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	<title>जानिए 10 रहस्य &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>जानिए 10 रहस्य &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी, माता हिंगलाज जयंती, जानिए 10 रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Apr 2021 04:28:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए 10 रहस्य]]></category>
		<category><![CDATA[माता हिंगलाज जयंती]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />इस वर्ष माता हिंगलाज की जयंती 9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी। हिन्दू कैलेंडर अनुसार चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को यह जयंती मनाई जाएगी। पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है माता हिंगलाज का मंदिर जो 51 शक्तिपीठों में से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>इस वर्ष माता हिंगलाज की जयंती 9 अप्रैल 2021 को मनाई जाएगी। हिन्दू कैलेंडर अनुसार चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को यह जयंती मनाई जाएगी। पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है माता हिंगलाज का मंदिर जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। आओ जानते हैं खास जानकारी।</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-434473 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg" alt="" width="740" height="555" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxdcdxv-300x225.jpg 300w" sizes="(max-width: 740px) 100vw, 740px" /></p>
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<div id="div-gpt-ad-1593067077351-0" data-google-query-id="CMTmlLWR7O8CFRY8KwodDiIDOw">
<div>1. माता का मंदिर प्रधान 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिंगलाज ही वह जगह है, जहां माता का सिर गिरा था। यहां माता सती कोटटरी रूप में जबकि भगवान शंकर भीमलोचन भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। बृहन्नील तंत्रानुसार यहां सती का &#8216;ब्रह्मरंध्र&#8217; गिरा था। देवी के शक्तिपीठों में कामाख्या, कांची, त्रिपुरा, हिंगलाज प्रमुख शक्तिपीठ हैं। हिंगुला का अर्थ सिन्दूर है।</div>
<div></div>
<div>2. इस मंदिर की माता को संपूर्ण पाकिस्तान में नानी मां का मंदिर भी कहा जाता है। यहां की यात्रा को &#8216;नानी का हज&#8217; भी कहा जाता है। मुसलमान हिंगुला देवी को &#8216;नानी&#8217; तथा वहां की यात्रा को &#8216;नानी का हज&#8217; कहते हैं। हिन्दू से ज्यादा मुस्लिम माता को मानते हैं। पूरे बलूचिस्तान के मुसलमान भी इनकी उपासना एवं पूजा करते हैं। वे मुस्लिम स्त्रियां जो इस स्थान का दर्शन कर लेती हैं उन्हें हाजियानी कहते हैं। उन्हें हर धार्मिक स्थान पर सम्मान के साथ देखा जाता है। मुसलमानों के लिए यह नानी पीर का स्थान है।</p>
<div>3. हिंगलाज क्षत्रिय समाज की कुल देवी हैं। कहते हैं, जब 21 बार क्षत्रियों का संहार कर परशुराम आए, तब बचे राजागण माता हिंगलाज देवी की शरण में गए और अपनी रक्षा की याचना की, तब मां ने उन्हें ब्रह्म क्षत्रिय कहकर अभयदान दिया। हिंगलाज शक्तिपीठ पश्चिमी राजस्थान के हिन्दुओं की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर पर गहरी आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि हिन्दू चाहे चारों धाम की यात्रा क्यों ना कर ले, काशी के पानी में स्नान क्यों ना कर ले, अयोध्या के मंदिर में पूजा-पाठ क्यों ना कर लें, लेकिन अगर वह हिंगलाज देवी के दर्शन नहीं करता तो यह सब व्यर्थ हो जाता है। प्रमुख रूप से यह मंदिर चारण वंश के लोगों की कुल देवी मानी जाती है। यह क्षे&#x200d;त्र भारत का हिन्सा ही था तब यहां लाखों हिन्दू एकजुट होते थे।</p>
<div>4. मां के मंदिर के नीचे अघोर नदी है। कहते हैं कि रावण वध के पश्चात् ऋषियों ने राम से ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति हेतु हिंगलाज में यज्ञ करके कबूतरों को दाना चुगाने को कहा। श्रीराम ने वैसे ही किया। उन्होंने ग्वार के दाने हिंगोस नदी में डाले। वे दाने ठूमरा बनकर उभरे, तब उन्हें ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति मिली। वे दाने आज भी यात्री वहां से जमा करके ले जाते हैं।</div>
<div></div>
<div>5. इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता व्याप्त है। कहा जाता है कि हर रात इस स्थान पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं और दिन निकलते हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं।</div>
<div></div>
<div>6. भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्रि ने यहां घोर तपस्या की थी। उनके नाम पर आसाराम नामक स्थान अब भी यहां उपस्थित है। कहा जाता है कि इस प्रसिद्ध मंदिर में माता की पूजा करने को गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव, दादा मखान जैसे महान आध्यात्मिक संत आ चुके हैं। 16वीं सदी में खाकी अखाड़ा के महंत भगवानदास जी ने सांसारिक लोगों के कल्याण के लिए बाड़ी में मां हिंगलाज को ज्योति के रूप में स्थापित किया था।</div>
<div></div>
