



<p>नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥</p>



<p>रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥</p>



<p>कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥</p>



<p>रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥</p>



<p><strong>दोहा</strong></p>



<p>त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।</p>



<p>जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥</p>



<p>रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।</p>



<p>मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥</p>



<p>।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।</p>



<p><strong>लक्ष्मी चालीसा पाठ के लाभ</strong></p>



<p>धन-संपत्ति &#8211; दरिद्रता दूर होती है और घर में सुख-संपत्ति आती है।</p>



<p>रोग निवारण &#8211; जो साधक इसे ध्यान से सुनता या पढ़ता है, उसे रोगों से मुक्ति मिलती है।</p>



<p>कष्टों से मुक्ति &#8211; देवी लक्ष्मी भक्तों के सभी संकटों का नाश करती हैं।</p>



<p><strong>श्री लक्ष्मी चालीसा का भावार्थ <br></strong>श्री लक्ष्मी चालीसा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि मां महालक्ष्मी के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रार्थना है। इसका संक्षिप्त भावार्थ इस प्रकार है &#8211;</p>



<p>आवाहन और स्तुति: भक्त मां लक्ष्मी से प्रार्थना करता है कि वे उसके हृदय में वास करें और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करें। भक्त उन्हें &#8216;सिंधु सुता&#8217; (समुद्र की बेटी) और &#8216;विष्णु प्रिया&#8217; (भगवान विष्णु की पत्नी) कहकर नमन करता है। मां का स्वरूप और उत्पत्ति &#8211; चालीसा में वर्णन है कि जब देवताओं और असुरों ने क्षीर सागर (समुद्र) का मंथन किया, तब 14 रत्नों के साथ मां लक्ष्मी प्रकट हुईं।</p>



<p>पाठ करने की विधि और नियम &#8211; चालीसा में स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति छल, कपट और चतुराई को त्यागकर सच्चे मन से मां की पूजा करता है, उसे ही फल मिलता है। विश्वास और नियम के साथ व्रत और पाठ करने से ही सिद्धि प्राप्त होती है।</p>



<ol class="wp-block-list">
<li></li>
</ol>



<p><strong>अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)<br></strong>प्रश्न 1: लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने के लिए सप्ताह का कौन-सा दिन सबसे शुभ है?<br>उत्तर: वैसे तो लक्ष्मी चालीसा का पाठ रोजाना किया जा सकता है, लेकिन शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी को समर्पित है। इसलिए, शुक्रवार को इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी और उत्तम माना गया है।</p>



<p>प्रश्न 2: लक्ष्मी चालीसा के पाठ से क्या मुख्य लाभ मिलते हैं?<br>उत्तर: लक्ष्मी चालीसा के अनुसार, इसके पाठ से मनुष्य को ज्ञान, बुद्धि और अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है। साथ ही, यह पाठ दरिद्रता, रोग और शत्रुओं के भय को दूर करता है।</p>



<p>प्रश्न 3: क्या लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने के लिए किसी विशेष नियम का पालन करना चाहिए?<br>उत्तर: हां, चालीसा में लिखा है- &#8220;तजि छल कपट और चतुराई, पूजहिं विविध भांति मन लाई।&#8221; अर्थात, पाठ करते समय मन में किसी के प्रति छल-कपट नहीं होना चाहिए। पूर्ण विश्वास, पवित्रता और एकाग्रता के साथ ही पाठ करना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भौम प्रदोष व्रत आज, जरूर करें इस कथा का पाठ</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%ad%e0%a5%8c%e0%a4%ae-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b7-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%86%e0%a4%9c-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b0/646515</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Dec 2025 04:49:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पाठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://livehalchal.com/?p=646515</guid>

					<description><![CDATA[<img width="495" height="314" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3.jpg 495w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3-medium.jpg 300w" sizes="(max-width: 495px) 100vw, 495px" />भौम प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से रोग मुक्ति, कर्ज से छुटकारा और जीवन में खुशहाली आती है। इस बार भौम प्रदोष व्रत 02 दिसंबर 2025 यानी आज के दिन रखा जा रहा है। वहीं, जो साधक इस कठिन व्रत का पालन करते हैं, &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="495" height="314" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3.jpg 495w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/sdcv-3-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 495px) 100vw, 495px" />
<p>भौम प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से रोग मुक्ति, कर्ज से छुटकारा और जीवन में खुशहाली आती है। इस बार भौम प्रदोष व्रत 02 दिसंबर 2025 यानी आज के दिन रखा जा रहा है। वहीं, जो साधक इस कठिन व्रत का पालन करते हैं, उन्हें इसकी पावन कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, क्योंकि इसके पाठ के बिना व्रत का फल नहीं मिलता है, तो आइए इसकी कथा का पाठ करते हैं, जो इस प्रकार हैं –</p>



