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	<title>जानिए रहस्य &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>जानिए रहस्य &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>सृष्टि के रचयिता होने के बाद भी आखिर क्यों नहीं होती ब्रह्मदेव की पूजा, जानिए रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Apr 2021 04:10:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए रहस्य]]></category>
		<category><![CDATA[सृष्टि के रचयिता होने के बाद भी आखिर क्यों नहीं होती ब्रह्मदेव की पूजा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="311" height="450" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg 311w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH-207x300.jpg 207w" sizes="(max-width: 311px) 100vw, 311px" />इस दुनिया की रचना ब्रह्मदेव द्वारा की गई थी। जगत के हर जीव का निर्माण ब्रह्मदेव ने ही किया है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव जिनकी पदवी इतनी उच्च है, तो उनकी आराधना क्यों नही की जाती? पूरी दुनिया में ब्रह्मदेव के सिर्फ गिने-चुने ही मंदिर हैं, जिनमें से &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="311" height="450" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg 311w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH-207x300.jpg 207w" sizes="(max-width: 311px) 100vw, 311px" /><p>इस दुनिया की रचना ब्रह्मदेव द्वारा की गई थी। जगत के हर जीव का निर्माण ब्रह्मदेव ने ही किया है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस सृष्टि के रचयिता ब्रह्मदेव जिनकी पदवी इतनी उच्च है, तो उनकी आराधना क्यों नही की जाती? पूरी दुनिया में ब्रह्मदेव के सिर्फ गिने-चुने ही मंदिर हैं, जिनमें से सिर्फ राजस्थान के पुष्कर में ब्रह्मदेव मंदिर सबसे प्राचीन तथा लोकप्रिय है। ऐसा क्यूं? आज हम आपको बताएंगे कि क्यों ब्रह्मदेव की उपासना नहीं की जाती है? ब्रह्मा जी से ही वेद ज्ञान का प्रचार हुआ। उनके चार चेहरे, चार भुजाएं तथा प्रत्येक भुजा में एक-एक वेद है लेकिन बेहद ही कम सम्प्रदाय हैं जो उनकी उपासना करते हैं। उनकी पूजा न होने के सबसे मुख्य तथा अहम वजह पर हम प्रकाश डालेंगे। तो आइए जानते हैं-<img decoding="async" class="size-full wp-image-437872 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg" alt="" width="311" height="450" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH.jpg 311w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/GBUH-207x300.jpg 207w" sizes="(max-width: 311px) 100vw, 311px" /></p>
<p>एक बार ब्रह्मा जी को सृष्टि के कल्याण के लिए भूमि पर एक यज्ञ सम्पन्न करना था। यज्ञ के लिए जगह का चुनाव करने के लिए उन्होंने अपनी बांह से निकले एक कमल को भूमि पर भेजा। वो कमल राजस्थान के पुष्कर में गिरा। इस पुष्प के यहां गिरने से एक नदी का निर्माण हुआ तथा ब्रह्मा जी ने यही जगह यज्ञ के लिए चुना लेकिन यज्ञ के लिए ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री वक़्त पर नहीं पहुंच पाईं। वही इस यज्ञ को संपन्न करने के लिए एक स्त्री की जरुरत थी। यज्ञ का वक़्त निकला जा रहा था लेकिन सावित्री नहीं पहुंचीं। यदि यज्ञ वक़्त पर संपन्न नहीं होता तो इसका लाभ नहीं प्राप्त हो सकता था। इसलिए ब्रह्मा जी ने स्थानीय ग्वालन से शादी कर ली तथा यज्ञ में बैठ गए।</p>