<div>7. यहां का मंदिर गुफा मंदिर है। ऊंची पहाड़ी पर बनी एक गुफा में माता का विग्रह रूप विराजमान है। पहाड़ की गुफा में माता हिंगलाज देवी का मंदिर है जिसका कोई दरवाजा नहीं। मंदिर की परिक्रमा में गुफा भी है। यात्री गुफा के एक रास्ते से दाखिल होकर दूसरी ओर निकल जाते हैं। मंदिर के साथ ही गुरु गोरखनाथ का चश्मा है। मान्यता है कि माता हिंगलाज देवी यहां सुबह स्नान करने आती हैं। माता हिंगलाज मंदिर परिसर में श्रीगणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध तीर्थ हैं। हिंगलाज मंदिर में दाखिल होने के लिए पत्थर की सीढिय़ां चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर में सबसे पहले श्री गणेश के दर्शन होते हैं जो सिद्धि देते हैं। सामने की ओर माता हिंगलाज देवी की प्रतिमा है जो साक्षात माता वैष्णो देवी का रूप हैं।</div>
<div></div>
<div>8. मुस्लिम काल में इस मंदिर पर मुस्लिम आक्रांतानों ने कई हमले किए लेकिन स्थानीय हिन्दू और मुसलमानों ने इस मंदिर को बचाया। कहते हैं कि जब यह हिस्सा भारत के हाथों से जाता रहा तब कुछ आतंकवादियों ने इस मंदिर को क्षती पहुंचाने का प्रयास किया था लेकिन वे सभी के सभी एक चमत्कार से हवा में लटक गए थे।</div>
<div></div>
<div>9. हिंगलाज की यात्रा कराची से 10 किलोमीटर दूर हॉव नदी से शुरू होती है। हिंगलाज जाने के पहले लासबेला में माता की मूर्ति का दर्शन करना होता है। यह दर्शन छड़ीदार (पुरोहित) कराते हैं। वहां से शिवकुण्ड (चंद्रकूप) जाते हैं, जहां अपने पाप की घोषणा कर नारियल चढ़ाते हैं, जिनकी पाप मुक्ति हो गई और दरबार की आज्ञा मिल गई, उनका नारियल तथा भेंट स्वीकार हो जाती है वरना नारियल वापस लौट आता है। हिंगलाज को &#8216;आग्नेय शक्तिपीठ तीर्थ&#8217; भी कहते हैं, क्योंकि वहां जाने से पूर्व अग्नि उगलते चंद्रकूप पर यात्री को जोर-जोर से अपने गुप्त पापों का विवरण देना पड़ता है तथा भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न करने का वचन भी देना पड़ता है। इसके बाद चंद्रकूप दरबार की आज्ञा मिलती है। चंद्रकूप तीर्थ पहाड़ियों के बीच में धूम्र उगलता एक ऊंचा पहाड़ है। वहां विशाल बुलबुले उठते रहते हैं। आग तो नहीं दिखती किंतु अंदर से यह खौलता, भाप उगलता ज्वालामुखी है।</div>
<div></div>
<div>कहते हैं कि एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चूल चलेगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। चूल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बहार 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं और ये माता का चमत्कार ही है की मन्नतधारी को जरा सी पीड़ा नहीं होती है और ना ही शरीर को किसी प्रकार का नुकसान होता है, लेकीन आपकी मन्नत जरूर पूरी होती है। हालांकि आजकल यह परंपरा नहीं रही।</div>
<div></div>
<div>10. इस सिद्ध पीठ की यात्रा के लिए दो मार्ग हैं- एक पहाड़ी तथा दूसरा मरुस्थली। यात्री जत्था कराची से चल कर लसबेल पहुंचता है और फिर लयारी। कराची से छह-सात मील चलकर &#8220;हाव&#8221; नदी पड़ती है। यहीं से हिंगलाज की यात्रा शुरू होती है। यहीं शपथ ग्रहण की क्रिया सम्पन्न होती है, यहीं पर लौटने तक की अवधि तक के लिए संन्यास ग्रहण किया जाता है। यहीं पर छड़ी का पूजन होता है और यहीं पर रात में विश्राम करके प्रात:काल हिंगलाज माता की जय बोलकर मरुतीर्थ की यात्रा प्रारंभ की जाती है। रास्ते में कई बरसाती नाले तथा कुएं भी मिलते हैं। इसके आगे रेत की एक शुष्क बरसाती नदी है। इस इलाके की सबसे बड़ी नदी हिंगोल है जिसके निकट चंद्रकूप पहाड़ हैं। चंद्रकूप तथा हिंगोल नदी के मध्य लगभग 15 मील का फासला है। हिंगोल में यात्री अपने सिर के बाल कटवा कर पूजा करते हैं तथा यज्ञोपवीत पहनते हैं। उसके बाद गीत गाकर अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हैं।</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
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		<title>क्या मृत्यु के बाद पुनर्जन्म मिलता है, जानिए 10 रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Jan 2021 06:11:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[क्या मृत्यु के बाद पुनर्जन्म मिलता है]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए 10 रहस्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg 622w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />जो जन्मा है वह मरेगा ही चाहे वह मनुष्&#x200d;य हो, देव हो, पशु या पक्षी सभी को मरना है। ग्रह और नक्षत्रों की भी आयु निर्धारित है और हमारे इस सूर्य की भी। पुनर्जन्म की धारणा सिर्फ भारत के धर्मों में ही पाई जाती है जबकि पश्चिम के धर्म इस सिद्धांत को नहीं मानेत हैं। परंतु &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg 622w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>जो जन्मा है वह मरेगा ही चाहे वह मनुष्&#x200d;य हो, देव हो, पशु या पक्षी सभी को मरना है। ग्रह और नक्षत्रों की भी आयु निर्धारित है और हमारे इस सूर्य की भी। पुनर्जन्म की धारणा सिर्फ भारत के धर्मों में ही पाई जाती है जबकि पश्चिम के धर्म इस सिद्धांत को नहीं मानेत हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या मृत्यु के बाद पुनर्जन्म मिलता है और पुनर्जन्म आखिर होता क्या है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="622" height="432" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg" alt="" class="wp-image-409095" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf.jpg 622w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/sdsfsdf-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 622px) 100vw, 622px" /></figure>