<p><strong>भौम प्रदोष व्रत का महत्व<br></strong>मंगलवार को आने वाले इस प्रदोष व्रत को करने से भक्तों को भगवान शिव और मंगल ग्रह दोनों का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है, जो लंबे समय से किसी बीमारी से जूझ रहे हैं। इसके अलावा इस व्रत का पालन करने से कर्ज मुक्ति, जीवन में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास आता है, और कुंडली से मंगल के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।</p>



<p><strong>भौम प्रदोष व्रत की पावन कथा<br></strong>एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी और एक पुत्र था। एक दिन, ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र को लेकर कमाने के लिए दूसरे शहर की ओर चला। रास्ते में उन्हें एक किसान मिला, जो अपनी पत्नी के साथ गायों को चरा रहा था। किसान ने उन्हें आश्रय दिया। उसी स्थान पर, ब्राह्मण की भेंट एक सिद्ध महात्मा से हुई। महात्मा ने ब्राह्मण से कहा कि वह प्रदोष व्रत का पालन करे, जो सभी दुखों को दूर करने वाला है। ब्राह्मण ने महात्मा की बात मानकर विधिपूर्वक प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में, ब्राह्मण के जीवन में परिवर्तन आने लगा। उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई और उसे सुख-शांति मिली।</p>



<p>एक बार, ब्राह्मण अपनी पत्नी और पुत्र के साथ एक नगर से गुजर रहा था। उस नगर में एक अनाथ राजकुमारी थी, जिसके पिता का राज्य छिन गया था। राजकुमारी बहुत दुखी थी और एक पेड़ के नीचे बैठ कर रो रही थी। ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के कहने पर, दुखी राजकुमारी को सहारा दिया और उसे अपने घर ले आया।</p>



<p>ब्राह्मण ने राजकुमारी को भी प्रदोष व्रत की महिमा बताई। राजकुमारी ने भौम प्रदोष व्रत रखना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद, राजकुमार, जिसने राजकुमारी का राज्य छीना था, एक युद्ध में बुरी तरह घायल हो गया। राजकुमारी की भक्ति और व्रत के प्रभाव से शिव जी ने उस राजकुमार को सपने में दर्शन दिए और उसे राजकुमारी से क्षमा मांगने को कहा। राजकुमार ने राजकुमारी से विवाह किया और उसे उसका राज्य वापस लौटा दिया। इस तरह प्रदोष व्रत के प्रभाव से राजकुमारी को उसका खोया हुआ सुख और साम्राज्य वापस मिला।</p>



<p><strong>।।शिवजी की आरती।।<br></strong>ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।</p>



<p>ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>एकानन चतुरानन पंचानन राजे।</p>



<p>हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे ।</p>



<p>त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।</p>



<p>चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।</p>



<p>सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी।</p>



<p>सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।</p>



<p>प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>



<p>त्रिगुणस्वामी जी की आरति, जो कोइ नर गावे।</p>



<p>कहत शिवानंद स्वाम, सुख संपति पावे ॥</p>



<p>ॐ जय शिव ओंकारा…</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मोक्षदा एकादशी के दिन जरूर करें इस कथा का पाठ</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a5%82/646334</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Dec 2025 04:40:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पाठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://livehalchal.com/?p=646334</guid>

					<description><![CDATA[<img width="476" height="286" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb.jpg 476w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 476px) 100vw, 476px" />सनातन शास्त्रों में मोक्षदा एकादशी का विशेष महत्व बताया गया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। ऐसा माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी के दिन कथा का पाठ करने से साधक को शुभ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="476" height="286" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb.jpg 476w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/12/vb-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 476px) 100vw, 476px" />
<p>सनातन शास्त्रों में मोक्षदा एकादशी का विशेष महत्व बताया गया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। ऐसा माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी के दिन कथा का पाठ करने से साधक को शुभ फल मिलता है। साथ ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। आइए पढ़ते हैं मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा।</p>



