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	<title>जानिए महत्व &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>जानिए महत्व &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>आइये जानते है किस दिन है गुड़ी पड़वा, जानिए महत्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Apr 2021 07:22:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="494" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />हर साल मनाया जाने वाला गुड़ी पड़वा का पर्व इस साल भी आने को है। इस दिन को हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है। आप सभी को बता दें कि चैत्र महीने की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहते हैं। जी दरअसल यह वह दिन है जब हिन्दु नववर्ष &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="494" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>हर साल मनाया जाने वाला गुड़ी पड़वा का पर्व इस साल भी आने को है। इस दिन को हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है। आप सभी को बता दें कि चैत्र महीने की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा या उगादि (युगादि) कहते हैं। जी दरअसल यह वह दिन है जब हिन्दु नववर्ष का आरम्भ होता है। आप सभी को बता दें कि ‘गुड़ी’ का अर्थ ‘विजय पताका’ होता है और कहा जाता है शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं (शक) का पराभव किया। इसी विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। वहीं ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘। इसके अलावा आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाते हैं। इसी दिन से चैत्र नवरात्र प्रारम्भ होती है। अब आइए बताते हैं गुड़ी पड़वा समय, तिथि और महत्व।</p>
<p><img decoding="async" class="size-full wp-image-433123 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg" alt="" width="740" height="592" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv.jpg 740w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/04/sxcfdfv-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 740px) 100vw, 740px" /></p>
<p><strong>गुड़ी पड़वा समय &#8211;</strong><br />
गुड़ी पड़वा मंगलवार, अप्रैल 13, 2021 को<br />
प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – अप्रैल 12, 2021 को 08:00 ए एम बजे<br />
प्रतिपदा तिथि समाप्त – अप्रैल 13, 2021 को 10:16 ए एम बजे</p>
<p><strong>गुड़ी पड़वा महत्व &#8211;</strong> कहा जाता है पौराणिक मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इस ब्रह्मांड का निर्माण किया था, इसलिए गुड़ी पड़वा के दिन, भगवान ब्रह्मा की पूजा, अर्चना की जाती हैं। ऐसा भी कहते हैं कि इस पर्व के दिन सारी बुराईयों का नाश हो जाता है और सुख समृद्धि का आगमन होता है।</p>
<p><strong>कैसे मनाते हैं गुड़ी पड़वा-</strong> यह पर्व महाराष्ट्र में मुख्यतः मनाया जाता है। यहाँ कई जुलूस आयोजित किए जाते हैं और लोग नए परिधानों पहनते हैं। इसी के साथ लोग इस दिन अपने परिवार मित्रों एवं रिश्तेदारों के साथ जश्न मनाते हैं। इस दिन लोग अपने घरों में विशेष तौर पर पारंपरिक व्यंजन जैसे पूरन पोली और श्रीखंड आदि बनाते हैं। केवल यही नहीं बल्कि इस दिन महाराष्ट्र में मीठे चावल भी बनाए जाते हैं इन चावलों को शक्कर भात कहा जाता है।</p>
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		<title>28 जनवरी को है पौष माह की पूर्णिमा, जानिए महत्व, मुहूर्त और व्रत विधि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jan 2021 03:45:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[28 जनवरी को है पौष माह की पूर्णिमा]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए महत्व]]></category>
		<category><![CDATA[मुहूर्त और व्रत विधि]]></category>
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					<description><![CDATA[पौष माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पौष पूर्णिमा कहते हैं। पौष पूर्णिमा को ही भगवती दुर्गा के शाकंभरी स्वरूप का अवतरण हुआ था। इसलिए इसे शाकंभरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस साल यह पूर्णिमा 28 जनवरी 2021 को है। पूर्णिमा तिथि 28 जनवरी गुरुवार को 1.18 मिनट पर रात को लगेगी। पूर्णिमा तिथि 29 जनवरी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>पौष माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पौष पूर्णिमा कहते हैं। पौष पूर्णिमा को ही भगवती दुर्गा के शाकंभरी स्वरूप का अवतरण हुआ था। इसलिए इसे शाकंभरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस साल यह पूर्णिमा 28 जनवरी 2021 को है।</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="740" height="592" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/01/TGHTGJ.jpg" alt="" class="wp-image-414833" /></figure>



<p><strong>पूर्णिमा तिथि 28 जनवरी गुरुवार को 1.18 मिनट पर रात को लगेगी।</strong></p>



