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	<title>जब पाक की टैंक रेजिमेंट के सामने दीवार बन गए थे भारतीय सेना के 120 जवान &#8211; Live Halchal</title>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="जब पाक की टैंक रेजिमेंट के सामने दीवार बन गए थे भारतीय सेना के 120 जवान" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />नई दिल्‍ली। पांच दिसंबर की तारीख यूं तो हर साल आती है लेकिन इस तारीख के बेहद खास मायने हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि 5 दिसंबर की रात में राजस्‍थान में पाकिस्‍तान से लगती सीमा और लोंगेवाल पोस्‍ट पर वो हुआ था जिसकी कल्‍पना तक नहीं की जा सकती है। यह महज एक कहानी नहीं &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="513" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="जब पाक की टैंक रेजिमेंट के सामने दीवार बन गए थे भारतीय सेना के 120 जवान" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p><strong>नई दिल्&#x200d;ली। पांच दिसंबर की तारीख यूं तो हर साल आती है लेकिन इस तारीख के बेहद खास मायने हैं। ऐसा इसलिए है क्&#x200d;योंकि 5 दिसंबर की रात में राजस्&#x200d;थान में पाकिस्&#x200d;तान से लगती सीमा और लोंगेवाल पोस्&#x200d;ट पर वो हुआ था जिसकी कल्&#x200d;पना तक नहीं की जा सकती है। यह महज एक कहानी नहीं बल्कि भारतीय फौज के जांबाज जवानों के पराक्रम की शौर्यगाथा है। आपको बता दें कि 1971 के दिसंबर माह में भारत पाकिस्&#x200d;तान के साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा था।<img decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-96471" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg" alt="जब पाक की टैंक रेजिमेंट के सामने दीवार बन गए थे भारतीय सेना के 120 जवान" width="650" height="540" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान.jpg 650w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2017/12/जब-पाक-की-टैंक-रेजिमेंट-के-सामने-दीवार-बन-गए-थे-भारतीय-सेना-के-120-जवान-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /> </strong></p>
<p><strong>समुद्र में पाकिस्&#x200d;तान को हराने के लिए भारत ने ऑपरेशन ट्राइडेंट चलाया था तो वहीं पूर्व में बांग्&#x200d;लादेश फ्रंट पर भी भारत पाकिस्&#x200d;तान के साथ दो-दो हाथ कर रहा था। इसके अलावा चीन की तरफ से भी लगातार माहौल तनावपूर्ण हो रहा था। कश्&#x200d;मीर में भी पाकिस्&#x200d;तान के सामने भारतीय फौज दो-दो हाथ कर रही थी। इसी दौरान पाकिस्&#x200d;तान ने राजस्&#x200d;थान में हमले कर जैसलमेर पर कब्&#x200d;जा करने के लिए अपनी पूरी टैंक रेजिमेंट को लोंगेवाल पोस्&#x200d;ट की तरफ रवाना कर दिया था।</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>धीरे धीरे नजदीक आ रहे पाक टैंक</strong></span></h3>
<p><strong>इसकी जानकारी पोस्&#x200d;ट पर तैनात 23वीं पंजाब बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को 4-5 दिसंबर की रात को उनके जवानों से लगी थी। इन जवानों ने बॉर्डर पार टैंकों की आवाज सुनी थी जो धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। फिर यह बॉर्डर के एकदम करीब आ गए जिसको यह जवान साफतौर पर देख सुन पा रहे थे। पाकिस्&#x200d;तान की तरफ से आ रही 22 कैवलरी इंफैंटरी बटालियन में चीनी निर्मित टी 35 और अमेरिकन शर्मन टैंक शामिल थे। हम आपको बता दें कि लोंगेवाल पोस्&#x200d;ट भारत-पाक सीमा पर करीब 18 किमी का दायरा है।</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>पोस्&#x200d;ट छोड़ने का मिला था हुक्&#x200d;म</strong></span></h3>
<p><strong>मेजर कुलदीप सिंह को अपने अधिकारियों से पोस्&#x200d;ट को खाली करने का हुक्&#x200d;म दिया गया था, जिसको मानने से उन्&#x200d;होंने इंकार कर दिया था। इसके अलावा उनकी पूरी टीम ने भी पोस्&#x200d;ट छोड़कर जाने से बेहतर दुश्&#x200d;मन को टक्&#x200d;कर देने का फैसला किया था। मेजर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि जहां उनके सामने पाकिस्&#x200d;तान की पूरी टैंक रेजिमेंट थी वहीं उनके पास महज 120 जवान थे, जिनके पास कुछ स्&#x200d;वचालित मशीनगनें, आरसीएल जीप के ऊपर लगाई गई 106 एमएम की रिकोइल्&#x200d;लस राइफल्&#x200d;स, हैंड ग्रेनेड और राइफल्&#x200d;स थी। एक पूरी टैंक रेजिमेंट के सामने यह सभी कुछ बेहद छोटी और कमतर थीं। यह भारतीय जवानों का साहस ही था कि उन्&#x200d;होंने अपने साहम के दम पर पूरी टैंक रेजिमेंट को भागने पर मजबूर कर दिया था। इस लड़ाई में जीत हासिल करने पर मेजर कुलदीप सिंह को महावीर चक्र से नवाजा गया था। इसके अलावा उनकी टुकड़ी को छह और गैलेंट्री अवार्ड से नवाजा गया था। चांदपुरी की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्&#x200d;मन के करीब 12 टैंकों को नष्&#x200d;ट कर दिया था। पाकिस्&#x200d;तान की रेजिमेंट में करीब 59 टैंक थे जिनमें से केवल आठ को ही वह अपने साथ सही सलामत वापस ले जा सके थे।</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>पूरी रात दुश्&#x200d;मन को रोककर रखा</strong></span></h3>
