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	<title>पढ़ें कथा &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>पढ़ें कथा &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>जैन समुदाय का मासिक रोहिणी व्रत 20 फरवरी को, पढ़ें कथा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Feb 2021 23:40:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slide]]></category>
		<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय का मासिक रोहिणी व्रत 20 फरवरी को]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़ें कथा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg 800w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-768x576.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्&#x200d;वपूर्ण स्&#x200d;थान है। फरवरी 2021 में यह व्रत 20 फरवरी, शनिवार को रखा जाएगा। यहां पढ़ें व्रत की कथा- 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्&#x200d;व है। यह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg 800w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-768x576.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्&#x200d;वपूर्ण स्&#x200d;थान है। फरवरी 2021 में यह व्रत 20 फरवरी, शनिवार को रखा जाएगा। यहां पढ़ें व्रत की कथा-</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-421730 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg" alt="" width="800" height="600" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk.jpg 800w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/hbk-768x576.jpg 768w" sizes="(max-width: 800px) 100vw, 800px" /></p>
<div>27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्&#x200d;व है। यह व्रत आत्&#x200d;मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है।</div>
<div>
<div>यहां पाठकों के लिए पेश है रोहिणी व्रत की संपूर्ण कथा</div>
<div>
<div></div>
<div>रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्&#x200d;मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्&#x200d;तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा?</div>
<div></div>
<div>तो उन्&#x200d;होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्&#x200d;वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्&#x200d;या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्&#x200d;न हुआ।</div>
<div></div>
<div>एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्&#x200d;चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्&#x200d;यों है?</div>
<div></div>
<div>तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्&#x200d;तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्&#x200d;या उत्पन्&#x200d;न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्&#x200d;या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्&#x200d;यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया।</div>
<div></div>
<div>इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्&#x200d;होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्&#x200d;य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्&#x200d;बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्&#x200d;यंत वेदना हुई और तत्&#x200d;काल उन्&#x200d;होंने प्राण त्&#x200d;याग दिए।</div>
<div></div>
<div>जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्&#x200d;होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्&#x200d;पन्&#x200d;न हो गया। अत्&#x200d;यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्&#x200d;पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्&#x200d;या हुई।</div>
<div></div>
<div>यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्मकार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो। तब स्वामी ने कहा- सम्&#x200d;यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्&#x200d;याग करें और श्री जिन चैत्&#x200d;यालय में जाकर धर्मध्&#x200d;यान सहित 16 प्रहर व्&#x200d;यतीत करें अर्थात सामायिक, स्&#x200d;वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्&#x200d;वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें।</div>
