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	<title>जादू की झप्पी &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>जादू की झप्पी की तरह है मेट्रो…इन दिनों कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jul 2025 12:01:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मनोरंजन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="311" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/8-large.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/8.png 760w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/8-medium.png 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />साल 2007 में आई अनुराग बासु निर्देशित फिल्&#x200d;म लाइफ इन ए मेट्रो में मेट्रो शहरों में अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों की कहानी दर्शायी गई थी। उसमें सच्&#x200d;चे प्&#x200d;यार की तलाश, लंबे वैवाहिक जीवन में पति पत्&#x200d;नी के रिश्&#x200d;तों में बढ़ती दूरी, विवाहेतर संबंध, रिश्&#x200d;तों में बेवफाई, पति की गलती को माफ कर दूसरा मौके &#8230;]]></description>
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<p>साल 2007 में आई अनुराग बासु निर्देशित फिल्&#x200d;म लाइफ इन ए मेट्रो में मेट्रो शहरों में अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों की कहानी दर्शायी गई थी। उसमें सच्&#x200d;चे प्&#x200d;यार की तलाश, लंबे वैवाहिक जीवन में पति पत्&#x200d;नी के रिश्&#x200d;तों में बढ़ती दूरी, विवाहेतर संबंध, रिश्&#x200d;तों में बेवफाई, पति की गलती को माफ कर दूसरा मौके देने जैसे मुद्दों को उठाया गया था। संगीत उसका अहम हिस्&#x200d;सा था। करीब 18 साल बाद अनुराग बासु मेट्रो… इन दिनों में डिजिटल युग में प्&#x200d;यार के प्रति बदलता नजरिया और जरूरत से ज़्यादा जानकारी ने किस प्रकार रिश्&#x200d;तों को प्रभावित किया है? जैसे मुद्दों को संबोधित करने की कोशिश की है।</p>



<p>इस बार मुंबई के अलावा बाकी मेट्रो शहर दिल्&#x200d;ली, बेंगलूर, कोलकाता और पुणे को भी एक्&#x200d;सप्&#x200d;लोर किया गया है। भले ही इसे सीक्&#x200d;वल फिल्&#x200d;म के तौर पर प्रचारित नहीं किया गया है, लेकिन यह मूल फिल्&#x200d;म की याद दिला जाती है। इस बार पात्रों की संख्&#x200d;या बढ़ी है तो फिल्&#x200d;म की अवधि भी।</p>



<p><strong>पात्रों के जरिए खंगाले अलग-अलग पहलू</strong><br>कहानी कोलकाता में रहने वाली शिवानी (नीना गुप्&#x200d;ता) और संजीव (शाश्&#x200d;वत चटर्जी) की दो बेटियों और उनसे जुड़े लोगों के आसपास की है। बड़ी बेटी काजोल (कोंकणा सेन शर्मा) की पति मांटी (पंकज त्रिपाठी) के साथ शादी को 19 साल हो चुके हैं। बाहर से उनकी जिंदगी परफेक्&#x200d;ट दिखती है पर है नहीं। उनकी 15 साल की बेटी की अपनी दुविधा है। काजोल की छोटी बहन चुमकी (सारा अली खान) यूं तो एचआर कंसल्&#x200d;टेंट है, लेकिन दब्&#x200d;बू मिजाज की है। आते जाते उसका अधेड़ उम्र का बास यहां वहां छूता है। गुस्&#x200d;सा आने के बावजूद वह बर्दाश्&#x200d;त करती है। चुमकी अपने सहकर्मी से प्यार करती है और जल्&#x200d;द ही दोनों की मंगनी होने वाली है।</p>



<p>एक नाटकीय घटनाक्रम में उसकी मुलाकात ट्रैवल ब्&#x200d;लागर पार्थ (आदित्&#x200d;य राय कपूर) से होती है। दोनों के बीच मेलजोल बढ़ता है। बिंदास पार्थ का दोस्&#x200d;त आकाश (अली फजल) म्&#x200d;यूजीशियन बनना चाहता है, लेकिन श्रुति (फातिमा सना शेख) से शादी और पारिवारिक जिम्&#x200d;मेदारियों के चलते उसके सपने पीछे छूट गए हैं। उधर, शिवानी के भी शादी से पहले सपने थे, लेकिन पारिवारिक जिम्&#x200d;मेदारियों में दबकर रह गए। कॉलेज की रीयूनियन पार्टी में वह अपने पूर्व प्रेमी परिमल (अनुपम खेर) से मिलती है। इन पात्रों के जरिए रिश्&#x200d;तों के अलग-अलग पहलू खंगाले गए हैं।</p>