<p><strong>पूर्णिमा तिथि 29 जनवरी को शुक्रवार की रात 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगी।<br></strong> पूर्णिमा के दिन स्नान-दान और सूर्य व चंद्र देव को जल देने से पुण्य लाभ मिलता है। पौष पूर्णिमा पर स्नान-दान से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन से कल्पवास भी शुरू हो जाता है। कल्पवासी पौष पूर्णिमा से एक-दो दिन पहले आ जाते हैं और संगम किनारे की तपस्या शुरू करते हैं। माघ मेले का दूसरा स्नान पौष पूर्णिमा पर होगा। कल्पवासी माघ मेले के सभी प्रमुख स्नानों पर स्नान-दान करते हैं। माघी पूर्णिमा के दिन कल्पवास का समापन होता है। कल्पवासी यहां जीवन-मृत्यु के बंधनों से मुक्ति की कामना लेकर यहां आते हैं।</p>



<p> <strong>पूर्णिमा तिथि व मुहूर्त-पूर्णिमा तिथि आरंभ- 28 जनवरी 2021 गुरुवार को 01 बजकर 18 मिनट से,  पूर्णिमा तिथि समाप्त- 29 जनवरी 2021 शुक्रवार की रात 12 बजकर 47 मिनट तक।</strong></p>



<p><strong>पौष पूर्णिमा व्रत महत्व-</strong> पौष पूर्णिमा के दिन जो व्यक्ति स्नान, दान और तप-व्रत करता है उसे पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पौष पूर्णिमा के दिन सूर्यदेव एवं चंद्रदेव की आराधना से दुख दूर होने की मान्यता है। पूर्णिमा तिथि चंद्रमा को समर्पित की जाती है। सुबह सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देना शुभ फलकारी माना जाता है, जबकि चंद्रोदय होने के बाद चंद्रमा की पूजा कर व्रत का पारण करना चाहिए। </p>



<p><strong>पौष पूर्णिमा व्रत विधि-</strong> 1. सबसे पहले स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें।2. विष्णु जी को भोग आदि लगाकर आरती करें।3. मंत्रोच्चारण करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य दें।4. पूरे दिन श्रीहरि के नाम का ध्यान लगाएं।5. रात को चंद्रमा निकलने के बाद धूप-दीप से पूजा करें और चंद्रमा को अर्घ्य दें। </p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>27 दिसंबर को साल का अंतिम प्रदोष व्रत, जानिए महत्व, विधि, मंत्र एवं मुहूर्त</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Dec 2020 05:32:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
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		<category><![CDATA[27 दिसंबर को साल का अंतिम प्रदोष व्रत]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए महत्व]]></category>
		<category><![CDATA[मंत्र एवं मुहूर्त]]></category>
		<category><![CDATA[विधि]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="405" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg 835w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-300x197.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-768x503.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />* 27 दिसंबर को इस साल का आखिरी प्रदोष व्रत, जानें व्रत और पूजा विधि  वर्ष 2020 में साल का अंतिम प्रदोष व्रत रविवार, 27 दिसंबर को है। इस दिन शुभ ज्योतिषीय रवियोग भी बन रहा है। रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने वाला हमेशा निरोगी रहता है। रविवार के दिन यह व्रत आने की वजह &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="405" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg 835w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-300x197.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-768x503.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p><strong>* 27 दिसंबर को इस साल का आखिरी प्रदोष व्रत, जानें व्रत और पूजा विधि</strong> </p>



<p>वर्ष 2020 में साल का अंतिम प्रदोष व्रत रविवार, 27 दिसंबर को है। इस दिन शुभ ज्योतिषीय रवियोग भी बन रहा है। रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को करने वाला हमेशा निरोगी रहता है। रविवार के दिन यह व्रत आने की वजह से इसे &#8216;रवि प्रदोष व्रत&#8217; भी कहा जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, प्रदोष व्रत प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को होता है। एक मास में यह व्रत दो बार आता है। हमारे शास्त्रों में प्रदोष व्रत की बड़ी महिमा है। रविवार को आने वाला यह प्रदोष व्रत स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसी दिन अनंग त्रयोदशी व्रत भी है। इस व्रत में पूजन सूर्यास्त के समय करने का महत्व है। यह व्रत करने वाले की स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां दूर होती हैं अत: स्वास्थ्य में सुधार होकर मनुष्य सुखपूर्वक जीवन-यापन करता है। यहां पाठको के लिए प्रस्तुत हैं रवि प्रदोष व्रत की पूजन विधि-</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="835" height="547" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg" alt="" class="wp-image-405952" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz.jpg 835w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-300x197.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/12/zasxz-768x503.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 835px) 100vw, 835px" /></figure>



