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	<title>कैंसर &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>कैंसर &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>वैज्ञानिकों ने बताया कि क्यों नॉन-स्मोकर्स भी हो जाते हैं लंग कैंसर का शिकार</title>
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		<pubDate>Tue, 28 Jul 2026 05:21:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="282" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg.jpg 800w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg-300x137.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg-768x350.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />विज्ञानियों ने कैंसर के बारे में एक पहेली सुलझाई है। एक अध्ययन ने यह प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किया है कि कैसे किसी व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना धूमपान या सूर्य के प्रकाश जैसे कारक डीएनए क्षति को प्रभावित कर सकता है और यह निर्धारित कर सकता है कि कितने म्यूटेशन होते हैं। यह निष्कर्ष नेचर जर्नल &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="282" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg.jpg 800w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg-300x137.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/07/hg-768x350.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>विज्ञानियों ने कैंसर के बारे में एक पहेली सुलझाई है। एक अध्ययन ने यह प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत किया है कि कैसे किसी व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना धूमपान या सूर्य के प्रकाश जैसे कारक डीएनए क्षति को प्रभावित कर सकता है और यह निर्धारित कर सकता है कि कितने म्यूटेशन होते हैं।</p>



<p>यह निष्कर्ष नेचर जर्नल में प्रकाशित हुए हैं, जिससे यह समझा जा सकता है कि धूमपान करने वाले कुछ लोगों को फेफड़ों का कैंसर क्यों नहीं होता, जबकि धूमपान नहीं करने वाले कुछ लोग भी फेफड़ों के कैंसर का शिकार हो जाते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">आनुवंशिकी और कैंसर का संबंध</h2>



<p>कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका कारण लगभग निश्चित रूप से हमारे विरासत में मिले आनुवंशिक संरचना से संबंधित है, लेकिन प्रभावित समूह के अध्ययनों में प्रत्यक्ष साक्ष्य प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण रहा है। हालांकि कई अध्ययनों से संकेत मिला है कि विरासत में मिली आनुवंशिक भिन्नताएं कैंसर के जोखिम को प्रभावित करती हैं, इस संबंध को साबित करना कठिन रहा है क्योंकि व्यक्तियों की जीवनशैली, पर्यावरण और संपर्क इतिहास में भिन्नता होती है।</p>



<p>कैंसर रिसर्च यूके कैंब्रिज संस्थान में इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले डंकन ओडम ने बताया कि कैंसर पूरी तरह से संयोग से उत्पन्न नहीं होता।</p>



<h2 class="wp-block-heading">कैंसर स्क्रीनिंग और सटीक चिकित्सा पर प्रभाव</h2>



<p>शोधकर्ताओं ने कहा कि इन निष्कर्षों का कैंसर स्क्रीनिंग और सटीक चिकित्सा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। कैंसर की रोकथाम और स्क्रीनिंग रणनीतियों को विरासत में मिली आनुवंशिकी और जनसंख्या विविधता को अधिक सावधानी से ध्यान में रखना पड़ सकता है। शोधकर्ताओं ने चार प्रकार के चूहों को विकसित किया, जिनकी लिवर कैंसर के प्रति संवेदनशीलता भिन्न थी, जो मानव आबादी में देखी जाने वाली आनुवंशिक विविधता के स्तर के समान थी। चूहों को लिवर कार्सिनोजेन डाइएथिलनाइट्रोसामाइन (डीईएन) की एकल खुराक के संपर्क में लाया गया। डीईएन तंबाकू के धुएं और कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में पाया जाता है और यह लिवर कोशिकाओं में डीएनए क्षति का कारण बनता है, जिससे ऐसे म्यूटेशन होते हैं, जिससे ट्यूमर बनने की शुरुआत हो सकती है।</p>



<p>चूंकि प्रत्येक चूहे को नियंत्रित परिस्थितियों में समान उम्र (15 दिन) में समान खुराक दी गई, टीम ने उन पर्यावरणीय भिन्नताओं को समाप्त कर दिया जो मानव अध्ययनों में भ्रमित करती हैं। उन्होंने लगभग 600 ट्यूमर के जीनोम का अनुक्रमण किया और विकसित होने वाली जीन गतिविधि का विश्लेषण किया, साथ ही बिना उपचारित चूहों की तुलना की ताकि विभिन्न प्रकारों में स्वाभाविक ट्यूमर गठन की तुलना की जा सके।</p>