<p><strong>1. 30 सेकंड में अगला जन्म :</strong> उपनिषदों के अनुसार एक क्षण के कई भाग कर दीजिए उससे भी कम समय में आत्मा एक शरीर छोड़ तुरंत दूसरे शरीर को धारण कर लेता है। यह सबसे कम समयावधि है। सबसे ज्यादा समायावधि है 30 सेकंड। परंतु पुराणों के अनुसार यह समय लंबा की हो सकता है 3 दिन, 13 दिन, सवा माह या सवाल साल। इससे ज्यादा जो आत्मा नया शरीर धारण नहीं कर पाती है वह मुक्ति हेतु धरती पर ही भटकती है, स्वर्गलोक चली जाती है, पितृलोक चली जाती है या अधोलोक में गिरकर समय गुजारती है।</p>



<p><strong>2. प्राणवायु से जुड़ा संबंध : </strong>सूक्ष्म शरीर को धारण किए हुए आत्मा का स्थूल शरीर के साथ बार-बार संबंध टूटने और बनने को पुनर्जन्म कहते हैं। इसका उत्तर जन्म के उत्तर में ही छिपा हुआ है। दरअसल, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच जो प्राणों का संबंध स्थापित है उसका संबंध टूट जाना ही मृत्यु है और उसका जुड़ जाना ही पुनर्जन्म है।</p>



<p><strong>3. मुक्त जरूरी :&nbsp;</strong>कर्म और पुनर्जन्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कर्मों के फल के भोग के लिए ही पुनर्जन्म होता है तथा पुनर्जन्म के कारण फिर नए कर्म संग्रहीत होते हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म के दो उद्देश्य हैं- पहला, यह कि मनुष्य अपने जन्मों के कर्मों के फल का भोग करता है जिससे वह उनसे मुक्त हो जाता है। दूसरा, यह कि इन भोगों से अनुभव प्राप्त करके नए जीवन में इनके सुधार का उपाय करता है जिससे बार-बार जन्म लेकर जीवात्मा विकास की ओर निरंतर बढ़ती जाती है तथा अंत में अपने संपूर्ण कर्मों द्वारा जीवन का क्षय करके मुक्तावस्था को प्राप्त होती है।</p>