<p><strong>लोंगेवाला पोस्&#x200d;ट की लड़ाई को याद करते हुए उन्&#x200d;होंने कहा कि टी 35 टैंकों के साथ आये पाकिस्तान के सैकडों जवानों को रोककर रखने और लोंगेवाला से आगे नहीं बढ़ने देने में मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर लडे़ जवानों की सर्वाधिक प्रशंसनीय भूमिका रही। मौत सामने देखकर भी पांव पीछे नहीं खींचने वाले इन जवानों की बहादुरी की वजह से ही दुश्मन को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि एक सैनिक के तौर पर मैं उन जवानों को ही इस जीत का श्रेय देना चाहूंगा। उन्होंने बताया कि उन्हें और सारे जवानों को लोंगेवाला पोस्ट पर स्थित देवी के एक छोटे से मंदिर पर पूरा भरोसा रहा है, जहां वे रोज प्रसाद चढ़ाते थे और रात को देसी घी का दीया जलाते थे। फिल्मकार जे पी दत्ता की 1997 में आई हिट फिल्म &#8216;बार्डर&#8217; लोंगेवाला की लड़ाई पर ही बनी थी जिसमें सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार अदा किया था।</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>चुनौती से भरी थी रात</strong></span></h3>
<p><strong>इस लड़ाई में इस टुकड़ी का साथ भारतीय एयरफोर्स के हंटर विमानों ने भी दिया था। इनके साथ में समस्&#x200d;&#x200d;या यह थी कि ये विमान रात में उड़ान भरने में सक्षम नहीं थे। लिहाजा लड़ाई के मैदान पर जाने के लिए लोंगोवाल की पोस्&#x200d;ट पर जमे भारतीय सैनिकों को पूरी रात दुश्&#x200d;मन से लोहा लेना था। ऐसा उन्&#x200d;होंने किया भी। सुबह होते ही भारतीय वायुसेना के विमानों ने दुश्&#x200d;मन के टैंकों पर कहर बरपा दिया। उस वक्&#x200d;त पाकिस्&#x200d;तान के जवानों के उस मैसेज को भी वायरलैस पर साफ सुना गया जिसमें कहा गया था कि भारत के जहाज हम पर कहर बरपा रहे हैं हमारे आधे से जयादा टैंक बर्बाद हो गए हैं।</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>भारतीय वायुसेना को सलाम</strong></span></h3>
<p><strong>उन्होंने बताया कि &#8216;हमारे पास टैंक नहीं थे, हम चारों तरफ से घिरे थे। उस पर भी रेत के गुबार चुनौती पैदा करने वाले थे। सर्द रात भयावह लंबी लग रही थी। हम दिन चढ़ने की प्रार्थना कर रहे थे ताकि वायु सेना के विमान आ सकें।&#8217; अंतत: वायुसेना के लडाकू विमानों ने आकर दुश्मन के कई टैंकों को तबाह कर दिया और लोंगेवाला के रास्ते राजस्थान के अंदर तक आने और यहां बडे़ हिस्से पर कब्जा करने की पड़ोसी देश की साजिश नाकाम हो गयी। मेजर चांदपुरी ने कहा, &#8216;भारतीय वायुसेना को मेरा सलाम। उनकी अपनी समस्याएं और सी​माएं थीं लेकिन उनके आते ही पाकिस्तान के टैंक तबाह हो गये।&#8217;</strong></p>
<h3><span style="color: #ff0000;"><strong>इसलिए भी खास थी यह लड़ाई</strong></span></h3>
<p><strong>5-6 दिसंबर की रात लड़ी गई यह लड़ाई इसलिए भी बेहद खास थी क्&#x200d;योंकि दुश्&#x200d;मन का इरादा न सिर्फ जैलसमेर जीतना था बल्कि वह जोधपुर और फिर दिल्&#x200d;ली पर कब्&#x200d;जा करना चाहता था। ऐसे में यदि इस पोस्&#x200d;ट को छोड़कर भारतीय फौज पीछे हट जाती तो दुश्&#x200d;मन के लिए आगे बढ़ने का रास्&#x200d;ता पूरी तरह से साफ हो जाता। इस जीत के नायक रहे मेजर और बाद में ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए कुलदीप सिंह चांदपुरी इसका श्रेय उन जवानों को देते हैं जो उस रात एक मजबूत दीवार की तरह दुश्&#x200d;मन के सामने डटे रहे। </strong></p>
<p><strong>उनका कहना है कि वह आज भी सरहद पर दुश्&#x200d;मन से लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। रिटायर होने के बाद मेजर चांदपुरी चंडीगढ़ में रहते हैं। वह बताते हैं कि उन्हें जब भी सेना के अधिकारी किसी भी कार्यक्रम के लिए बुलाते हैं तो वह अवश्य जाते हैं चाहे सेहत साथ ना भी दे रही हो। उनका यह भी कहना है कि जब तक वह जिंदा हैं, देश के लिए हैं। सेना जब-जब बुलाएगी वह लोंगेवाला जाते रहेंगे। यदि आज भी सरकार उन्&#x200d;हें सरहद पर बुलाना चाहे तो वह इसके लिए भी तैयार हैं। इसमें ही उनकी पूरी जिंदगी बी&#x200d;ती है तो फिर डरना कैसा। वह दुश्&#x200d;मन से लड़ने को हमेशा तैयार हैं।</strong></p>
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