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	<title>जब इस जज ने अपने पिता के निर्णय को पलटा &#8211; Live Halchal</title>
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		<dc:creator><![CDATA[somali sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Sep 2018 11:41:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="496" height="252" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg 496w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e-300x152.jpg 300w" sizes="(max-width: 496px) 100vw, 496px" />व्&#x200d;यभिचार के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्&#x200d;यीय संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए इससे संबंधित 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया. पांच सदस्&#x200d;यीय बेंच में जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ भी शामिल थे. हालांकि 1985 में जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने इस सेक्&#x200d;शन को संवैधानिक करार &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="496" height="252" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg 496w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e-300x152.jpg 300w" sizes="(max-width: 496px) 100vw, 496px" /><p><strong>व्&#x200d;यभिचार के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्&#x200d;यीय संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए इससे संबंधित 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया. पांच सदस्&#x200d;यीय बेंच में जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ भी शामिल थे. हालांकि 1985 में जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने इस सेक्&#x200d;शन को संवैधानिक करार दिया था. उल्&#x200d;लेखनीय है कि जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ सबसे लंबे समय तक देश के चीफ जस्टिस रहे.<img decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-164477" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg" alt="" width="496" height="252" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e.jpg 496w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2018/09/3d434201d2bd2977ad51266a2485c52e-300x152.jpg 300w" sizes="(max-width: 496px) 100vw, 496px" /></strong></p>
<p><strong>भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक</strong><br />
<strong>व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को ‘‘पतियों की संपत्ति’’ बना दिया था.</strong></p>
<p><strong>प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया. शीर्ष अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार तथा महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया.</strong></p>
<p><strong>प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने एकमत से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है. संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया. यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरूष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गयी थी. व्यभिचार को प्राचीन अवशेष करार देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव जीवन के सम्मानजनक अस्तित्व के लिए स्वायत्ता स्वभाविक है और धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है.</strong></p>
<p><strong>व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए</strong><br />
<strong>चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में कहा कि व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए लेकिन इसे अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा और इसे विवाह खत्म करने तथा तलाक लेने का आधार माना जाएगा. घरों को तोड़ने के लिये कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता. भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरुष यह जानते हुये भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह परस्त्रीगमन के अपराध का दोषी होगा. यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आयेगा. इस अपराध के लिये पुरुष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था.</strong></p>
<p><strong>शाइन की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 497 का प्रावधान पुरुषों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समता के अधिकार) , 15 (धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहीं) और अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन होता है.</strong></p>
<p><strong>न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने अपने फैसले में कहा, ‘‘विवाह के खिलाफ अपराध से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 198 को हम असंवैधानिक घोषित करते हैं.’’ न्यायमूर्ति नरिमन ने धारा 497 को पुरातनकालीन बताते हुए प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति खानविलकर के फैसले से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि दंडात्मक प्रावधान समानता का अधिकार और महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन है.</strong></p>
<p><strong>वहीं न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 महिला के सम्मान को नष्ट करती है और महिलाओं को गरिमा से वंचित करती है. पीठ में शामिल एकमात्र महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा ने अपने फैसले में कहा कि धारा 497 संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इस प्रावधान को बनाए रखने के पक्ष में कोई तर्क नहीं है.</strong></p>
<p><strong>अपनी और न्यायमूर्ति खानविलकर की ओर से फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश मिश्रा ने कहा कि व्यभिचार महिला की व्यक्तिकता को ठेस पहुंचाती है और व्यभिचार चीन, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपराध नहीं है. उन्होंने कहा, संभव है कि व्यभिचार खराब शादी का कारण नहीं हो, बल्कि संभव है कि शादी में असंतोष होने का नतीजा हो.</strong></p>
<p><strong>न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि महिला के साथ असमान व्यवहार संविधान के कोप को आमंत्रित करता है. उन्होंने कहा कि समानता संविधान का शासकीय मानदंड है. संविधान पीठ ने कहा कि संविधान की खूबसूरती यह है कि उसमें ‘‘मैं, मेरा और तुम’’ शामिल हैं.</strong></p>
<p><strong>पति महिला का स्वामी नहीं है</strong><br />
<strong>शीर्ष अदालत ने कहा कि महिलाओं के साथ असमानता पूर्ण व्यवहार करने वाला कोई भी प्रावधान संवैधानिक नहीं है और अब यह कहने का वक्त आ गया है कि ‘पति महिला का स्वामी नहीं है.’ प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि धारा 497 जिस प्रकार महिलाओं के साथ व्यवहार करता है, यह स्पष्ट रूप से मनमाना है. उन्होंने कहा कि ऐसा कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं हो सकता है जो घर को बर्बाद करे परंतु व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए.</strong></p>
<p><strong>न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने कहा कि धारा 497 को असंवैधानिक घोषित किया जाये क्योंकि व्यभिचार स्पष्ट रूप से मनमाना है. पीठ ने कहा कि व्यभिचार को विवाह विच्छेद के लिये दीवानी स्वरूप का गलत कृत्य माना जा सकता है.</strong></p>
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