<p><strong>4. दूसरे जन्म की जाति:</strong> पुनर्जन्म के बाद मिलती है कौनसी योनी यह सभी सोचते होंगे। जन्म को जाति भी कहा जाता है। जैसे उदाहरणार्थ.: वनस्पति जाति, पशु जाति, पक्षी जाति और मनुष्य जाति। कर्मों के अनुसार जीवात्मा जिस शरीर को प्राप्त होता है वह उसकी जाति कहलाती है। यदि अच्छे कर्म किए हैं तो कम से कम मनुष्&#x200d;य से नीचे की जाति नहीं मिलेगी। बुरे कर्म किए हैं तो कोई गारंटी नहीं।<br><strong>5. पुनर्जन्म पर शोध : </strong>गीता प्रेस गोरखपुर ने भी अपनी एक किताब &#8216;परलोक और पुनर्जन्मांक&#8217; में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन किया है जिससे पुनर्जन्म होने की पुष्टि होती है। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा &#8216;आचार्य&#8217; ने एक किताब लिखी है, &#8216;पुनर्जन्म : एक ध्रुव सत्य।&#8217; इसमें पुनर्जन्म के बारे में अच्छी विवेचना की गई है। पुनर्जन्म में रुचि रखने वाले को ओशो की किताबें जैसे &#8216;विज्ञान भैरव तंत्र&#8217; के अलावा उक्त दो किताबें जरूर पढ़ना चाहिए। ओशो रजनीश ने पुनर्जन्म पर बहु&#x200d;त अच्छे प्रवचन दिए हैं। उन्होंने खुद के भी पिछले जन्मों के बारे में विस्तार से बताया है। इसी प्रकार बेंगलुरु की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत पसरिया द्वारा इस विषय पर शोध किया गया था। उन्होंने अपने इस शोध को एक किताब का रूप दिया जिसका नाम है- &#8216;श्क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशनरू एम्पिरिकल स्टी ऑफ कैसेज इन इंडियास।&#8217; इस किताब में 1973 के बाद से भारत में हुई 500 पुनर्जन्म की घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आधुनिक युग में पुनर्जन्म पर अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेंसन ने 40 साल तक इस विषय पर शोध करने के बाद एक किताब &#8216;रिइंकार्नेशन एंड बायोलॉजी&#8217; लीखी थी जिसे सबसे महत्वपूर्ण शोध किताब माना गया है।</p>



<p><strong>6. आठ कारणों से लेती आत्मा पुनर्जन्म:-</strong></p>



<p>1. भगवान की आज्ञा से : भगवान किसी विशेष कार्य के लिए महात्माओं और दिव्य पुरुषों की आत्माओं को पुन: जन्म लेने की आज्ञा देते हैं।</p>



<p>2. पुण्य समाप्त हो जाने पर : संसार में किए गए पुण्य कर्म के प्रभाव से व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग में सुख भोगती है और जब तक पुण्य कर्मों का प्रभाव रहता है, वह आत्मा दैवीय सुख प्राप्त करती है। जब पुण्य कर्मों का प्रभाव खत्म हो जाता है तो उसे पुन: जन्म लेना होता है।</p>



<p>3. पुण्य फल भोगने के लिए : कभी-कभी किसी व्यक्ति द्वारा अत्यधिक पुण्य कर्म किए जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उन पुण्य कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा पुन: जन्म लेती है।</p>



<p>4. पाप का फल भोगने के लिए।</p>



<p>5. बदला लेने के लिए : आत्मा किसी से बदला लेने के लिए पुनर्जन्म लेती है। यदि किसी व्यक्ति को धोखे से, कपट से या अन्य किसी प्रकार की यातना देकर मार दिया जाता है तो वह आत्मा पुनर्जन्म अवश्य लेती है।</p>



<p>6. बदला चुकाने के लिए।<br>7. अकाल मृत्यु हो जाने पर।<br>8. अपूर्ण साधना को पूर्ण करने के लिए।</p>



