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	<title>कैलास मानसरोवर यात्रा &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>कैलास मानसरोवर यात्रा: एक ऐसा तीर्थ जहां हर कदम पर होता है शिव से संवाद का अनुभव</title>
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		<pubDate>Sun, 27 Jul 2025 11:52:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पर्यटन]]></category>
		<category><![CDATA[कैलास मानसरोवर यात्रा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="341" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/6-24-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/6-24.jpg 842w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/6-24-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/07/6-24-768x424.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />धार्मिक पर्यटन नहीं बल्कि आत्मा को गहराई से छूने वाला अविस्मरणीय अनुभव है। दुर्गम पहाड़ी रास्ते लगातार बदलते मौसम और अप्रत्याशित चुनौतियों से भरी यह ऐसी यात्रा है जो आपको शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर चुनौती देती है और अंत में अद्वितीय शांति और आध्यात्मिक तृप्ति से भर देती है। हजारों वर्षों से वैदिक &#8230;]]></description>
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<p>धार्मिक पर्यटन नहीं बल्कि आत्मा को गहराई से छूने वाला अविस्मरणीय अनुभव है। दुर्गम पहाड़ी रास्ते लगातार बदलते मौसम और अप्रत्याशित चुनौतियों से भरी यह ऐसी यात्रा है जो आपको शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर चुनौती देती है और अंत में अद्वितीय शांति और आध्यात्मिक तृप्ति से भर देती है।</p>



<p>हजारों वर्षों से वैदिक सनातनधर्मी, जैन व बौद्ध मतावलंबी दुनिया की सबसे प्राचीन और दुर्गम Kailash Mansarovar Yatra करते आए हैं। इस यात्रा का उल्लेख महाभारत में भी है। प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव का निर्वाण स्थल यहीं अष्टपाद नामक स्थान पर है, जो कैलास पर्वत के पादप बिंदु पर है। स्वामिनारायण संप्रदाय के संस्थापक नीलकंठ वर्णी फरवरी 1793 में कैलास यात्रा पर आए थे। गुरु नानक भी इस यात्रा पर गए थे। लेह के पास गुरु नानक की यात्रा से जुड़ा गुरुद्वारा पत्थर साहेब भारतीय सेना की देखरेख में है।</p>



<p>एक समय था जब कैलास यात्रा पर जाने वाले अपना श्राद्ध-तर्पण करके जाते थे क्योंकि ऐसा विश्वास नहीं होता था कि लौटकर आएंगे। मराठी में तो इसी कारण स्वर्गवासी के लिए ‘कैलासवासी’ शब्द प्रयुक्त होता है। 1962 के चीनी आक्रमण से पूर्व भारत से कैलास यात्रा हेतु 10 से अधिक मार्ग थे- यथा लेह से देमछोक होते हुए, हिमाचल में शिपकी ला से, बद्रीनाथ से आगे वसुधारा होते हुए, मुंश्यारी से मिलम ग्लेशियर मार्ग से और धारचूला- लिपु लेख मार्ग तथा सिक्किम से नाथू ला होते हुए।</p>



<p>1962 के युद्ध के बाद चीन द्वारा भारतीय मार्गों से यात्रा बंद कर दी गई, जो अटल जी के प्रयासों से 1981 में पुनः प्रारंभ हुई, जो वर्तमान दशक में गलवान में चीनी हमले के बाद दो वर्ष तक बंद रही और इस वर्ष फिर से शुरू हुई। हजारों वर्ष से अधिक समय से चल रही यात्रा एक ‘अमित्र’ देश के नियंत्रण में है- जिसने अब पहली बार मानसरोवर में स्नान प्रतिबंधित कर दिया है (प्रदूषण रोकने के नाम पर) और वहां का केवल 10 लीटर जल लाने की अनुमति दी है। यह ऐसे ही है जैसे प्रदूषण के नाम पर हरिद्वार अथवा प्रयाग संगम में स्नान प्रतिबंधित कर दिया जाए।</p>



<p><strong>हर ग्रंथ में मिलता उल्लेख<br></strong>मानसरोवर का वर्णन हमारे आदिग्रंथों में मिलता है। रामायण, महाभारत, सभी पुराणों- विशेषकर स्कंदपुराण में इसका सुंदर वर्णन है। बाणभट्ट की कादंबरी, कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभवम्, संस्कृत और पालि के बौद्ध ग्रंथों में भी इसका सुंदर वर्णन है। बौद्ध ग्रंथों में इसे अनोतत्त या अनवतप्त, जो ऊष्मा और कष्ट से परे है, कहा गया है। जैन ग्रंथों में इसे पद्मसर कहा गया है। इसके उत्तर में कैलास, दक्षिण में गुरला मांधाता, पश्चिम में राक्षस ताल है।</p>