<p>वही यज्ञ शुरू होने के थोड़े समय बाद ही जब सावित्री पहुंची तो अपनी जगह पर किसी दूसरी स्त्री को देख क्रोधित हो उठीं तथा ब्रम्हा जी को श्राप दिया कि इस पूरी दुनिया पर कहीं तुम्हारी पूजा नहीं होगी तथा कोई भी व्यक्ति तुम्हें पूजा के वक़्त याद नहीं करेगा। सावित्री को इतने गुस्से में देख सभी देवता डर गए तथा सबने सावित्री से विनती की कि वो अपना श्राप वापस ले लें। तब सावित्री ने क्रोध शांत हो जाने के पश्चात् कहा कि जिस जगह पर आपने यज्ञ किया है सिर्फ इसी जगह पर आपका मंदिर बनेगा। इसी वजह से सिर्फ पुष्कर में ही ब्रह्मा जी को पूजा जाता है।</p>
<p>प्रथा है कि क्रोध शांत होने के बाद देवी सावित्री पास ही स्थित एक पहाड़ी पर जाकर तपस्या में लीन हो गईं तथा आज भी वहां मौजूद हैं तथा अपने श्रद्धालुओं का कल्याण करती हैं। यहां आकर विवाहित स्त्रियां अपने समृद्ध वैवाहिक जीवन के लिए मनोकामना करती हैं। ब्रह्मा जी का पुष्कर में स्थित ये मंदिर बहुत लोकप्रिय है तथा अजमेर आने वाले सभी हिन्दू पुष्कर में ब्रह्मदेव के मंदिर तथा वहां स्थित तालाब के दर्शन करने जरूर आते हैं।</p>
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		<title>हनुमानजी इन दो पर सवार होकर उड़ते हैं, जानिए रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 Jan 2021 05:41:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए रहस्य]]></category>
		<category><![CDATA[हनुमानजी इन दो पर सवार होकर उड़ते हैं]]></category>
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					<description><![CDATA[हर देवी या देवता किसी न किसी की सवारी करने के बाद ही गमन करते हैं, जैसे लक्ष्मीजी उल्लू पर, विष्णुजी गरुढ़ पर, माता दुर्गा शेर पर और इसी तरह सभी देवी देवताओं के पार अपनी अपनी सवारी है परंतु क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी के पास कितने प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं और वे कौन &#8230;]]></description>
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<p>हर देवी या देवता किसी न किसी की सवारी करने के बाद ही गमन करते हैं, जैसे लक्ष्मीजी उल्लू पर, विष्णुजी गरुढ़ पर, माता दुर्गा शेर पर और इसी तरह सभी देवी देवताओं के पार अपनी अपनी सवारी है परंतु क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी के पास कितने प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं और वे कौन से वाहन की सवारी करते हैं? नहीं जानते हैं तो आओ आज हम आपको बताते हैं।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="700" height="500" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/66-1.jpg" alt="" class="wp-image-412918" /></figure>



<p><strong>खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् ।</strong></p>



<p><strong>मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥ ८॥</strong></p>



<p><strong>एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।</strong></p>



<p><strong>प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥ ९॥</strong></p>



<p><strong>हनुमानजी का वाहन :</strong></p>



<p> &#8216;हनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्र&#8217; के 72वें श्&#x200d;लोक में उन्हें &#8216;वायुवाहन:&#8217; कहा गया। मतलब यह कि उनका वाहन वायु है। वे वायु पर सवार होकर अति प्रबल वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं। हनुमान जी ने एक बार श्रीराम और लक्ष्&#x200d;मण को अपने कंधे पर बैठाकर उड़ान भरा था। उसके बाद एक बार हनुमान जी ने बात-बात में द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर लंका ले गए और उसी रात को यथास्थान रख आए थे।</p>



