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	<title>नवरात्रि में रखे इन बातो का बहुत ध्यान &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>नवरात्रि में रखे इन बातो का बहुत ध्यान, खुलेंगे भाग्य के द्वार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Namita]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Apr 2019 05:26:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[खुलेंगे भाग्य के द्वार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="347" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347.jpeg 618w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347-300x168.jpeg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />नवरात्र शब्द से &#8216;नव अहोरात्र&#8217; अर्थात विशेष रात्रियों का बोध होता है। इन रात्रियों में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। दिन की अपेक्षा यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसीलिए इन रात्रियों में सिद्धि और साधना की जाती है। इन रात्रियों में किए गए शुभ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="347" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347.jpeg 618w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347-300x168.jpeg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><div><strong>नवरात्र शब्द से &#8216;नव अहोरात्र&#8217; अर्थात विशेष रात्रियों का बोध होता है। इन रात्रियों में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। दिन की अपेक्षा यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसीलिए इन रात्रियों में सिद्धि और साधना की जाती है। इन रात्रियों में किए गए शुभ संकल्प सिद्ध होते हैं। तो चलिए आपको बताते हैं कि नवरात्रि के ऐसे कौन से 5 रहस्य है जिन्हें जानना जरूरी है और जिन पर अमल कर लिया जो भाग्य पलट जाएगा।<img decoding="async" class="wp-image-220180 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347-300x168.jpeg" alt="" width="629" height="352" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347-300x168.jpeg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/maa_durga_collage_1505961473_618x347.jpeg 618w" sizes="(max-width: 629px) 100vw, 629px" /></strong></div>
<div></div>
<div><strong>1.पहली बात</strong></div>
<div>
<p><strong>नियम संयम से रहें- वर्ष में चार नवरात्रि की 36 रात्रियां होती है। यह चार माह है:- चैत्र, आषाढ़, अश्विन और पौष। चैत्र माह में चैत्र नवरात्रि जिसे बड़ी नवरात्रि या वसंत नवरात्रि भी कहते हैं। आषाढ़ और पौष माह की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहते हैं। अश्&#x200d;विन माह की नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहते हैं।</strong></p>
</div>
<div></div>
<div><strong>यदि आपने वर्ष की इन 36 दिन और रात को साध लिया तो आपका भाग्य पलट जाएगा। इसके लिए आपको इन दिनों कड़े व्रत रखना चाहिए और इन 36 दिनों में मद्यमान, मांस-भक्षण और स्&#x200d;त्रिसंग शयन नहीं करना चाहिए। उपवास में रहकर इन नौ दिनों में की गई हर तरह की साधनाएं और मनकामनाएं पूर्ण होती है। लेकिन जो व्यक्ति इन नौ दिनों में पवित्र नहीं रहता है उसका बुरा वक्त कभी खत्म नहीं होता है।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>2.दूसरी बात</strong></div>
<div><strong>शरीर को शुद्ध करें- हमारे शरीर में 9 छिद्र हैं। दो आंख, दो कान, नाक के दो छिद्र, दो गुप्तांग और एक मुंह। उक्त 36 अंगों को पवित्र और शुद्ध करेंगे तो मन निर्मल होगा और छठी इंद्री को जाग्रत करेगा। नींद में यह सभी इंद्रियां या छिद्र लुप्त होकर बस मन ही जाग्रत रहता है। (वर्ष की 36 नवरात्रियों में उपवास रखने से अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई हो जाती है।)</strong></div>
<div></div>
<div><strong>3.तीसरा बात</strong></div>
<div><strong>देवियों की पहचान- यदि आप किसी देवी की साधना या पूजा कर रहे हैं तो आपको यह जानना जरूरी है कि आप किस देवी की साधना या पूजा कर रहे हैं। इसके लिए देवियों को पहचानना सीखें। प्रत्येक देवी को उनके वाहन, भु्जा और अस्त्र-शस्त्र से पहचाना जाता है। जैसे अष्टभुजाधारी देवी दुर्गा और कात्यायनी सिंह पर सवार हैं तो माता पार्वती, चन्द्रघंटा और कुष्मांडा शेर पर विराजमान हैं। शैलपुत्री और महागौरी वृषभ पर, कालरात्रि गधे पर और सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान हैं। इसी तरह सभी देवियों की अलग-अलग सवारी हैं।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>नौ देवियों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है। कहते हैं कि कात्यायनी ने ही महिषासुर का वध किया था इसलिए उन्हें महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं। दुर्गा सप्तशती के अनुसार इनके अन्य रूप भी हैं:- ब्राह्मणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति और रक्तदन्तिका।