<p>मानसरोवर की लहरें काफी तेज होती हैं पर पानी इतना निर्मल है कि तल के पत्थर साफ चमकते हैं। प्रसिद्ध संन्यासी वैज्ञानिक स्वामी प्रणवानंद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद की सहायता से 21 बार कैलास यात्रा पर गए, विशेष नौका के माध्यम से मानसरोवर की गहराई मापी व सिद्ध किया कि गंगा का उद्गम भी मानसरोवर में है और उसकी अंतर्धारा गौमुख में निकलती है।</p>



<p>यह यात्रा अनिर्वचनीय, शब्दातीत है- हिंदू कई वर्षों तक इस यात्रा के लिए प्रतीक्षा करते हैं। कैलास मानसरोवर संसार का सबसे बड़ा जलोद्गम क्षेत्र है- यहां से सतलज, करनाली, सिंधु, मेकांग (गंगा का पूर्वी एशियाई अपभ्रंश), ब्रह्मपुत्र निकलती हैं। खनिजों व औषधीय जड़ी-बूटियों का यह अपरिमित भंडार है। भयंकर शीतकाल (दिसंबर से मार्च) में वैदिक संन्यासी बर्फ ढके मानसरोवर पर चलते और एक वस्त्र में ही वहां साधना करते देखे गए हैं। नेपाल मार्ग से भी बड़ी संख्या में यात्री जाते हैं और अब चीन ने मानसरोवर के निकट गुंसा हवाई अड्डा बना दिया हैं, जिस ओर से बीजिंग- ल्हासा होते हुए अनेक यात्री विदेश से आते हैं।</p>



<p><strong>लाटरी में लिखा अविस्मरणीय अवसर<br></strong>लिपुलेख मार्ग (कुल 27 दिन) से प्रत्येक यात्री को प्रायः 200 किलोमीटर और नाथू ला मार्ग (कुल 12 दिन की यात्रा) से 35 किलोमीटर पैदल ट्रेकिंग करनी पड़ती है- मध्य मार्ग में भी यात्रियों की स्वास्थ्य जांच होती है और कई बार अस्वस्थ पाए गए यात्री बीच से ही वापस भेज दिए जाते हैं। हर वर्ष मई में विदेश मंत्रालय को आवेदन दिए जाते हैं- लाटरी से नाम चयन प्रक्रिया होती है।</p>



<p>फिर दिल्ली में आइटीबीपी द्वारा स्वास्थ्य जांच सही होने पर ही आवेदन स्वीकार होते हैं। दोनों मार्गों से केवल 750 यात्रियों को जाने की अनुमति मिल पाती है- 250 उत्तराखंड से और शेष 500 नाथु ला मार्ग से। अनेक वर्षों से विदेश मंत्रालय में उप सचिव शफी उल रबी इस यात्रा के प्रभारी सूत्रधार हैं। जब मैं पहली बार 1992 में गया था तो कुल 25,000 रुपये (चीनी वीजा एवं व्यवस्था शुल्क सहित) खर्च हुए थे, जो अब बढ़कर ढाई से तीन लाख रुपये प्रति यात्री हो गए हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु जैसे कुछ राज्य अपने राज्य के कैलास यात्रियों को अनुदान भी देते हैं। दिल्ली सरकार द्वारा आवेदक यात्रियों के दिल्ली प्रवास में आवास की सुविधा दी जाती है (इसे अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में तत्कालीन मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा द्वारा प्रारंभ करवाया गया था)।</p>