<p><strong>भूतों की सवारी :&nbsp;</strong>प्रचलित मान्यता और जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है हनुमानजी भूतों की सवारी भी करते हैं।<br><strong>हनुमानजी के अस्त्र और शस्त्र :&nbsp;</strong>हनुमानजी के अस्त्र-शस्त्रों में पहला स्थान उनकी गदा का है। कुबेर ने गदाघात से अप्रभावित होने का वर दिया है। हनुमान जी वज्रांग हैं। यम ने उन्हें अपने दंड से अभयदान दिया है। भगवान शंकर ने हनुमानजी को शूल एवं पाशुपत, त्रिशूल आदि अस्त्रों से अभय होने का वरदान दिया था। अस्त्र-शस्त्र के कर्ता विश्&#x200d;वकर्मा ने हनुमान जी को समस्त आयुधों से अवध्&#x200d;य होने का वरदान दिया है।</p>



<p>उनके संपूर्ण अंग-प्रत्यंग, रद, मुष्ठि, नख, पूंछ, गदा एवं गिरि, पादप आदि प्रभु के अमंगलों का नाश करने के लिए एक दिव्यास्त्र के समान है।</p>



<p> 1.खड्ग, 2.त्रिशूल, 3.खट्वांग, 4.पाश, 5.पर्वत, 6.अंकुश, 7.स्तम्भ, 8.मुष्टि, 9.गदा और 10.वृक्ष हैं।<br>हनुमानजी का बायां हाथ गदा से युक्त कहा गया है। &#8216;वामहस्तगदायुक्तम्&#8217;. श्री लक्ष्&#x200d;मण और रावण के बीच युद्ध में हनुमान जी ने रावण के साथ युद्ध में गदा का प्रयोग किया था। उन्होंने गदा के प्रहार से ही रावण के रथ को खंडित किया था। स्कंदपुराण में हनुमानजी को वज्रायुध धारण करने वाला कहकर उनको नमस्कार किया गया है। उनके हाथ में वज्र सदा विराजमान रहता है। अशोक वाटिका में हनुमानजी ने राक्षसों के संहार के लिए वृक्ष की डाली का उपयोग किया था। हनुमानजी का एक अस्त्र उनकी पूंछ भी है। अपनी मुष्टिप्रहार से उन्होंने कई दुष्&#x200d;टों का संहार किया है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>इस देवी की मूर्ति के पीछे किस भाषा में क्या लिखा हुआ है, जानिए रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Namita]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Dec 2019 05:45:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[इस देवी की मूर्ति के पीछे किस भाषा में क्या लिखा हुआ है]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए रहस्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489-300x225.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />भारत रहस्यों से भरा देश है। हजारों ऐसे रहस्य हैं जिन्हें अब तक नहीं सुलझा पाए हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक है देवी उग्रतारा का एक मंदिर और मंदिर में रखी चतुर्भुजी देवी की प्रतीमा पर खुदा हुआ कोई रहस्य। कहते हैं कि यह मूर्ति लगभग एक हजार वर्ष से भी पुरानी है। कहां &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489-300x225.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><div>भारत रहस्यों से भरा देश है। हजारों ऐसे रहस्य हैं जिन्हें अब तक नहीं सुलझा पाए हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक है देवी उग्रतारा का एक मंदिर और मंदिर में रखी चतुर्भुजी देवी की प्रतीमा पर खुदा हुआ कोई रहस्य। कहते हैं कि यह मूर्ति लगभग एक हजार वर्ष से भी पुरानी है।<img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-295419 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489-300x225.jpg" alt="" width="699" height="524" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/12/1557815928-5489.jpg 740w" sizes="auto, (max-width: 699px) 100vw, 699px" /></div>
<div></div>
<div><strong>कहां हैं मंदिर और मूर्ति?</strong></div>