<p><strong>मोक्षदा एकादशी व्रत कथा<br></strong>पौराणिक कथा के अनुसार, चंपकनगर नाम के राज्य में वैखानस<br>नामक राजा राज्य करता था। इस राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे। एक बार राजा को बुरा सपना आया। उसने देखा कि उसके पूर्वज नरक में पड़े हैं। इस सपने को देख राजा बेहद दुखी हुआ। इस सपने के बारे में राजा ने ब्राह्मणों को बताया। राजा ने ब्राह्मणों से कहा कि सपने में पूर्वज नरक में निकालने की गुहार लगा रहे थे। राजा ने कहा कि इस सपने को देख मुझे बेहद दुख हो रहा है। जब से इस सपने को देखा है तब से मैं बहुत ही बैचेन हूं।</p>



<p><strong>राजा ने ऋषि को बताया सपना<br></strong>उन्होंने कहा कि ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? ब्राह्मणों ने बताया कि यहीं पास में पर्वत ऋषि का आश्रम है। वहां भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता हैं। आपकी समस्या का समाधान ऋषि जरूर करेंगे। ब्राह्मणों की आज्ञा का पालन कर राजा ऋषि मुनि के आश्रम में पहुंचा। उसने ऋषि को सपने के बारे में बताया।</p>



<p><strong>ऋषि ने राजा को दी ये सलाह<br></strong>राजा ने कहा कि मेरे पूर्वज नरक भोग रहे हैं। ऐसे में मैं बहुत असहाय महसूस कर रहा हूं। उनको मैं नरक से कैसे निकालूं। ऋषि ने राजा को मार्गशीर्ष माह के शुक्&#x200d;ल पक्ष एकादशी तिथि का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत को करने से पितर नरक से मुक्त हो जाएंगे। इसके बाद राजा ने विधिपूर्वक व्रत मोक्षदा एकादशी व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा का पूर्वज बुरे कर्मों से मुक्त हो गए।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>विनायक चतुर्थी पर करें इस कथा का पाठ</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%87%e0%a4%b8-2/645086</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Nov 2025 04:28:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पाठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://livehalchal.com/?p=645086</guid>

					<description><![CDATA[<img width="297" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/vfgbc-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" />विनायक चतुर्थी का व्रत बेहद शुभ माना जाता है। यह पर्व हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। इस दिन पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन के सभी दुखों का नाश होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार विनायक चतुर्थी आज &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="297" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/vfgbc-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" />
<p>विनायक चतुर्थी का व्रत बेहद शुभ माना जाता है। यह पर्व हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। इस दिन पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन के सभी दुखों का नाश होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार विनायक चतुर्थी आज यानी 24 नवंबर को मनाई जा रही है, जो साधक इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें इसकी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए, जो इस प्रकार हैं &#8211;</p>



<p><strong>विनायक चतुर्थी की व्रत कथा<br></strong>एक बार भगवान गणेश ने चंद्र देव के अहंकार को तोड़ने के लिए एक लीला रचाई। बप्पा को उनके गज-मुख और बड़े पेट के कारण एक बार चंद्रमा ने उपहास किया। चंद्र देव के इस व्यवहार से गणेश जी बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि जो कोई भी उन्हें चतुर्थी के दिन देखेगा, उसे झूठे आरोपों का सामना करना पड़ेगा और उसके जीवन में कलंक लगेगा।</p>



<p>गणेश जी के इस श्राप के कारण चंद्रमा का तेज भी घट गया और वे बहुत परेशान हो गए। इस घटना से सभी देवता भी परेशान हो गए। कुछ समय बाद, भगवान कृष्ण पर स्यमंतक मणि चोरी का झूठा आरोप लगा। ऐसा माना जाता हैं कि यह आरोप विनायक चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन के कारण ही लगा था। आरोप से मुक्ति पाने के लिए भगवान कृष्ण ने चतुर्थी का व्रत किया और गणेश जी की पूजा की।</p>