<p>सभी चूहों की नस्लों में, कैंसर लगभग हमेशा एक कैंसर-प्रेरक म्यूटेशन प्राप्त करता है जो एक ही कैंसर-प्रोत्साहक सिग्नलिंग प्रणाली, जिसे एमएपीके पथ कहा जाता है, को सक्रिय करता है &#8211; यह एक बहु-चरणीय आणविक संकेतों का झालर है, जो महत्वपूर्ण जीवन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है, जिसमें कोशिका वृद्धि शामिल है और कई प्रकार के कैंसर में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, चूहे की आनुवंशिकी के आधार पर म्यूटेशन ने कैंसर से संबंधित अन्य सिग्नलिंग पथों की गतिविधि को बदल दिया और पूरे जीनोम की एक नकल की प्रवृत्ति को भी जन्म दिया- जहां एक जीव अतिरिक्त सेट के सभी गुणसूत्रों और जीन प्रतियों को प्राप्त करता है, जो स्वतंत्र रूप से म्यूटेट हो सकते हैं और नए कार्यों को ग्रहण कर सकते हैं।</p>
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		<title>कुत्तों और एआई का उपयोग कर कैंसर का पता लगा रही बेंगलुरु की कंपनी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Jun 2026 05:58:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="349" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok.jpg 712w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok-300x169.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />कुत्तों की सूंघने की अद्भुत क्षमता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का उपयोग कर बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी कैंसर का प्रारंभिक चरण में पता लगाने में मदद कर रही है। इस तकनीक से कैंसर की बेहद सस्ती, सटीक और दर्दरहित जांच संभव हो सकती है। कंपनी का दावा है कि पिछले दो वर्षों में दूसरे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="349" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok.jpg 712w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/06/9uiok-300x169.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>कुत्तों की सूंघने की अद्भुत क्षमता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का उपयोग कर बेंगलुरु की एक स्टार्टअप कंपनी कैंसर का प्रारंभिक चरण में पता लगाने में मदद कर रही है। इस तकनीक से कैंसर की बेहद सस्ती, सटीक और दर्दरहित जांच संभव हो सकती है।</p>



<p>कंपनी का दावा है कि पिछले दो वर्षों में दूसरे चरण के परीक्षण के दौरान लगभग 1,500 लोगों पर परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों में तकनीक 90 प्रतिशत से अधिक सटीकता के साथ कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पकड़ने में सफल रही।</p>



<p>डॉगनोसिस नामक स्टार्टअप कंपनी कुत्तों की असाधारण सूंघने की क्षमता और एआई-संचालित विश्लेषण के साथ कैंसर से जुड़े रासायनिक यौगिकों की पहचान कर रही है। इस परियोजना से जुड़े डाक्टरों का कहना है कि शुरुआती परीक्षणों में इस तकनीक ने आशाजनक परिणाम दिखाए हैं।</p>



<p>कैंसर विशेषज्ञ डा. स्वरातिका मजूमदार ने कहा, यह कैंसर का पता लगाने का प्रारंभिक, आसान और सस्ता तरीका है। यदि किसी को कैंसर है, तो कुत्ते लगभग 90 प्रतिशत मामलों में इसकी पहचान करने में सक्षम हैं।</p>



<p>इस प्रक्रिया में मरीजों को 10 मिनट के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए मास्क में सांस लेने को कहा जाता है, जिससे उनकी सांस में मौजूद वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी) इकट्ठे हो जाते हैं।</p>



<p>इसके बाद नमूनों को प्रयोगशाला में लाया जाता है, जहां विशेष रूप से प्रशिक्षित कुत्ते सेंसर और निगरानी प्रणालियों से सुसज्जित नियंत्रित परीक्षण सेटअप के अंदर सांस के नमूनों को सूंघते हैं।</p>



<p>डॉगनोसिस के सीईओ आकाश कुलगोद के अनुसार कुत्तों को गंध के माध्यम से रोग से संबंधित वीओसी संकेतों की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। उन्होंने कहा, मास्क में वीओसी होते हैं, जो मूल रूप से यह संकेत देते हैं कि किसी व्यक्ति को कोई बीमारी है या नहीं।</p>



<p>मास्क को प्रयोगशाला में लाया जाता है, जहां प्रशिक्षित कुत्तों की टीम इनका मूल्यांकन करती है और इन यौगिकों की सटीक पहचान करती है। कुत्तों की प्रतिक्रियाओं को सेंसर के माध्यम से रिकार्ड किया जाता है और एआइ-आधारित एल्गोरिदम का उपयोग करके उनका विश्लेषण किया जाता है।</p>



<p>डॉगनोसिस की आफिस एसोसिएट सृष्टि ने कहा, यह इस बात का प्रमाण है कि सांस की जांच से ही कैंसर का प्रारंभिक चरण में पता लगाया जा सकता है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि भारत में विकसित तकनीक वैश्विक स्तर पर कैंसर का शीघ्र पता लगाने में योगदान दे सकती है।</p>