<p><strong>7.इस तरीके से जाने आप अपना पिछला जन्म : </strong>इसे जाति स्मरण का प्रयोग कहते हैं। इसके बारे में तो आपने पढ़ा ही होगा। जब चित्त स्थिर हो जाए अर्थात मन भटकना छोड़कर एकाग्र होकर श्वासों में ही स्थिर रहने लगे, तब जाति स्मरण का प्रयोग करना चाहिए। जाति स्मरण के प्रयोग के लिए ध्यान को जारी रखते हुए आप जब भी बिस्तर पर सोने जाएं तब आंखे बंद करके उल्टे क्रम में अपनी दिनचर्या के घटनाक्रम को याद करें। जैसे सोने से पूर्व आप क्या कर रहे थे, फिर उससे पूर्व क्या कर रहे थे तब इस तरह की स्मृतियों को सुबह उठने तक ले जाएं। दिनचर्या का क्रम सतत जारी रखते हुए &#8216;मेमोरी रिवर्स&#8217; को बढ़ाते जाए। ध्यान के साथ इस जाति स्मरण का अभ्यास जारी रखने से कुछ माह बाद जहां मोमोरी पॉवर बढ़ेगा, वहीं नए-नए अनुभवों के साथ पिछले जन्म को जानने का द्वार भी खुलने लगेगा। जैन धर्म में जाति स्मरण के ज्ञान पर विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसके अलावा योग में अ&#x200d;ष्टसिद्धि के अलावा अन्य 40 प्रकार की सिद्धियों का वर्णन मिलता है। उनमें से ही एक है पूर्वजन्म ज्ञान सिद्धि योग। इस योग की साधना करने से व्यक्ति को अपने अगले पिछले सारे जन्मों का ज्ञान होने लगता है। यह साधना कठिन जरूर है, लेकिन योगाभ्यासी के लिए सरल है। सम्मोहन क्रिया से भी पिछला जन्म जाना जा सकता है।</p>



<p><strong>8. मरने के बाद कौन कहां चला जाता है :</strong>&nbsp;यजुर्वेद में कहा गया है कि शरीर छोड़ने के पश्चात्य, जिन्होंने तप-ध्यान किया है वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं अर्थात ब्रह्मलीन हो जाते हैं। कुछ सतकर्म करने वाले भक्तजन स्वर्ग चले जाते हैं। स्वर्ग अर्थात वे देव बन जाते हैं। राक्षसी कर्म करने वाले कुछ प्रेत योनि में अनंतकाल तक भटकते रहते हैं और कुछ पुन: धरती पर जन्म ले लेते हैं। जन्म लेने वालों में भी जरूरी नहीं कि वे मनुष्य योनि में ही जन्म लें। गति कई प्रकार की होती है। प्रेतयोनि में जाना एक दुर्गति है।<br><strong>9. जन्म चक्र:-&nbsp;</strong>पुराणों के अनुसार व्यक्ति की आत्मा प्रारंभ में अधोगति होकर पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, पशु-पक्षी योनियों में विचरण कर ऊपर उठती जाती है और अंत में वह मनुष्य वर्ग में प्रवेश करती है। मनुष्य अपने प्रयासों से देव या दैत्य वर्ग में स्थान प्राप्त कर सकता है। वहां से पतन होने के बाद वह फिर से मनुष्य वर्ग में गिर जाता है। यदि आपने अपने कर्मों से मनुष्य की चेतना के स्तर से खुद को नीचे गिरा लिया है तो आप फिर से किसी पक्षी या पशु की योनी में चले जाएंगे। यह क्रम चलता रहता है। अर्थात व्यक्ति नीचे गिरता या कर्मों से उपर उठता चला जाता है।</p>



<p><strong>10. प्रारब्ध कर्म:-&nbsp;</strong>यही कारण है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार जीवन मिलता है और वह अपने कर्मों का फल भोगता रहता है। यही कर्मफल का सिद्धांत है। &#8216;प्रारब्ध&#8217; का अर्थ ही है कि पूर्व जन्म अथवा पूर्वकाल में किए हुए अच्छे और बुरे कर्म जिसका वर्तमान में फल भोगा जा रहा हो। विशेषतया इसके 2 मुख्य भेद हैं कि संचित प्रारब्ध, जो पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप होता है और क्रियमान प्रारब्ध, जो इस जन्म में किए हुए कर्मों के फलस्वरूप होता है। इसके अलावा अनिच्छा प्रारब्ध, परेच्छा प्रारब्ध और स्वेच्छा प्रारब्ध नाम के 3 गौण भेद भी हैं। प्रारब्ध कर्मों के परिणाम को ही कुछ लोग भाग्य और किस्मत का नाम दे देते हैं। पूर्व जन्म और कर्मों के सिद्धांत को समझना जरूरी है।</p>
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