<div>बालूमाथ और औद्योगिक नगरी चंदवा के बीच एनएच-99 रांची मार्ग पर नगर नामक स्थान में एक अति प्राचीन मंदिर है जो भगवती उग्रतारा को समर्पित है। यह एक शक्तिपीठ है। मान्यता है कि यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इस मंदिर के निर्माण में टोरी स्टेट के शासक पीतांबर नाथ शाही और पुन:निर्माण में रानी अहिल्याबाई का नाम जुड़ा हुआ है। मंदिर निर्माण से जुड़ी मान्यताएं पलामू के गजट 1961 में दर्शाया गया है।</div>
<div></div>
<div><strong>रहस्यमयी लिपि का रहस्य बरकरार-</strong></div>
<div>बालूमाथ से 25 किलोमीटर दूर प्रखंड के श्रीसमाद गांव के पास तितिया या तिसिया पहाड़ के पास पुरातत्व विभाग को चतुर्भुजी देवी की एक मूर्ति मिली है, जिसके पीछे अंकित लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। यह लिपि न तो ब्राह्मी है और न ही देवनागरी या भारत की अन्य कोई लिपि। भारत में अब तक ज्ञात सभी लिपियों से अलग इस लिपि को क्या कहा जाए यह पुरात्वविदों और शोधकर्ताओं के लिए अभी भी एक पहेली बनी हुई है।</div>
<div></div>
<div><strong>मंदिर और मूर्ति से जुड़ी मान्यता-</strong></div>
<div>मान्यता यह है कि टोरी के शासक पीतांबर नाथ शाही शिकार करते हुए लातेहार के मनकेरी गांव पहुंचे, तभी उन्हें प्यास लगी और पास के जोड़ा तालाब में पानी पीने गए। तभी तालाब से उन्हें दो मूर्तियां एक लक्ष्मी और दूसरी उग्रतारा की मिलीं। कुछ दिन पूर्व उन्हें स्वप्न में यही दो मूर्तियां दिखाई दी थीं। शिकार से लौटने के बाद उन्होंने मंदिर बनाने का निर्णय लिया और उसका निर्माण करवाया। लातेहार में आज भी मनकेरी गांव में जोड़ा तालाब है।</div>
<div class="_yeti_done"></div>
<div><strong>मंदिर की परंपरा-</strong> यहां नाथ संप्रदाय के गिरि उपाधि धारी लोग रहते हैं। मंदिर की मुख्य विशेषता इसका किसी विशेष वंश, कुल, परंपरा तथा संप्रदाय संकीर्णता से मुक्त रहना है। पहले पुरोहित के रूप में स्व. पंचानन मिश्र का नाम आता है, जिन्हें राजा ने नियुक्त किया था। मां उग्रतारा नगर मंदिर में राज दरबार की व्यवस्था आज भी कायम है। यहां पुजारी के रूप में मिश्रा और पाठक परिवार के अलावा बकरे की बलि देने के लिए पुरुषोत्तम पाहन, नगाड़ा बजाने के लिए घांसी, काड़ा की बलि देने के लिए पुजारी नियुक्त होते हैं।</div>
<div></div>
<div>इसके निर्माण में रानी अहिल्याबाई का नाम भी जुड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में सभी को पूजा करने का समान अधिकार प्राप्त नहीं था। बंगाल यात्रा के दौरान रानी ने इस क्षेत्र में भ्रमण कर सभी जाति के लोगों को पूजा का समान अधिकार दिलाने के लिए मंदिर का निर्माण कराया था।</p>
</div>
<div>ऐसी मान्यता भी है कि 16 दिन का नवरात्रि उत्सव की परंपरा भी प्राचीकाल से चली आ रही है। जिउतिया की सुबह मातृ नवमी के दिन कलश स्थापना के बाद नवरात्रि प्रारंभ होता है। सप्तमी और अष्टमी के बीच बकरे और विजयादशमी के दिन बकरे और भैंसे की बलि देने की परंपरा है। दशहरा के दिन मूर्ति विसर्जन के लिए माता पर पान चढ़ाकर आदेश लिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पान के गिरने के बाद यह समझ लिया जाता है कि विसर्जन के लिए माता का आदेश है।</div>
<div></div>
<div><strong>रहस्यमयी है संपूर्ण क्षेत्र-</strong></div>
<div>मां भगवती उग्रतारा के दक्षिणी और पश्चिमी कोने पर स्थित चुटुबाग नामक पर्वत पर मां भ्रामरी देवी की गुफाएं हैं, जहां कई स्थानों पर बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है। कहते हैं कि यहां करीब सत्तर फीट नीचे सतयुगी केले का वृक्ष है, जो वर्षों पुराना होने के बावजूद आज भी हराभरा है। इसमें फल भी लगता है। इसके अलाव वहां मौजूद एक पत्थर के छिद्र से पानी हमेशा निकलता रहता है, मगर यह पानी सिर्फ केले के वृक्षों को ही प्राप्त होता है।</div>