<p><strong>जानिए पूजन विधि, मंत्र एवं मुहूर्त-कैसे करें व्रत :</strong> इस दिन प्रदोष व्रतार्थी को नमकरहित भोजन करना चाहिए। यद्यपि प्रदोष व्रत प्रत्येक त्रयोदशी को किया जाता है, परंतु विशेष कामना के लिए वार संयोगयुक्त प्रदोष का भी बड़ा महत्व है। अत: जो लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर हमेशा परेशान रहते हैं, किसी न किसी बीमारी से ग्रसित होते रहते हैं, उन्हें रवि प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिए। </p>



<p><strong>पूजन सामग्री :</strong> एक जल से भरा हुआ कलश, एक थाली (आरती के लिए), बेलपत्र, धतूरा, भांग, कपूर, सफेद पुष्प व माला, आंकड़े का फूल, सफेद मिठाई, सफेद चंदन, धूप, दीप, घी, सफेद वस्त्र, आम की लकड़ी, हवन सामग्री।</p>



<p> <strong>कैसे करें पूजन :</strong> रवि प्रदोष व्रत के दिन व्रतधारी को प्रात:काल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर शिव जी का पूजन करना चाहिए। प्रदोष वालों को इस पूरे दिन निराहार रहना चाहिए तथा दिनभर मन ही मन शिव का प्रिय मंत्र &#8216;ॐ नम: शिवाय&#8217; का जाप करना चाहिए। तत्पश्चात सूर्यास्त के पश्चात पुन: स्नान करके भगवान शिव का षोडषोपचार से पूजन करना चाहिए। रवि प्रदोष व्रत की पूजा का समय शाम 4.30 से शाम 7.00 बजे के बीच उत्तम रहता है, अत: इस समय पूजा की जानी चाहिए। नैवेद्य में जौ का सत्तू, घी एवं शकर का भोग लगाएं, तत्पश्चात आठों दिशाओं में 8&#x200d; दीपक रखकर प्रत्येक की स्थापना कर उन्हें 8 बार नमस्कार करें। इसके बाद नंदीश्वर (बछड़े) को जल एवं दूर्वा खिलाकर स्पर्श करें। शिव-पार्वती एवं नंदकेश्वर की प्रार्थना करें।</p>



<p><strong>मंत्र :</strong> &#8216;ॐ नम: शिवाय&#8217; अथवा शिव का विशेष मंत्र &#8211; &#8216;शिवाय नम:&#8217; का कम से कम 108 बार जप करें। </p>



<p><strong>प्रदोष व्रत पूजन के शुभ मुहूर्त<br>27 दिसंबर 2020, रविवार<br>रविवार के शुभ मुहूर्त- सुबह 05.22 मिनट से आरंभ होकर 06.54 मिनट पर समाप्त होगा।<br>सायंकालीन प्रदोष व्रत पूजा का शुभ समय- शाम 05.32 मिनट से आरंभ होकर 06.54 मिनट पर समाप्त होगा।<br></strong> </p>