<p>जब देवताओं ने गणेश जी से इस श्राप को वापस लेने की प्रार्थना की, तो गणेश जी ने कहा कि श्राप पूरी तरह से वापस नहीं लिया जा सकता, लेकिन इसका प्रभाव कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जो कोई भी चतुर्थी के दिन मेरी पूजा करेगा और इस कथा को पढ़ेगा या सुनेगा, उस पर झूठे आरोप नहीं लगेंगे और उसके सभी संकट दूर हो जाएंगे।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भगवान शिव का अभिषेक करते समय करें शिव सहस्त्रनाम का पाठ</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b8/644364</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Nov 2025 04:28:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पाठ]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://livehalchal.com/?p=644364</guid>

					<description><![CDATA[<img width="303" height="252" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9.jpg 303w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 303px) 100vw, 303px" />अमावस्या तिथि देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। वहीं, पूजा के समय गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। इस शुभ तिथि पर जातक गंगा तट पर पूजा, जप-तप और दान-पुण्य करते हैं। ज्योतिषियों की मानें तो &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="303" height="252" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9.jpg 303w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/11/cvv-9-medium.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 303px) 100vw, 303px" />
<p>अमावस्या तिथि देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। वहीं, पूजा के समय गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। इस शुभ तिथि पर जातक गंगा तट पर पूजा, जप-तप और दान-पुण्य करते हैं।</p>



<p>ज्योतिषियों की मानें तो गुरुवार 20 नवंबर यानी मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इन योग में भगवान शिव की पूजा करने से साधक को अक्षय फल की प्राप्ति होगी। साथ ही सभी संकटों से मुक्ति मिलेगी।</p>



<p>अगर आप भी भगवान शिव की कृपा के भागी बनना चाहते हैं, तो मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन स्नान-ध्यान के बाद गंगाजल से महादेव का अभिषेक करें। वहीं, अभिषेक के समय शिव सहस्त्रनाम का पाठ करें।</p>



<p><strong>शिव सहस्त्रनाम स्तोत्र</strong></p>



<p>शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं</p>



<p>शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षभागे वहन्तम् ।</p>



<p>नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे</p>



<p>नानालङ्कारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ॥</p>



<p>स्तोत्रम् ।</p>



<p>ओं स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः प्रवरो वरदो वरः ।</p>



<p>सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः ॥</p>



<p>जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः ।</p>



<p>हरश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥</p>



<p>प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च नियतः शाश्वतो ध्रुवः ।</p>



<p>श्मशानवासी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः ॥</p>



<p>अभिवाद्यो महाकर्मा तपस्वी भूतभावनः ।</p>



<p>उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥</p>



<p>महारूपो महाकायो वृषरूपो महायशाः ।</p>



<p>महात्मा सर्वभूतात्मा विश्वरूपो महाहनुः ॥</p>



<p>लोकपालोऽन्तर्हितात्मा प्रसादो हयगर्दभिः ।</p>



<p>पवित्रं च महांश्चैव नियमो नियमाश्रितः ॥</p>



<p>सर्वकर्मा स्वयम्भूत आदिरादिकरो निधिः ।</p>



<p>सहस्राक्षो विशालाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥</p>



<p>चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्ग्रहो ग्रहपतिर्वरः ।</p>