<div></div>
<div><strong>कौन है देवी उग्रतारा?</strong></div>
<div>भगवान शिव द्वारा, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान करने पर, उनके शारीरिक की पीड़ा के निवारण हेतु, आदिशक्ति देवी ने देवी तारा के स्वरूप में प्रकट होकर शिवजी को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। इसके कारण शिवजी का हलाहल विष का असर शांत हो गया था। देवी तारा अपने मुख्य तीन स्वरूप से विख्यात हैं, उग्र तारा, नील सरस्वती तथा एक-जटा।</p>
</div>
<div></div>
<div>देवी के अन्य आठ रूप भी है जिन्हें &#8216;अष्ट तारा&#8217; समूह कहते हैं- तारा, उग्र तारा, महोग्र तारा, वज्र तारा, नील तारा, सरस्वती, कामेश्वरी और भद्र काली-चामुंडा। यह देवी काली कुल की मानी गई हैं। दिशा उपर की ओर, वाहन गीदड़, वर्ण नीला और स्वभाव सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न है। तारा देवी को दश महाविद्या में भी शामिल किया गया है।</p>
</div>
<div><strong>माता के तीन ही प्रमुख स्थान हैं- </strong>मुख्य रूप से तारापीठ, रामपुरहाट बीरभूम पश्चिम बंगाल, सुघंधा बांग्लादेश तथा सासाराम बिहार में स्थिति इसके तीन प्रमुख शक्तिपीठ हैं लेकिन इसके अलावा भी माता के कुछ रहस्यमयी मंदिर और मूर्तियां भी विद्यमान हैं।</div>
<div></div>
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		<title>क्यों अर्जुन ने की थी जलपरी नागकन्या उलूपी से शादी, जानिए रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Namita]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Apr 2019 09:27:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[क्यों अर्जुन ने की थी जलपरी नागकन्या उलूपी से शादी]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए रहस्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />महाभारत और रामयण से जुडी कई ऐसी बातें हैं जो लोग नहीं जानते हैं. इसी तरह लोग अर्जुन की चौथी पत्नी के बारे में भी नहीं जानते हैं जो आज हम बताने जा रहे हैं आइए जानते हैं. महाभारत के अनुसार &#8211; अर्जुन की चौथी पत्नी का नाम जलपरी नागकन्या उलूपी था. उन्हीं ने अर्जुन को &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>महाभारत और रामयण से जुडी कई ऐसी बातें हैं जो लोग नहीं जानते हैं. इसी तरह लोग अर्जुन की चौथी पत्नी के बारे में भी नहीं जानते हैं जो आज हम बताने जा रहे हैं आइए जानते हैं.<img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-220603 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg" alt="" width="639" height="443" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/04/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w" sizes="auto, (max-width: 639px) 100vw, 639px" /></p>
<p><strong>महाभारत के अनुसार &#8211; </strong>अर्जुन की चौथी पत्नी का नाम जलपरी नागकन्या उलूपी था. उन्हीं ने अर्जुन को जल में हानिरहित रहने का वरदान दिया था. महाभारत युद्ध में अपने गुरु भीष्म पितामह को मारने के बाद ब्रह्मा-पुत्र से शापित होने के बाद उलूपी ने ही अर्जुन को शापमुक्त भी किया था और अपने सौतेले पुत्र बभ्रुवाहन के हाथों मारे जाने पर उलूपी ने ही अर्जुन को पुनर्जीवित भी कर दिया था. विष्णु पुराण के अनुसार अर्जुन से उलूपी ने इरावन नामक पुत्र को जन्म दिया. इसी इरावन को भारत के सभी हिजड़े अपना देवता मानते हैं. उलूपी अर्जुन के सदेह स्वगारोहण के समय तक उनके साथ थी. कहते हैं कि द्रौपदी, जो पांचों पांडवों की पत्नी थीं, 1-1 साल के समय-अंतराल के लिए हर पांडव के साथ रहती थी. उस समय किसी दूसरे पांडव को द्रौपदी के आवास में घुसने की अनुमति नहीं थी.</p>