<p><strong>कहां कमजोर पड़ी कहानी?</strong><br>ढेर सारे पात्रों के साथ कहानी कहने में महारत रखने वाले अनुराग बासु कहानी पर अपनी पकड़ कायम रखते हैं। भले ही इसे सीक्&#x200d;वल फिल्&#x200d;म के तौर पर प्रचारित नहीं किया गया है, लेकिन यह कहीं-कहीं मूल फिल्&#x200d;म की याद दिला जाती है। जैसे पार्थ का चुमकी को अपने अंदर के गुबार को निकालने के लिए चिल्&#x200d;लाने को कहना। मूल फिल्&#x200d;म में यह काम इरफान और कोंकणा करते हैं। मूल फिल्&#x200d;म में इरफान का पात्र लड़कियों को घूरता था। इस बार कुछ वैसा ही अंदाज पंकज त्रिपाठी के पात्र का है। फिल्&#x200d;म की अवधि भी ज्&#x200d;यादा है। बहरहाल, तमाम पात्र और उनकी जटिताओं के बावजूद अनुराग ने फिल्&#x200d;म को इंटेंस नहीं बनने दिया है।</p>



<p>बीच-बीच में प्रीतम, पापोन और राघव चैतन्य अपने संगीत के माध्यम से कहानी के प्रवाह को बढ़ाते हैं, इसलिए गानों की अधिकता है। शुरुआती में रोचक तरीके से पात्रों को स्&#x200d;थापित किया गया है। मध्&#x200d;यांतर के बाद कहानी थोड़ा खिंची हुई लगती है। काजोल और शिवानी से जुड़े प्रसंग को गहराई से छूने की जरूरत थी। श्रुति का झुकाव सहकर्मी की तरफ होता है, लेकिन बाद में उस पर बात नहीं होती।</p>



<p><strong>कलाकारों ने कितनी निभाई अपनी ड्यूटी?</strong><br>फिल्&#x200d;म में मंझे हुए कलाकार हैं। अनुराग बासु को उनका पूरा सहयोग मिला है। पति पत्&#x200d;नी की भूमिका में पंकज त्रिपाठी और कोंकणा सेन शर्मा की केमिस्&#x200d;ट्री शानदार है। दोनों ने अपने पात्रों को बेहतरीन तरीके से जिया है। सारा अली पात्र के अनुरूप दब्&#x200d;बू नहीं लगी है। उनके पात्र से ज्&#x200d;यादा जुड़ाव नहीं महसूस होगा। आदित्&#x200d;य राय कपूर का किरदार बिंदास है। वह उसे खुले दिल से आत्&#x200d;मसात करते दिखते हैं। अली फजल ने संघर्षरत गायक और निजी रिश्&#x200d;तों में बढ़ती दूरी के दर्द को सहजता से आत्&#x200d;मसात किया है।</p>



<p>वहीं श्रुति के मनोभावों को फातिमा सना शेख ने खूबसूरती से दर्शाया है। नीना गुप्&#x200d;ता और अनुपम खेर का काम शानदार है। एक दृश्&#x200d;य में अनुपम भावुक कर जाते हैं। शाश्&#x200d;वत चटर्ची संक्षिप्&#x200d;त भूमिका में याद रह जाते हैं। प्रीतम का संगीतबद्ध अहसास हो या न हो गाना… कर्णप्रिय है। अनुराग बासु और अभिषेक बासु की सिनेमेटोग्राफी उल्&#x200d;लेखनीय है। कई विजुअल्&#x200d;स शानदार हैं।</p>



<p>अगर जिंदगी से रोमांस खो रहा है, प्रेम को लेकर उलझन में हैं तो फिल्&#x200d;म से कुछ सुझाव पा सकते हैं।</p>
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