<p>अत्रिरत्र्या नमस्कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥</p>



<p>महातपा घोरतपा अदीनो दीनसाधकः ।</p>



<p>संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥</p>



<p>योगी योज्यो महाबीजो महारेता महाबलः ।</p>



<p>सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो बीजवाहनः ॥</p>



<p>दशबाहुस्त्वनिमिषो नीलकण्ठ उमापतिः ।</p>



<p>विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरो बलो गणः ॥</p>



<p>गणकर्ता गणपतिर्दिग्वासाः काम एव च ।</p>



<p>मन्त्रवित्परमो मन्त्रः सर्वभावकरो हरः ॥</p>



<p>कमण्डलुधरो धन्वी बाणहस्तः कपालवान् ।</p>



<p>अशनी शतघ्नी खड्गी पट्&#x200d;टिशी चायुधी महान् ॥</p>



<p>स्रुवहस्तः सुरूपश्च तेजस्तेजस्करो निधिः ।</p>



<p>उष्णीषी च सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ॥</p>



<p>दीर्घश्च हरिकेशश्च सुतीर्थः कृष्ण एव च ।</p>



<p>सृगालरूपः सिद्धार्थो मुण्डः सर्वशुभङ्करः ॥</p>



<p>अजश्च बहुरूपश्च गन्धधारी कपर्द्यपि ।</p>



<p>ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभःस्थलः ॥</p>



<p>त्रिजटी चीरवासाश्च रुद्रः सेनापतिर्विभुः ।</p>



<p>अहश्चरो नक्तञ्चरस्तिग्ममन्युः सुवर्चसः ॥</p>



<p>गजहा दैत्यहा कालो लोकधाता गुणाकरः ।</p>



<p>सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्माम्बरावृतः ॥</p>



<p>कालयोगी महानादः सर्वकामश्चतुष्पथः ।</p>



<p>निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ॥</p>



<p>बहुभूतो बहुधरः स्वर्भानुरमितो गतिः ।</p>



<p>नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलालसः ॥</p>



<p>घोरो महातपाः पाशो नित्यो गिरिरुहो नभः ।</p>



<p>सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यतन्द्रितः ॥</p>



<p>अधर्षणो धर्षणात्मा यज्ञहा कामनाशकः ।</p>



<p>दक्षयागापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥</p>



<p>तेजोपहारी बलहा मुदितोऽर्थोऽजितोऽवरः ।</p>



<p>गम्भीरघोषो गम्भीरो गम्भीरबलवाहनः ॥</p>



<p>न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः ।</p>



<p>सुतीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥</p>



<p>विष्वक्सेनो हरिर्यज्ञः सम्युगापीडवाहनः ।</p>



<p>तीक्ष्णतापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥</p>



<p>विष्णुप्रसादितो यज्ञः समुद्रो बडबामुखः ।</p>



<p>हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥</p>



<p>उग्रतेजा महातेजा जन्यो विजयकालवित् ।</p>



<p>ज्योतिषामयनं सिद्धिः सर्वविग्रह एव च ॥</p>



<p>शिखी मुण्डी जटी ज्वाली मूर्तिजो मूर्धगो बली ।</p>



<p>वेणवी पणवी ताली खली कालकटङ्कटः ॥</p>



<p>नक्षत्रविग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः ।</p>



<p>प्रजापतिर्विश्वबाहुर्विभागः सर्वगोऽमुखः ॥</p>



<p>विमोचनः सुसरणो हिरण्यकवचोद्भवः ।</p>



<p>मेढ्रजो बलचारी च महीचारी स्रुतस्तथा ॥</p>



<p>सर्वतूर्यनिनादी च सर्वातोद्यपरिग्रहः ।</p>



<p>व्यालरूपो गुहावासी गुहो माली तरङ्गवित् ॥</p>



<p>त्रिदशस्त्रिकालधृक्कर्मसर्वबन्धविमोचनः ।</p>



<p>बन्धनस्त्वसुरेन्द्राणां युधिशत्रुविनाशनः ॥</p>



<p>साङ्ख्यप्रसादो दुर्वासाः सर्वसाधुनिषेवितः ।</p>



<p>प्रस्कन्दनो विभागज्ञो अतुल्यो यज्ञभागवित् ॥</p>



<p>सर्ववासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः ।</p>



<p>हैमो हेमकरोऽयज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥</p>



<p>लोहिताक्षो महाक्षश्च विजयाक्षो विशारदः ।</p>



<p>सङ्ग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥</p>



<p>मुख्योऽमुख्यश्च देहश्च काहलिः सर्वकामदः ।</p>



<p>सर्वकालप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृत् ॥</p>



<p>सर्वकामवरश्चैव सर्वदः सर्वतोमुखः ।</p>



<p>आकाशनिर्विरूपश्च निपाती ह्यवशः खगः ॥</p>