<p>इस नियम को तोड़ने वाले को 1 साल तक देश से बाहर रहने का दंड था. अर्जुन और द्रौपदी की 1 वर्ष की अवधि अभी-अभी समाप्त हुई थी और द्रौपदी-युधिष्ठिर के साथ का एक वर्ष का समय शुरू हुआ था. अर्जुन भूलवश द्रौपदी के आवास पर ही अपना तीर-धनुष भूल आए. पर किसी दुष्ट से ब्राह्मण के पशुओं की रक्षा के लिए लिए उन्हें उसी समय इसकी जरूरत पड़ी अत: क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए तीर-धनुष लेने के लिए नियम तोड़ते हुए वह द्रौपदी के निवास में घुस गए. बाद में इसके दंडस्वरूप वे 1 साल के लिए राज्य से बाहर चले गए. इसी एक साल के वनवास के दौरान अर्जुन की मुलाकात उलूपी से हुई और वह अर्जुन पर मोहित हो गईं.</p>
<p>ऐसे में वह उन्हें खींचकर अपने नागलोक में ले गई और उसके अनुरोध करने पर अर्जुन को उससे विवाह करना पड़ा. कहते हैं कि दोनों एक वर्ष तक साथ रहे. यह भी कहा जाता है कि अर्जुन ने नागराज के घर में ही वह रात्रि व्&#x200d;यतीत की. फिर सूर्योदय होने पर उलूपी के साथ अर्जुन नागलोक से ऊपर को उठे और फिर से हरिद्वार (गंगाद्वार) में गंगा के तट पर आ पहुंचे. उलूपी उन्&#x200d;हे वहां छोड़कर पुन: अपने घर को लौट गई. जाते समय उसने अर्जुन को यह वर दिया कि आप जल में सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वश में रहेंगे. अर्जुन और नागकन्या उलूपी के मिलन से अर्जुन को एक वीरवार पुत्र मिला जिसका नाम इरावान रखा गया. भीष्म पर्व के 90वें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को इरावान का परिचय देते हुए बताते हैं कि इरावान नागराज कौरव्य की पुत्री उलूपी के गर्भ से अर्जुन द्वारा उत्पन्न किया गया था.</p>
<p>नागराज की वह पुत्री उलूपी संतानहीन थी. उसके मनोनीत पति को गरूड़ ने मार डाला था, जिससे वह अत्यंत दीन एवं दयनीय हो रही थी. ऐरावतवंशी कौरव्य नाग ने उसे अर्जुन को अर्पित किया और अर्जुन ने उस नागकन्या को भार्या रूप में ग्रहण किया था. इस प्रकार अर्जुन पुत्र उत्पन्न हुआ था. इरावान सदा मातृकुल में रहा. वह नागलोक में ही माता उलूपी द्वारा पाल-पोसकर बड़ा किया गया और सब प्रकार से वहीं उसकी रक्षा की गयी थी. इरावान भी अपने पिता अर्जुन की भांति रूपवान, बलवान, गुणवान और सत्य पराक्रमी था.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>अर्जुन ने की थी जलपरी नागकन्या उलूपी से शादी, जानिए रहस्य</title>
		<link>https://livehalchal.com/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a5%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%95/216204</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Mar 2019 05:01:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[अर्जुन ने की थी जलपरी नागकन्या उलूपी से शादी]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए रहस्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />महाभारत और रामयण से जुडी कई ऐसी बातें हैं जो लोग नहीं जानते हैं. इसी तरह लोग अर्जुन की चौथी पत्नी के बारे में भी नहीं जानते हैं जो आज हम बताने जा रहे हैं आइए जानते हैं. महाभारत के अनुसार &#8211; अर्जुन की चौथी पत्नी का नाम जलपरी नागकन्या उलूपी था. उन्हीं ने अर्जुन को &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="429" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>महाभारत और रामयण से जुडी कई ऐसी बातें हैं जो लोग नहीं जानते हैं. इसी तरह लोग अर्जुन की चौथी पत्नी के बारे में भी नहीं जानते हैं जो आज हम बताने जा रहे हैं आइए जानते हैं.<img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-216205 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg" alt="" width="630" height="437" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-300x208.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae-110x75.jpg 110w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/03/nagkanya_5c8a0ae05c7ae.jpg 649w" sizes="auto, (max-width: 630px) 100vw, 630px" /></p>