<p>इस व्रत से मनुष्य की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं तथा मनुष्य निरोगी हो जाता है। ज्योतिष अनुसार व्रत को करने से जीवन की अनेक समस्याएं दूर की जा सकती हैं। यह व्रत करने वाले समस्त पापों से मुक्त भी होते हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>कब है जलझूलनी, पद्मा एकादशी, जानिए महत्व, पढ़ें पौराणिक कथा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Aug 2020 04:23:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[कब है जलझूलनी]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए महत्व]]></category>
		<category><![CDATA[पढ़ें पौराणिक कथा]]></category>
		<category><![CDATA[पद्मा एकादशी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-1024x768.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-1024x768.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-768x576.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />29 अगस्त 2020, शनिवार को परिवर्तिनी एकादशी व्रत मनाया जा रहा है। इस व्रत से वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है। आगे पढ़ें&#8230; युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="464" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-1024x768.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-1024x768.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-768x576.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb.jpg 1200w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><div>29 अगस्त 2020, शनिवार को परिवर्तिनी एकादशी व्रत मनाया जा रहा है। इस व्रत से वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है। आगे पढ़ें&#8230;</div>
<div></div>
<div>युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली, उत्तम वामन एकादशी का माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं तुम ध्यानपूर्वक सुनो।</div>
<div></div>
<div><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-367020 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb.jpg" alt="" width="1200" height="900" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb.jpg 1200w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-300x225.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-1024x768.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/08/decgbvdgb-768x576.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></div>
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<div>यह पद्मा/परिवर्तिनी एकादशी, जयंती और जलझूलनी एकादशी भी कहलाती है। इसका व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं। जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी (वामन रूप की) पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। अत: मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें।</div>
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<div>जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं।</div>
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<div>भगवान के वचन सुनकर युधिष्ठिर बोले कि भगवान! मुझे अतिसंदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं तथा किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं कीं? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। सो आप मुझसे विस्तार से बताइए।</div>
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<div>श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का श्रवण करें।</div>
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<div><strong>परिवर्तनी अथवा पद्मा एकादशी की कथा :- </strong>त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था, लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया।</div>
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<div>इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। अत: मैंने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया।</div>
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<div>इतनी वार्ता सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता?</div>
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<div>श्रीकृष्ण कहने लगे- मैंने (वामन रूपधारी ब्रह्मचारी) बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा- ये मुझको तीन लोक के समान है और हे राजन यह तुमको अवश्य ही देनी होगी।</div>
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<div>राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया।</div>
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<div>सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की। तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए। अब तीसरा पग कहां रखूं?</div>
<div></div>
<div>तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई।</div>
<div></div>
<div>इसी प्रकार दूसरी क्षीरसागर में शेषनाग के पष्ठ पर हुई! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए। जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पापनाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।</div>
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		<title>सावन के मंगलवार को जरुर करनी चाहिए वीर हनुमान जी की आराधना, जानिए महत्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Alpana Vaish]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Jul 2020 06:28:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जानिए महत्व]]></category>
		<category><![CDATA[सावन के मंगलवार को जरुर करनी चाहिए वीर हनुमान जी की आराधना]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH-300x249.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />श्रावण मास के मंगलवार का महत्व अधिक होता है क्योंकि इस दिन भगवान शिव की आर्धांगिनी मां गौरी के लिए मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। आपको सावन के मंगलवार को वीर हनुमान जी की भी आराधना करनी चाहिए। हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं। बजरंगबली की पूजा करने से भगवान शिव की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2020/07/GHNGFH-300x249.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>श्रावण मास के मंगलवार का महत्व अधिक होता है क्योंकि इस दिन भगवान शिव की आर्धांगिनी मां गौरी के लिए मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। आपको सावन के मंगलवार को वीर हनुमान जी की भी आराधना करनी चाहिए। हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं। बजरंगबली की पूजा करने से भगवान शिव की भी कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं कि सावन में हनुमान जी की पूजा कैसे करनी चाहिए।<a href="http://www.shreeayodhyajisss.com/wp-content/uploads/2020/07/FDSFDCSDSD.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-14777" src="http://www.shreeayodhyajisss.com/wp-content/uploads/2020/07/FDSFDCSDSD.jpg" alt="" width="650" height="540" /></a></p>
<p>सावन में हनुमान जी की पूजा करने से भक्तों को बजरंगबली, भगवान शिव की कृपा के साथ ही भगवान श्रीराम तथा माता सीता की भी कृपा प्राप्त होती है। जब भी आप हनुमान जी की पूजा करें, तो साथ में श्रीराम और माता सीता जी की भी आराधना करें। ऐसा करने से बजरंगबली प्रसन्न होते हैं क्योंकि प्रभु श्रीराम हनुमान जी के आराध्य हैं और सीता जी उनकी माता हैं।</p>
<p><strong>मंगलवार को हनुमान जी की पूजा विधि</strong></p>
<p>आज के दिन प्रात:काल स्नान आदि से निवृत होकर साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद हनुमान जी की पूजा का संकल्प लें। अब हनुमान जी, श्रीराम और भगवान शिव की तस्वीर या मूर्ति को स्थापित करें। सबसे पहले भगवान श्री राम की पूजा करें। उसके बाद हनुमान जी को पुष्प, अ​क्षत्, चंदन, धूप, दीप, बूंदी के लड्डू आदि अर्पित करें। उनको सिंदूर भी चढ़ा सकते हैं। फिर शिव जी को भांग, धतूरा, मदार, बेल पत्र, भस्म आदि ​अर्पित करें। इसके पश्चात हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, राम रक्षा स्तोत्र और सुंदरकांड का पाठ करें। अब अंत में हनुमान जी आरती करें। पूजा के अंत में हनुमान जी अर्पित किए गए फल, मिठाई आदि को प्रसाद स्वरूप परिजनों में बांट दें। अन्य वस्तुएं किसी ब्राह्मण को दान कर दें।</p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी की पूजा में ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना जरूरी होता है क्योंकि हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं। हनुमान जी की पूजा मुख्यत: मंगलवार और शनिवार को किया जाता है।</p>
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