<p>रौद्ररूपोऽम्शुरादित्यो बहुरश्मिः सुवर्चसी ।</p>



<p>वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ॥</p>



<p>सर्ववासी श्रियावासी उपदेशकरोऽकरः ।</p>



<p>मुनिरात्मनिरालोकः सम्भग्नश्च सहस्रदः ॥</p>



<p>पक्षी च पक्षरूपश्च अतिदीप्तो विशां पतिः ।</p>



<p>उन्मादो मदनः कामो ह्यश्वत्थोऽर्थकरो यशः ॥</p>



<p>वामदेवश्च वामश्च प्राग्दक्षिणश्च वामनः ।</p>



<p>सिद्धयोगी महर्षिश्च सिद्धार्थः सिद्धसाधकः ॥</p>



<p>भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विपणो मृदुरव्ययः ।</p>



<p>महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवां पतिः ॥</p>



<p>वज्रहस्तश्च विष्कम्भी चमूस्तम्भन एव च ।</p>



<p>वृत्तावृत्तकरस्तालो मधुर्मधुकलोचनः ॥</p>



<p>वाचस्पत्यो वाजसनो नित्यमाश्रमपूजितः ।</p>



<p>ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी विचारवित् ॥</p>



<p>ईशान ईश्वरः कालो निशाचारी पिनाकभृत् ।</p>



<p>निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥</p>



<p>नन्दीश्वरश्च नन्दी च नन्दनो नन्दिवर्धनः ।</p>



<p>भगहारी निहन्ता च कालो ब्रह्मा पितामहः ॥</p>



<p>चतुर्मुखो महालिङ्गश्चारुलिङ्गस्तथैव च ।</p>



<p>लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः ॥</p>



<p>बीजाध्यक्षो बीजकर्ता अध्यात्मानुगतो बलः ।</p>



<p>इतिहासः सकल्पश्च गौतमोऽथ निशाकरः ॥</p>



<p>दम्भो ह्यदम्भो वैदम्भो वश्यो वशकरः कलिः ।</p>



<p>लोककर्ता पशुपतिर्महाकर्ता ह्यनौषधः ॥</p>



<p>अक्षरं परमं ब्रह्म बलवच्छक्र एव च ।</p>



<p>नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो गतागतः ॥</p>



<p>बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् ।</p>



<p>वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ॥</p>



<p>महामेघनिवासी च महाघोरो वशीकरः ।</p>



<p>अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥</p>



<p>वृषणः शङ्करो नित्यवर्चस्वी धूमकेतनः ।</p>



<p>नीलस्तथाङ्गलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥</p>



<p>स्वस्तिदः स्वस्तिभावश्च भागी भागकरो लघुः ।</p>



<p>उत्सङ्गश्च महाङ्गश्च महागर्भपरायणः ॥</p>



<p>कृष्णवर्णः सुवर्णश्च इन्द्रियं सर्वदेहिनाम् ।</p>



<p>महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ॥</p>



<p>महामूर्धा महामात्रो महानेत्रो निशालयः ।</p>



<p>महान्तको महाकर्णो महोष्ठश्च महाहनुः ॥</p>



<p>महानासो महाकम्बुर्महाग्रीवः श्मशानभाक् ।</p>



<p>महावक्षा महोरस्को ह्यन्तरात्मा मृगालयः ॥</p>



<p>लम्बनो लम्बितोष्ठश्च महामायः पयोनिधिः ।</p>



<p>महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ॥</p>



<p>महानखो महारोमा महाकेशो महाजटः ।</p>



<p>प्रसन्नश्च प्रसादश्च प्रत्ययो गिरिसाधनः ॥</p>



<p>स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः ।</p>



<p>वृक्षाकारो वृक्षकेतुरनलो वायुवाहनः ॥</p>



<p>गण्डली मेरुधामा च देवाधिपतिरेव च ।</p>



<p>अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥</p>



<p>यजुः पादभुजो गुह्यः प्रकाशो जङ्गमस्तथा ।</p>



<p>अमोघार्थः प्रसादश्च अभिगम्यः सुदर्शनः ॥</p>



<p>उपकारः प्रियः सर्वः कनकः काञ्चनच्छविः ।</p>



<p>नाभिर्नन्दिकरो भावः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥</p>



<p>द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः ।</p>



<p>नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥</p>



<p>सगणो गणकारश्च भूतवाहनसारथिः ।</p>



<p>भस्मशयो भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः ॥</p>



<p>लोकपालस्तथाऽलोको महात्मा सर्वपूजितः ।</p>



<p>शुक्लस्त्रिशुक्लः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥</p>



<p>आश्रमस्थः क्रियावस्थो विश्वकर्ममतिर्वरः ।</p>



<p>विशालशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यम्बुजालः सुनिश्चलः ॥</p>