<div></div>
<div>दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्&#x200d;वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई। इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्&#x200d;वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्&#x200d;यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्&#x200d;वरूप स्वर्गों में उत्&#x200d;पन्&#x200d;न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्&#x200d;वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्&#x200d;त हुए।</div>
</div>
</div>
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		<title>इस मंत्र के साथ शिवजी पर चढ़ाएं कच्चा दूध, हर छोटा-बड़ा संकट होगा दूर, पढ़ें कथा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Jul 2020 07:42:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[इस मंत्र के साथ शिवजी पर चढ़ाएं कच्चा दूध]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़ें कथा]]></category>
		<category><![CDATA[हर छोटा-बड़ा संकट होगा दूर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="422" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg 703w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-300x205.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />श्रावण माह में लगातार बारिश होती है। इस कारण कई तरह के छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होती है। कई प्रकार की विषैली नई घास और वनस्पतियां उगती हैं। जब दूध देने वाले पशु इन घासों को और वनस्पतियों को खाते हैं तो पशुओं का दूध विष के समान हो जाता है। ऐसा कच्चा दूध पीने से हमारे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="422" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg 703w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-300x205.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><div>श्रावण माह में लगातार बारिश होती है। इस कारण कई तरह के छोटे-छोटे जीवों की उत्पत्ति होती है। कई प्रकार की विषैली नई घास और वनस्पतियां उगती हैं। जब दूध देने वाले पशु इन घासों को और वनस्पतियों को खाते हैं तो पशुओं का दूध विष के समान हो जाता है। ऐसा कच्चा दूध पीने से हमारे स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। इसीलिए इस माह में कच्चे दूध के सेवन से बचना चाहिए। लेकिन श्रावण में शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाने का विशेष महत्व है। शिवजी ने विषपान किया था, इस कारण श्रावण माह में शिवलिंग का दूध से अभिषेक किया जाता है।</div>
<div></div>
<div><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-353120 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg" alt="" width="703" height="480" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn.jpg 703w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-300x205.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/yhjnuyhjn-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 703px) 100vw, 703px" /></div>
<div>
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<div></div>
<div>शिव महापुराण के अनुसार सृष्टि निर्माण से पहले केवल शिवजी का ही अस्तित्व बताया गया है। भगवान शंकर ही वह शक्ति है जिसका न आदि है न अंत। इसका मतलब यही है कि शिवजी सृष्टि के निर्माण से पहले से हैं और प्रलय के बाद भी केवल महादेव का ही अस्तित्व रहेगा। अत: इनकी भक्ति मात्र से ही मनुष्य को सभी सुख, धन, मान-सम्मान आदि प्राप्त हो जाता है।</div>
<div></div>
<div>शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर को भोलेनाथ कहा गया है अर्थात् शिवजी अपने भक्तों की आस्था और श्रद्धा से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। शिवजी के प्रसन्न होने के अर्थ यही है कि भक्त को सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो जाती है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के कई उपाय बताए गए हैं। इनकी पूजा, अर्चना, आरती करना श्रेष्ठ मार्ग हैं। प्रतिदिन विधि-विधान से शिव का पूजन करने वाले श्रद्धालुओं को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।</div>
<div></div>