<p><strong>महाभारत के अनुसार &#8211; </strong>अर्जुन की चौथी पत्नी का नाम जलपरी नागकन्या उलूपी था. उन्हीं ने अर्जुन को जल में हानिरहित रहने का वरदान दिया था. महाभारत युद्ध में अपने गुरु भीष्म पितामह को मारने के बाद ब्रह्मा-पुत्र से शापित होने के बाद उलूपी ने ही अर्जुन को शापमुक्त भी किया था और अपने सौतेले पुत्र बभ्रुवाहन के हाथों मारे जाने पर उलूपी ने ही अर्जुन को पुनर्जीवित भी कर दिया था. विष्णु पुराण के अनुसार अर्जुन से उलूपी ने इरावन नामक पुत्र को जन्म दिया. इसी इरावन को भारत के सभी हिजड़े अपना देवता मानते हैं. उलूपी अर्जुन के सदेह स्वगारोहण के समय तक उनके साथ थी. कहते हैं कि द्रौपदी, जो पांचों पांडवों की पत्नी थीं, 1-1 साल के समय-अंतराल के लिए हर पांडव के साथ रहती थी. उस समय किसी दूसरे पांडव को द्रौपदी के आवास में घुसने की अनुमति नहीं थी.</p>
<p>इस नियम को तोड़ने वाले को 1 साल तक देश से बाहर रहने का दंड था. अर्जुन और द्रौपदी की 1 वर्ष की अवधि अभी-अभी समाप्त हुई थी और द्रौपदी-युधिष्ठिर के साथ का एक वर्ष का समय शुरू हुआ था. अर्जुन भूलवश द्रौपदी के आवास पर ही अपना तीर-धनुष भूल आए. पर किसी दुष्ट से ब्राह्मण के पशुओं की रक्षा के लिए लिए उन्हें उसी समय इसकी जरूरत पड़ी अत: क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए तीर-धनुष लेने के लिए नियम तोड़ते हुए वह द्रौपदी के निवास में घुस गए. बाद में इसके दंडस्वरूप वे 1 साल के लिए राज्य से बाहर चले गए. इसी एक साल के वनवास के दौरान अर्जुन की मुलाकात उलूपी से हुई और वह अर्जुन पर मोहित हो गईं. ऐसे में वह उन्हें खींचकर अपने नागलोक में ले गई और उसके अनुरोध करने पर अर्जुन को उससे विवाह करना पड़ा. कहते हैं कि दोनों एक वर्ष तक साथ रहे. यह भी कहा जाता है कि अर्जुन ने नागराज के घर में ही वह रात्रि व्&#x200d;यतीत की. फिर सूर्योदय होने पर उलूपी के साथ अर्जुन नागलोक से ऊपर को उठे और फिर से हरिद्वार (गंगाद्वार) में गंगा के तट पर आ पहुंचे. उलूपी उन्&#x200d;हे वहां छोड़कर पुन: अपने घर को लौट गई. जाते समय उसने अर्जुन को यह वर दिया कि आप जल में सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वश में रहेंगे. अर्जुन और नागकन्या उलूपी के मिलन से अर्जुन को एक वीरवार पुत्र मिला जिसका नाम इरावान रखा गया. भीष्म पर्व के 90वें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को इरावान का परिचय देते हुए बताते हैं कि इरावान नागराज कौरव्य की पुत्री उलूपी के गर्भ से अर्जुन द्वारा उत्पन्न किया गया था.</p>
<p>नागराज की वह पुत्री उलूपी संतानहीन थी. उसके मनोनीत पति को गरूड़ ने मार डाला था, जिससे वह अत्यंत दीन एवं दयनीय हो रही थी. ऐरावतवंशी कौरव्य नाग ने उसे अर्जुन को अर्पित किया और अर्जुन ने उस नागकन्या को भार्या रूप में ग्रहण किया था. इस प्रकार अर्जुन पुत्र उत्पन्न हुआ था. इरावान सदा मातृकुल में रहा. वह नागलोक में ही माता उलूपी द्वारा पाल-पोसकर बड़ा किया गया और सब प्रकार से वहीं उसकी रक्षा की गयी थी. इरावान भी अपने पिता अर्जुन की भांति रूपवान, बलवान, गुणवान और सत्य पराक्रमी था.</p>
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