<p>कपिलः कपिशः शुक्ल आयुश्चैव परोः ।</p>



<p>गन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुशारदः ॥</p>



<p>परश्वधायुधो देवो ह्यनुकारी सुबान्धवः ।</p>



<p>तुम्बवीणो महाक्रोध ऊर्ध्वरेता जलेशयः ॥</p>



<p>उग्रो वंशकरो वंशो वंशनादो ह्यनिन्दितः ।</p>



<p>सर्वाङ्गरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥</p>



<p>बन्धनो बन्धकर्ता च सुबन्धनविमोचनः ।</p>



<p>स यज्ञारिः स कामारिर्महादंष्ट्रो महायुधः ॥</p>



<p>बहुधा निन्दितः शर्वः शङ्करः शङ्करोऽधनः ।</p>



<p>अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥</p>



<p>अहिर्बुध्न्योऽनिलाभश्च चेकितानो हविस्तथा ।</p>



<p>अजैकपाच्च कापाली त्रिशङ्कुरजितः शिवः ॥</p>



<p>धन्वन्तरिर्धूमकेतुः स्कन्दो वैश्रवणस्तथा ।</p>



<p>धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ॥</p>



<p>प्रभावः सर्वगो वायुरर्यमा सविता रविः ।</p>



<p>उषङ्गुश्च विधाता च मान्धाता भूतभावनः ॥</p>



<p>विभुर्वर्णविभावी च सर्वकामगुणावहः ।</p>



<p>पद्मनाभो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोऽनिलोऽनलः ॥</p>



<p>बलवांश्चोपशान्तश्च पुराणः पुण्यचञ्चुरी ।</p>



<p>कुरुकर्ता कुरुवासी कुरुभूतो गुणौषधः ॥</p>



<p>सर्वाशयो दर्भचारी सर्वेषां प्राणिनां पतिः ।</p>



<p>देवदेवः सुखासक्तः सदसत्सर्वरत्नवित् ॥</p>



<p>कैलासगिरिवासी च हिमवद्गिरिसंश्रयः ।</p>



<p>कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ॥</p>



<p>वणिजो वर्धकी वृक्षो वकुलश्चन्दनश्छदः ।</p>



<p>सारग्रीवो महाजत्रुरलोलश्च महौषधः ॥</p>



<p>सिद्धार्थकारी सिद्धार्थश्छन्दोव्याकरणोत्तरः ।</p>



<p>सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ॥</p>



<p>प्रभावात्मा जगत्कालस्थालो लोकहितस्तरुः ।</p>



<p>सारङ्गो नवचक्राङ्गः केतुमाली सभावनः ॥</p>



<p>भूतालयो भूतपतिरहोरात्रमनिन्दितः ॥</p>



<p>वाहिता सर्वभूतानां निलयश्च विभुर्भवः ।</p>



<p>अमोघः सम्यतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ॥</p>



<p>धृतिमान् मतिमान् दक्षः सत्कृतश्च युगाधिपः ।</p>



<p>गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरिः ॥</p>



<p>हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापालः प्रवेशिनाम् ।</p>



<p>प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ॥</p>



<p>गान्धारश्च सुवासश्च तपःसक्तो रतिर्नरः ।</p>



<p>महागीतो महानृत्यो ह्यप्सरोगणसेवितः ॥</p>



<p>महाकेतुर्महाधातुर्नैकसानुचरश्चलः ।</p>



<p>आवेदनीय आदेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥</p>



<p>तोरणस्तारणो वातः परिधी पतिखेचरः ।</p>



<p>सम्योगो वर्धनो वृद्धो अतिवृद्धो गुणाधिकः ॥</p>



<p>नित्य आत्मसहायश्च देवासुरपतिः पतिः ।</p>



<p>युक्तश्च युक्तबाहुश्च देवो दिविसुपर्वणः ॥</p>



<p>आषाढश्च सुषाढश्च ध्रुवोऽथ हरिणो हरः ।</p>



<p>वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥</p>



<p>शिरोहारी विमर्शश्च सर्वलक्षणलक्षितः ।</p>



<p>अक्षश्च रथयोगी च सर्वयोगी महाबलः ॥</p>



<p>समाम्नायोऽसमाम्नायस्तीर्थदेवो महारथः ।</p>



<p>निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः ॥</p>



<p>रत्नप्रभूतो रक्ताङ्गो महार्णवनिपानवित् ।</p>



<p>मूलं विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपोनिधिः ॥</p>



<p>आरोहणोऽधिरोहश्च शीलधारी महायशाः ।</p>



<p>सेनाकल्पो महाकल्पो योगो युगकरो हरिः ॥</p>



<p>युगरूपो महारूपो महानागहनो वधः ।</p>



<p>न्यायनिर्वपणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः ॥</p>



<p>बहुमालो महामालः शशी हरसुलोचनः ।</p>



<p>विस्तारो लवणः कूपस्त्रियुगः सफलोदयः ॥</p>



<p>त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधरः ।</p>



