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	<title>जिसे कहा जाता है भारत का कारगिल का शेर &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>जिसे कहा जाता है भारत का कारगिल का शेर , जानें कौन था भारतीय सेना का वो जांबाज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Jul 2020 05:03:39 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />पाकिस्&#x200d;तान के साथ 1999 में हुए कारगिल युद्ध में 500 से अधिक भारत के जांबाज वीरों ने अपना बलिदान देकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की थी। इन वीरों में एक नाम परमवीर चक्र विजेता शहीद केप्&#x200d;टन विक्रम बत्रा का भी है। ये वो नाम है जिसको भारत कारगिल का शेर भी कहता है। इसका अर्थ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>पाकिस्&#x200d;तान के साथ 1999 में हुए कारगिल युद्ध में 500 से अधिक भारत के जांबाज वीरों ने अपना बलिदान देकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की थी। इन वीरों में एक नाम परमवीर चक्र विजेता शहीद केप्&#x200d;टन विक्रम बत्रा का भी है। ये वो नाम है जिसको भारत कारगिल का शेर भी कहता है। इसका अर्थ सीधेतौर पर ऐसा वीर है जिसके सामने हर कोई घुटने टेक दे और जो मौत से आंख मिलाने से पीछे न हटे। कारगिल युद्ध में 7 जुलाई 1999 को केप्&#x200d;टन बत्रा महज 24 साल की उम्र में वीरगित को प्राप्&#x200d;त हो गए थे। लेकिन उनकी वीरता की कहानी से आज भी न सिर्फ कारगिल बल्कि पूरा देश और आज की युवा पीढ़ी प्रेरणा लेती है।</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-348791 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg" alt="" width="650" height="540" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/gyhnjnjhn-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></p>
<p>1 जून 1999 को केप्&#x200d;टन विक्रम बत्रा की टुकड़ी को कारगिल युद्ध में भेजा गया था। यहां पर उन्&#x200d;होंने हंप और राकी नाब को दुश्&#x200d;मन से वापस हासिल किया था। इसके बाद उन्&#x200d;हें केप्&#x200d;टन बनाया गया। उनके ऊपर इस वक्&#x200d;त सबसे बड़ी जिम्&#x200d;मेदारी थी। ये जिम्&#x200d;मेदारी श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर स्थित सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से वापस लेने की थी। पाकिस्&#x200d;तान की सेना के जवान वहां से भारतीय जवानों की पूरी मूवमेंट को देख रहे थे। उन्&#x200d;हें ऊंचाई पर होने का फायदा हो रहा था। विक्रम बत्रा ने आदेश मिलने के साथ ही अपने साथियों के साथ मंजिल की तरफ कूच कर दिया। रास्&#x200d;ते में कई बाधाएं आईं। दुश्&#x200d;मन लगातार फायरिंग कर रहा था। लेकिन उनकी टुकड़ी भी लगातार हर मुश्किल को पार करते हुए आगे बढ़ रही थी। मंजिल के बेहद करीब पहुंच कर उन्&#x200d;होंने पाकिस्&#x200d;तान की सेना के जवानों पर जबरदस्&#x200d;त हमला किया। उन्&#x200d;होंने खुद घुसपैठियों को खत्&#x200d;म कर दिया था।</p>
<p>20 जून 1999 को सुबह तीन बजकर 30 मिनट पर इस चोटी को उन्&#x200d;होंने इसको अपने कब्जे में लेकर इस पर तिरंगा फहराया। इस जीत की जानकारी उन्&#x200d;होंने अपने रेडियो सेट के जरिए अपने अधिकारियों को दी तो सब बेहद खुश थे। उस वक्&#x200d;त उन्&#x200d;होंने कहा था कि ये दिल मांगे मोर। इसके बाद उनके कहे ये तीन शब्&#x200d;द बार बार जवानों ने दोहराए। अगले दिन चोटी 5140 में भारतीय झंडे के साथ विक्रम बत्रा और उनकी टीम का फोटो मीडिया के जरिए पूरे भारत में छा। इसके बाद ही उन्&#x200d;हें कारगिल का शेर कहा गया। उन्&#x200d;होंने एक बार कहा था कि वे वापस जरूर आएंगे यदि जिंदा नहीं आ सके तो तिरंगे में लिपट कर तो जरूर ही आएंगे।</p>
<div class="relativeNews">
<p>प्&#x200d;वाइंट 5140 पर कब्&#x200d;जे के बाद उन्&#x200d;हें प्&#x200d;वाइंट 4875 को कब्जे में लेने की जिम्&#x200d;मेदारी सौंपी गई। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए लेफ्टिनेंट अनुज नैयर के साथ मिलकर कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। वो जीत के काफी करीब थे लेकिन तभी उनके साथ मौजूद लेफ्टिनेंट नवीन पर हो रही गोलियों की बौछार से उन्&#x200d;हें बचाने के लिए वो उनकी ढाल बन गए। इस दौरान लेफ्टीनेंट नवीन के बुरी तरह जख्मी हो गए। जिस वक्&#x200d;त विक्रम उन्&#x200d;हें बचाने के लिए गोलीबारी से दूर घसीट रहे थे तभी दुश्&#x200d;मन की गोलियां उनके सीने को पार कर गईं। इस अदम्य साहस और पराक्रम के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को 15 अगस्त 1999 को परमवीर चक्र के सम्मान से नवाजा गया जो उनके पिता जीएल बत्रा ने प्राप्त किया।</p>
<div class="relativeNews">
<p>9 सितंबर, 1974 को मंडी जिले के जोगेंद्र नगर इलाके में पेशे से टीचर गिरधारी लाल बत्रा के घर पर जुड़वा बच्&#x200d;चे पैदा हुए थे। इनका नाम उन्&#x200d;होंने लव और कुश रखा था। इनमें लव थे विक्रम बत्रा। उन्होंने पालमपुर के केंद्रीय विद्यालय से 12 वीं और फिर चंडीगढ़ के डीएवी कालेज बीएससी की थी। सेना उनके दिल में बसती थी। 1996 में इंडियन मिलिट्री अकादमी में मॉनेक शॉ बटालियन में उनका चयन किया गया। एसएसबी इंटरव्&#x200d;यू में उनके साथ कुल 35 लोग चुने गए थे। आईएमए में जाने के लिए उन्&#x200d;होंने पोस्&#x200d;ट ग्रेजुएशन को भी अधूरा छोड़ दिया था। ट्रेनिंग के बाद उन्हें जम्मू कश्मीर राइफल यूनिट, श्योपुर में बतौर लेफ्टिनेंट नियुक्त किया गया। कुछ समय बाद कैप्टन रैंक दिया गया। उन्हीं के नेतृत्व में टुकड़ी ने 5140 पर कब्जा किया था। 1995 में विक्रम बत्रा को मर्चेंट नेवी से नौकरी का ऑफर आया लेकिन उन्होंने इस नौकरी को ठोकर मारकर सेना में बने रहने का फैसला लिया था।</p>
<div class="relativeNews"></div>
</div>
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