<div>शिवजी को जल्द ही प्रसन्न के लिए शिव पर प्रतिदिन कच्चा गाय का दूध अर्पित करें। गाय को माता माना गया है अत: गौमाता का दूध पवित्र और पूजनीय है। इसे शिव पर चढ़ाने से महादेव श्रद्धालु की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।</div>
<div></div>
<div><strong>श्रावण में भोलेनाथ को दूध इस मंत्र के साथ चढ़ाएं :-<br />
</strong></div>
<div></div>
<div><strong>नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।।</strong></div>
<div><strong>ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।।</strong></div>
<div><strong>तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।</strong></div>
<div></div>
<div>दूध की प्रकृति शीतलता प्रदान करने वाली होती है और शिवजी को ऐसी वस्तुएं अतिप्रिय हैं जो उन्हें शीतलता प्रदान करती हैं। इसके अलावा ज्योतिष में दूध चंद्र ग्रह से संबंधित माना गया है। चंद्र से संबंधित सभी दोषों को दूर करने के लिए प्रति सोमवार को शिवजी को दूध अर्पित करना चाहिए।</p>
</div>
<div>मनोवांछित फल प्राप्त करने के लिए यह भी जरूरी है कि आपका आचरण पूरी तरह धार्मिक हो। ऐसा होने पर आपकी सभी मनोकामनाएं बहुत ही जल्द पूर्ण हो जाएंगी।</div>
<div></div>
<div><strong>पौराणिक कथा</strong></div>
<div></div>
<div>समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला तो पूरी पृथ्वी पर हलाहल विष की घातकता के कारण व्याकुलता छा गई, तब सभी देवों ने भगवान शिव से विषपान करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने जब विषपान किया तो इसके कारण उनका कंठ नीला होने लगा, ऐसे में सभी देवों ने उनसे शीतल दूध का पान करने के लिए कहा।</p>
<p>इस पर भी भोलेनाथ ने दूध से उनका सेवन करने की अनुमति मांगी, दूध से सहमति मिलने के बाद शिव ने उसका सेवन किया, जिससे विष का असर काफी कम हो गया। बाकी बचे विष को सर्पों ने पिया, इस तरह समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष से सृष्टि की रक्षा की जा सकी। अत: शिव के शरीर में जाकर विष के अनिष्टकारी प्रभाव को कम करने के कारण दूध भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, यही कारण है कि शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाया जाता है।</p></div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
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		<item>
		<title>अपनी पत्नी से मिलने के लिए सूर्य देव को बनना पड़ा था घोड़ा, पढ़ें कथा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Hema Bisht]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Jun 2019 09:47:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[अपनी पत्नी से मिलने के लिए सूर्य देव को बनना पड़ा था घोड़ा]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़ें कथा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="336" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba.jpg 827w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-300x163.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-768x418.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />आप सभी ने कई कथाए और कहानियाँ सुनी होंगी. ऐसे में शनि देव अति जागृत देवता हैं और इनकी कहानी भी काफी रोचक है. जी हाँ, पौराणिक कथा के अनुसार श्री शनि भगवान के पिता जी सूर्य देव तथा माता संज्ञा हैं. ब्रह्मदेव के पुत्र दक्ष की कन्या, संज्ञा अत्यंत रूपवती थी. दक्ष ने अपनी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="336" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba.jpg 827w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-300x163.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-768x418.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p><strong>आप सभी ने कई कथाए और कहानियाँ सुनी होंगी. ऐसे में शनि देव अति जागृत देवता हैं और इनकी कहानी भी काफी रोचक है. जी हाँ, पौराणिक कथा के अनुसार श्री शनि भगवान के पिता जी सूर्य देव तथा माता संज्ञा हैं. ब्रह्मदेव के पुत्र दक्ष की कन्या, संज्ञा अत्यंत रूपवती थी. दक्ष ने अपनी कन्या संज्ञा की शादी सूर्यदेव के साथ कर दी. संज्ञा ने सूर्यदेव से दो पुत्र 1. दक्षिणाधिपति यम और 2. श्री शनिश्चर तथा 1. ताप्ती, 2. भद्रा, 3. कालिंदी, 4. सावित्री इन चार कन्याओं को जन्म दिया. एक दिन संज्ञा सूर्यदेव का तेज सहन न कर सकीं इसलिए उन्होंने एक अपनी प्रतिरूप स्त्री का निर्माण किया और उसका नाम संवर्णा रख दिया.</strong></p>