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>देवियों में त्रिदेवी, नवदुर्गा, दशमहाविद्या और चौसठ योगिनियों का समूह है। प्रमुख रूप से आठ योगिनियां हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं:- 1.सुर-सुंदरी योगिनी, 2.मनोहरा योगिनी, 3. कनकवती योगिनी, 4.कामेश्वरी योगिनी, 5. रति सुंदरी योगिनी, 6. पद्मिनी योगिनी, 7. नतिनी योगिनी और 8. मधुमती योगिनी।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>आदि शक्ति अम्बिका सर्वोच्च है और उसी के कई रूप हैं। सती, पार्वती, उमा और काली माता भगवान शंकर की पत्नियां हैं। अम्बिका ने ही दुर्गमासुर का वध किया था इसीलिए उन्हें दुर्गा माता कहा जाता है। नवदुर्गा में दशमहाविद्याओं की भी पूजा होती है। इनके नाम है-1. काली, 2. तारा, 3. छिन्नमस्ता, 4. षोडशी, 5. भुवनेश्वरी, 6. त्रिपुरभैरवी, 7. धूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10 कमला।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>उपरोक्त सभी की पूजा-साधना पद्धतियां अलग-अलग होती है और सभी को अलग-अलग भोग लगता है। जैसे नौ भोग और औषधि- शैलपुत्री कुट्टू और हरड़, ब्रह्मचारिणी दूध-दही और ब्राह्मी, चन्द्रघंटा चौलाई और चन्दुसूर, कूष्मांडा पेठा, स्कंदमाता श्यामक चावल और अलसी, कात्यायनी हरी तरकारी और मोइया, कालरात्रि कालीमिर्च, तुलसी और नागदौन, महागौरी साबूदाना तुलसी, सिद्धिदात्री आंवला और शतावरी।</strong></div>
<div><strong>चौथा बात-</strong></div>
<div>
<p><strong>साधना के नियम- प्रत्येक नवरात्रि में अलग-अलग साधनाएं की जाती है। साधना के पहले आपको यह भी तय करना होता है कि आप किस देवी की साधना करना चाहते हैं। जैसे, बगलामुखी देवी, काली माता, मां मातंगी या अम्बिका माता की साधना करना चाहते हैं या अन्य किसी की।</strong></p>
</div>
<div><strong>सामान्यजन माता के बीज मंत्र या शाबर मंत्रों का जाप कर सकते हैं। आप प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ भी कर सकते हैं। अष्टमी की रात्रि में दुर्गा सप्तशती के प्रत्येक मंत्र को विधिवत सिद्ध किया जाता है। सप्तश्लोकी दुर्गा के पाठ का 108 बार अष्टमी की रात्रि में पाठ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में कम से कम दोनों काल (प्रातः एवं सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 26 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख और संध्याकाल की उपासना पश्चिम मुख होकर करनी चाहिए। जप के समय घी का दीपक जलाकर रखें और जल का एक पात्र निकट में रखें।</strong></div>
<div></div>
<div>
<p><strong>जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसको धीरे-धीरे सिद्धियां प्राप्त होने लगती हैं। यदि कोई मनोकामना की पूर्ति हेतु साधना की जा रही है तो वह पूर्ण होती है। सभी तरह के संकट दूर हो जाते हैं। वर्ष की चारों नवरात्रियों में साधना करने से इसका परिणाम अति ही उत्सव पैदा करने वाला होता है।</strong></p>
</div>
<div></div>
<div><strong>नवरात्रि साधना में ब्रह्मचर्य पालन बहुत जरूरी है। इसके अलावा एक समय ही भोजन ग्रहण करें या दोनों वक्त फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। इसके अतिरिक्त, पूरा या नियमित समय तक मौन, भूमि-शयन, चमड़े की बनी वस्तु का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवाएं स्वयं करना तय करें। अपनी सुख-सुविधाओं को यथासम्भव त्याग कर उपासना में लीन होना ही तप है। पूजा या साधना का स्थान और समय भी नियुक्त होना चाहिए।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>पांचवीं बात-<br />
</strong></div>
<div><strong>गुप्त नवरात्रि का महत्व- जैसा की उपर कहा गया कि वर्ष में चार नवरात्रि पर्व होते हैं। उनमें से दो आम जनों के लिए जिसे चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि कहते हैं जबकि दो साधकों के लिए जिसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं जो कि आषाढ़ और पौष माह में आती है। चैत्र माह की नवरात्रि को बड़ी नवरात्रि और अश्विन माह की नवरात्रि को छोटी नवरात्रि कहते हैं। तुलजा भवानी बड़ी माता है तो चामुण्डा माता छोटी माता है। दरअसल, बड़ी नवरात्रि को बसंत नवरात्रि और छोटी नवरात्रि को शारदीय नवरात्रि कहते हैं। चैत्र नवरात्रि से नववर्ष का प्रारंभ होता है। अश्विन मास शारदीय नवरात्रि से त्योहार और उत्सवों का प्रारंभ होता है।</strong></div>
<div></div>
<div><strong>बाकी बची दो आषाढ़ और पौष माह की गुप्त नवरात्रि साधना के लिए महत्वपूर्ण होती है। गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।</strong></div>
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