<p><strong>शिव की कृपा से पूरी होती यात्रा<br></strong>कैलास पर्वत के दर्शनों तक पहुंचना स्वप्नवत ही प्रतीत होता है। आज तक किसी भी राज्य सत्ता ने कैलास पर्वत पर, धार्मिक श्रद्धा के सम्मान स्वरूप आरोहण की अनुमति नहीं दी है। तिब्बती बौद्ध तो श्रद्धा की साक्षात प्रतिमूर्ति होते हैं जो कैलास और मानसरोवर की दंडवत परिक्रमा करते हैं। इस अत्यंत दुरूह परिक्रमा के लिए भोलेनाथ कृपा करते हैं। डोलमा ला दर्रे की चढ़ाई सागरमाथा से कम नहीं लगती है। इसी पर्वत शिखर पर तारा देवी का अत्युच्च तांत्रिक अनुष्ठान भी होता है। यहीं से आगे गौरी कुंड के दिव्य दर्शन होते हैं। कैलास परिक्रमा से वापस मानसरोवर-तारचेन की ओर आते हुए मार्ग में तिब्बत के महान योगी मिलारेपा की गुफा भी आती है परंतु वहां जाने की अनुमति नहीं। हम किसी तरह वहां के दर्शन कर आए थे। सिंधु सरस्वती सभ्यता का अनिवार्य अंग सिंधु नदी का उद्गम इसी क्षेत्र में है। दो पहाड़ियों के बीच स्फटिक सा निर्मल गहरे नीले रंग का जलाशय राक्षस ताल है, जिसे रावण-हृद भी कहते हैं। इसका जल आचमन या स्नान के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता और न यहां कोई पूजा होती है।</p>



<p>हां, मानसरोवर में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य- गायत्री मंत्र व महामृत्युंजय मंत्र का जप का विधान है। ठीक सामने ज्योतिरूप शिवलिंग के आकार का हिमखंड। नीला आकाश- आस-पास कुछ नहीं, मात्र एक वह अत्युच्च शिव स्वरूप- शुभ्र आभायुक्त प्रभु का ज्योतित स्वरूप कैलास पर्वत दिखता है। हम जब गए तो प्रथम दर्शन ने अवाक- शब्दातीत कर दिया था। सर्वत्र मौन व्याप गया था। दंडवत प्रणाम कर सब चुप। दौड़कर लौटे और लिपट गए। मेरे कंधे उनके प्रेमाश्रुओं से गीले हो गए- कुछ कहते ही नहीं बनता था- गला रुंधा था। यह अनुभव साक्षात् प्रभुदर्शन से कम न था। साक्षात शिव से संवाद के समान!</p>



<p><strong>तीन स्वर्ग का क्षेत्र<br></strong>तिब्बत प्राचीन काल से भारतीय मनीषा और अध्यात्म का संगी रहा है। इसका नाम संस्कृत ‘त्रिविष्टप‘ से निकला है &#8211; जिसका अर्थ तीन स्वर्ग बताया जाता है। ऋग्वेद में त्रिविष्टप का उल्लेख मिलता है। तिब्बत की भाषा भोट- प्राकृत और पाली से निकली और वहां की चिकित्सा पद्धति शुद्ध आयुर्वेद है। तिब्बत में बौद्ध मत का प्रचार गुरु पद्मसंभव और आचार्य शांत रक्षित द्वारा सातवीं शताब्दी में किया गया था। चीन ने तिब्बत हड़पकर पूज्य दलाई लामा की संपूर्ण धरोहर मिटाने का प्रयास किया, वहां गांवों के नामों का चीनीकरण किया तथा लाखों हान लोगों ने मुख्य भूमि से तिब्बत में बसाकर जनसंख्या संतुलन बदल दिया।</p>



<p><strong>तीन मार्ग से मिलते शिव<br></strong>कैलास मानसरोवर विश्व की सबसे सुंदर और सबसे दुरूह तीर्थयात्रा है। दिल्ली से लगभग 865 किलोमीटर दूर यह क्षेत्र अत्यंत सुंदर, अवर्णनीय प्राकृतिक सुषमा युक्त मार्ग वाला है, जहां से ओम पर्वत के भी दर्शन होते हैं। यह यात्रा उत्तराखंड के धारचूला, गब्यांग, गुंजी, लिपुलेख से गुजरते हुए 27 दिन में पूरी होती है। दूसरा मार्ग नाथू ला (सिक्किम) से होकर जाता है। यह सारा पथ गाड़ियों से तय किया जा सकता है। जबकि पहला मार्ग आधा पैदल, आधा गाड़ियों से है। नेपाल होकर भी यात्रा होती है- जिसमें काठमांडू से ल्हासा हवाई मार्ग और फिर पजेरो गाड़ियों से/काठमांडू से कैलास आना-जाना हेलीकाप्टर या सड़क मार्ग से होता है। यात्रा मार्ग में धारचूला से आगे सैकड़ों प्रपातों का दूधिया जादू, हरियाली के हजार रूप और नबी ढांग में ओम पर्वत जैसे चमकदार पर्वत शिखर पर ऐसा हिमनद बना है जो ठीक ॐ के आकार का है। यात्री यह दृश्य मंत्रमुग्ध हो देखते ही रह जाते हैं!</p>
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