<p><strong><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-248098 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-300x163.jpg" alt="" width="784" height="426" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-300x163.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba-768x418.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/06/surya_5c120858127ba.jpg 827w" sizes="auto, (max-width: 784px) 100vw, 784px" /></strong></p>
<p><strong>संज्ञा ने संवर्णा से कहा कि तू सूर्य के साथ पत्नी कर्तव्य का व्यवहार करके पूरी तरह सुख का उपभोग कर लेकिन एक बात ध्यान में रख कि यह सब किसी को भी मालूम न हो. यहां तक कि सूर्यदेव को भी नहीं. संकटकाल में मेरा स्मरण करने पर मैं तेरी मदद करूंगी, ऐसा कह कर संज्ञा अपने मायके लौट गई. दक्ष ने संज्ञा को समझाया कि विवाहिता को अपने पति के साथ ही रहना चाहिए. भले-बुरे दिनों में भी अपने पति का साथ नहीं छोडऩा चाहिए. यदि ब्याही पुत्री को उसके माता-पिता अपने पास रखें तो माता-पिता को दोष लगता है इसलिए यहां न रहकर अपने पति के घर रहना ही उचित है.</strong></p>
<p><strong>पिता दक्ष का यह विचार सुनकर संज्ञा को दुख हुआ, वह क्रोधित हुई और स्त्री जन्म को दोष देने लगी, तुरन्त ही संज्ञा ने अपने आपको घोड़ी के रूप में बदल लिया और निराहार तपस्या के लिए हिमालय पर्वत पर चली गई. संज्ञा के मायके चले जाने पर संवर्णा सूर्यदेव की घर गृहस्थी ठीक से चला रही थी. यथावकाश संवर्णा ने सूर्यदेव से 5 पुत्र और 2 कन्याओं को जन्म दिया. पुत्रियां 1. भद्रा, 2. वैधती और पुत्र 1 श्राद्धदेव, 2. मनु, 3. व्यतिपात, 4. कुलिका, 5. अर्थधाम.</strong></p>
<p><strong>इस प्रकार संतति प्राप्ति तक सूर्यदेव को थोड़ा सा भी संदेह नहीं हुआ लेकिन एक दिन शनि भगवान को बहुत भूख लगी तो उसने अपनी माता संवर्णा से खाने के लिए मांगा. संवर्णा ने श्री शनि भगवान से कहा कि भगवान की पूजा होने दो, उन्हें नेवैद्य चढ़ाने के बाद तुम्हें खाने को दूंगी लेकिन शनि महाराज ने मुझे अभी खाना चाहिए ऐसा कह कर संवर्णा को लात दिखाई. उस वक्त संवर्णा ने शनि भगवान को शापित किया कि तेरा पैर टूट जाएगा. यह सुनकर डर के मारे शनि भगवान ने पूरी घटना अपने पिता सूर्यदेव से बता दी. सूर्यदेव ने विचार किया कि माता अपने पुत्र को कभी भी शाप नहीं देती.</strong></p>
<p><strong>यह अधर्म की बात असंभव है. सूर्यदेव ने ध्यान दृष्टि से देखा तो समझ गए कि यह संज्ञा नहीं है. सूर्यदेव ने क्रोधित होकर संवर्णा से पूछा तू कौन है? सूर्यदेव को क्रोधित मुद्रा में देखकर संवर्णा डर के मारे पानी-पानी हो गई और उसने कहा, मैं संज्ञा की छाया संवर्णा हूं. संज्ञा तपस्या के लिए हिमालय पर्वत पर चली गई और मैं ही घर गृहस्थी का कर्तव्य निभा रही हूं. तब सूर्यदेव ने शनि भगवान से कहा कि बेटा शनि संवर्णा तेरी माता के समान ही है, उसकी शापित बात व्यर्थ नहीं हो सकती है लेकिन अति बाधक भी नहीं होगी तो अब तेरा पैर का टुकड़ा न होकर वह टेढ़ी बन जाएगी (उसी वक्त से शनि भगवान का एक पैर टेढ़ा है). बाद में सूर्यदेव ने अंतर्दृष्टि से देखा तो संज्ञा हिमालय पर्वत पर घोड़ी के रूप में निराहार तपस्या कर रही है और रात-दिन सूर्यदेव का नाम जप रही है. सूर्यदेव अश्व रूप धारण कर संज्ञा से मिलने हिमालय पर्वत पर चले गए.</strong></p>
<p><strong>तपस्या में ध्यानमग्र संज्ञा ने अश्व रूप में सूर्यदेव को देखा और कहा, ”सूर्य के अलावा मुझे अन्य पुरुष दिखाई नहीं देता इसलिए यह अश्व सूर्यदेव ही है.” अश्व रूपी सूर्य को देख कर संज्ञा अत्यंत आनंदित हो उठी. उस वक्त संज्ञा ऋतुमति थी, सूर्यदेव का वीर्यपतन हुआ. वह वीर्य घोड़ी रूप संज्ञा ने नासिका विवा द्वारा ग्रहण किया. कालांतर में वह गर्भवती रही और उसने नासिका विवा द्वारा ही अश्वि देव और वैद्यस्वत नामक दो पुत्रों को जन्म दिया और अश्व रूप संज्ञा तथा सूर्य दोनों धरती पर अवतरित हुए. हमें प्रकाश देने वाला सूर्य और उसके चारों ओर घूमने वाले नौ ग्रहों को मिलाकर सूर्यमाला स्थित है. उन नौ ग्रहों में से ही शनि एक हैं. सूर्यमाला में कुछ अंर्तग्रह और बहिग्रह हैं. शनि बहिग्रह हैं शनि के दस उपग्रह हैं.</strong></p>
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