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	<title>गुप्त नवरात्रि में माँ भगवती के काली रूप की उपासना की जाती है : धर्म &#8211; Live Halchal</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Feb 2021 10:52:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[माघ का महीना हिंदू धर्म में काफी पवित्र और पूजा पाठ के लिए उत्तम माना गया है. इसी माह में गुप्त नवरात्रि भी आती है. गुप्त नवरात्रि के दौरान भगवती के काली रूप की उपासना की जाती है. गुप्त नवरात्रि भी साल में दो बार आती है एक माघ मास के शुक्ल पक्ष में और &#8230;]]></description>
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<p>माघ का महीना हिंदू धर्म में काफी पवित्र और पूजा पाठ के लिए उत्तम माना गया है. इसी माह में गुप्त नवरात्रि भी आती है. गुप्त नवरात्रि के दौरान भगवती के काली रूप की उपासना की जाती है. गुप्त नवरात्रि भी साल में दो बार आती है एक माघ मास के शुक्ल पक्ष में और दूसरी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में. माघ मास की नवरात्रि इस बार 12 फरवरी से शुरू हो रही है और 21 फरवरी को समाप्त होगी. जानिए गुप्त नवरात्रि से जुड़ी खास बातें.</p>



<p></p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2021/02/12_43_178656596maa-kali.jpg" alt="" class="wp-image-417405" width="646" height="644"/></figure>



<p>आमतौर पर गृहस्थ परिवार के लोग गुप्त नवरात्रि का व्रत नहीं रखते. वे चैत्र और शारदीय नवरात्रि में माता की उपासना करते हैं. गुप्त नवरात्रि विशेष सिद्धियों को प्राप्त करने वाली नवरात्रि होती है. इसमें भगवती के काली स्वरूप के साथ दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है. तांत्रिक विशेष रूप से इस नवरात्रि में साधना करते हैं. गुप्त नवरात्रि के दौरान की जाने वाली पूजा, मंत्र, पाठ और प्रसाद सभी चीजों को गुप्त रखा जाता है, तभी साधना फलित होती है. साधना के दौरान मां भगवती के साधक कड़े नियमों का पालन करते हैं.</p>



<p>मां कालिके<br>तारा देवी<br>त्रिपुर सुंदरी<br>भुवनेश्वरी<br>माता चित्रमस्ता<br>त्रिपुर भैरवी<br>मां धूम्रवती<br>माता बगलामुखी<br>मातंगी<br>कमला देवी</p>



<p><strong>कलश स्थापना का शुभ समय :</strong>&nbsp;सुबह 08 बजकर 34 मिनट से 09 बजकर 59 मिनट तक.</p>



<p><strong>अभिजीत मुहूर्त :</strong> दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 58 मिनट तक.</p>



<p>पूजा के लिए सबसे पहले कलश स्थापना करने का विधान है. जिससे मां दुर्गा का पूजन बिना किसी विध्न के कुशलता पूर्वक संपन्न हो सके. मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित करें. पूजा स्थान की उत्तर-पूर्व दिशा में जमीन पर सात तरह के अनाज, पवित्र नदी की रेत और जौं डालें. कलश में गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, मौली, अक्षत, हल्दी, सिक्का और पुष्प डालें.</p>



<p>आम के पत्ते कलश के ऊपर सजाएं फिर ऊपर से जौ अथवा कच्चे चावल कटोरी में भरकर कलश के ऊपर रखें. उसके बीच नए लाल कपड़े से लिपटा हुआ पानी वाला नारियल अपने मस्तक से लगा कर प्रणाम करते हुए रेत पर कलश विराजित करें. इसके बाद नौ दिनों तक के लिए अखंड दीपक जलाएं. साथ ही माता के विशेष मंत्र, पाठ वगैरह गुप्त रूप से पढ़कर साधना करें. ज्यादातर अघोरी और तांत्रिक गुप्त नवरात्रि के दौरान आधी रात में माता की पूजा करते हैं.</p>
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