<p>बिन्दुर्विसर्गः सुमुखः शरः सर्वायुधः सहः ॥</p>



<p>निवेदनः सुखाजातः सुगन्धारो महाधनुः ।</p>



<p>गन्धपाली च भगवानुत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥</p>



<p>मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः ।</p>



<p>तलस्तालः करस्थाली ऊर्ध्वसंहननो महान् ॥</p>



<p>छत्रं सुच्छत्रो विख्यातो लोकः सर्वाश्रयः क्रमः ।</p>



<p>मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः ॥</p>



<p>हर्यक्षः ककुभो वज्री शतजिह्वः सहस्रपात् ।</p>



<p>सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥</p>



<p>सहस्रबाहुः सर्वाङ्गः शरण्यः सर्वलोककृत् ।</p>



<p>पवित्रं त्रिककुन्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिङ्गलः ॥</p>



<p>ब्रह्मदण्डविनिर्माता शतघ्नीपाशशक्तिमान् ।</p>



<p>पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥</p>



<p>गभस्तिर्ब्रह्मकृद्ब्रह्मी ब्रह्मविद्ब्राह्मणो गतिः ।</p>



<p>अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयम्भुवः ॥</p>



<p>ऊर्ध्वगात्मा पशुपतिर्वातरंहा मनोजवः ।</p>



<p>चन्दनी पद्मनालाग्रः सुरभ्युत्तरणो नरः ॥</p>



<p>कर्णिकारमहास्रग्वी नीलमौलिः पिनाकधृत् ।</p>



<p>उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृदुमाधवः ॥</p>



<p>वरो वराहो वरदो वरेण्यः सुमहास्वनः ।</p>



<p>महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः ॥</p>



<p>पीतात्मा परमात्मा च प्रयतात्मा प्रधानधृत् ।</p>



<p>सर्वपार्श्वमुखस्त्र्यक्षो धर्मसाधारणो वरः ॥</p>



<p>चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वरः ।</p>



<p>साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान्सवितामृतः ॥</p>



<p>व्यासः सर्गः सुसङ्क्षेपो विस्तरः पर्ययो नरः ।</p>



<p>ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः सङ्ख्यासमापनः ॥</p>



<p>कला काष्ठा लवा मात्रा मुहूर्ताहः क्षपाः क्षणाः ।</p>



<p>विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिङ्गमाद्यस्तु निर्गमः ॥</p>



<p>सदसद्व्यक्तमव्यक्तं पिता माता पितामहः ।</p>



<p>स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥</p>



<p>निर्वाणं ह्लादनश्चैव ब्रह्मलोकः परा गतिः ।</p>



<p>देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः ॥</p>



<p>देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः ।</p>



<p>देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः ॥</p>



<p>देवासुरगणाध्यक्षो देवासुरगणाग्रणीः ।</p>



<p>देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः ॥</p>



<p>देवासुरेश्वरो विश्वो देवासुरमहेश्वरः ।</p>



<p>सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्माऽऽत्मसम्भवः ॥</p>



<p>उद्भित्त्रिविक्रमो वैद्यो विरजो नीरजोऽमरः ।</p>



<p>ईड्यो हस्तीश्वरो व्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः ॥</p>



<p>विबुधोऽग्रवरः सूक्ष्मः सर्वदेवस्तपोमयः ।</p>



<p>सुयुक्तः शोभनो वज्री प्रासानां प्रभवोऽव्ययः ॥</p>



<p>गुहः कान्तो निजः सर्गः पवित्रं सर्वपावनः ।</p>



<p>शृङ्गी शृङ्गप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः ॥</p>



<p>अभिरामः सुरगणो विरामः सर्वसाधनः ।</p>



<p>ललाटाक्षो विश्वदेवो हरिणो ब्रह्मवर्चसः ॥</p>



<p>स्थावराणां पतिश्चैव नियमेन्द्रियवर्धनः ।</p>



<p>सिद्धार्थः सिद्धभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः ॥</p>



<p>व्रताधिपः परं ब्रह्म भक्तानां परमा गतिः । [भक्तानुग्रहकारकः]



<p>विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमान् श्रीवर्धनो जगत् ॥ १२३ ॥</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