<p>भारत में हर साल लाखों कैंसर के मामले सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई और जैविक पहचान प्रणालियों को मिलाकर विकसित की जाने वाली प्रौद्योगिकियां भविष्य में प्रारंभिक जांच और समय पर उपचार में महत्वपूर्ण सुधार ला सकती हैं।</p>
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		<item>
		<title>बार-बार सनबर्न से बढ़ जाता है स्किन कैंसर का खतरा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 May 2026 05:15:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="306" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh.jpg 801w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh-300x149.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh-768x381.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />गर्मियों का मौसम आते ही लोग तेज धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। इस मौसम में तेज धूप के कारण रेडनेस, जलन होना और सनबर्न होना काफी आम समस्या है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सनबर्न की समस्या को मामूली समझना खतरनाक साबित हो सकता है। दरअसल, सनबर्न की समस्या &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="306" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh.jpg 801w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh-300x149.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/7ygh-768x381.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>गर्मियों का मौसम आते ही लोग तेज धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। इस मौसम में तेज धूप के कारण रेडनेस, जलन होना और सनबर्न होना काफी आम समस्या है, जिसे ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन सनबर्न की समस्या को मामूली समझना खतरनाक साबित हो सकता है।</p>



<p>दरअसल, सनबर्न की समस्या स्किन कैंसर का भी रूप ले सकती है। इसलिए इससे सावधान रहना और बचाव करना काफी जरूरी है। आइए इस बारे में डॉ. पर्ल आनंद (कंसल्टेंट, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी, एंड्रोमेडा कैंसर हॉस्पिटल, सोनीपत) से जानते हैं।</p>



<p><strong>क्या सनबर्न के कारण स्किन कैंसर हो सकता है?<br></strong>डॉ. आनंद बताती हैं कि बार-बार सनबर्न होने से भविष्य में स्किन कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है। ज्यादा समय तक धूप में रहने से हमारी त्वचा लगातार यूवी किरणों के संपर्क में आती है, जिससे स्किन सेल्स के डैमेज होने का रिस्क बढ़ जाता है।</p>



<p>जब त्वचा का DNA डैमेज हो जाता है, तो सेल्स असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, जो धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले लेती हैं।सनबर्न के कारण तीन तरह के स्किन कैंसर का खतरा बढ़ता है-</p>



<p>मेलानोमा- यह सबसे खतरनाक प्रकार का स्किन कैंसर है।<br>बेसल सेल कार्सिनोमा<br>स्कवैमस सेल कार्सिनोमा</p>



<p>ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अगर बचपन या टीनएज में किसी को गंभीर सनबर्न हुआ हो, तो बड़े होने पर उसमें स्किन कैंसर विकसित होने का जोखिम कई गुना ज्यादा हो जाता है। इसलिए सनबर्न को केवल टैनिंग समझकर नजरअंदाज करने की भूल बिल्कुल न करें।</p>



<p><strong>गर्मियों में सनबर्न से बचने के उपाय<br></strong>गर्मी के मौसम में धूप से पूरी तरह बचना मुमकिन नहीं है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतकर सनबर्न से बचा जा सकता है-</p>



<p>बाहर निकलने से बचें- सुबह 10 बजे से दोपहर 4 बजे के बीच सूरज की यूवी किरणें सबसे ज्यादा तेज और हानिकारक होती हैं। कोशिश करें कि इस दौरान सीधे धूप में जाने से बचें। अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो कोशिश करें कि आप छांव में रहें।</p>



<p><br>सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल- धूप में निकलने से कम से कम 20-30 मिनट पहले एसपीएफ 30 या उससे ज्यादा का ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन जरूर लगाएं। ध्यान रहे कि सनस्क्रीन का असर केवल 2 से 3 घंटे ही रहता है। इसलिए अगर आप लंबे समय तक बाहर हैं, या आपको बहुत पसीना आ रहा है या स्विमिंग कर रहे हैं, तो हर 2 घंटे में सनस्क्रीन दोबारा लगाएं।</p>



<p><br>कपड़े और एक्सेसरीज पहनें- गर्मियों में हल्के रंग के, सूती और पूरी बाजू के कपड़े पहनें। इसके अलावा, बाहर निकलते समय चौड़े किनारे वाली टोपी पहनें जिससे चेहरा, कान और गर्दन ढके रहें। यूवी-प्रोटेक्टिव सनग्लासेस लगाएं।</p>



<p><br>खुद को हाइड्रेटेड रखें- तेज धूप में शरीर से पानी बहुत जल्दी खत्म होता है। त्वचा की नमी बनाए रखने और सनबर्न के असर को कम करने के लिए दिनभर में भरपूर पानी, नारियल पानी या नींबू पानी पीते रहें।</p>



<p><strong>डॉक्टर से कब संपर्क करें?<br></strong>सनबर्न केवल कुछ दिनों की जलन नहीं है, यह त्वचा को लंबे समय में नुकसान पहुंचाता है। इसलिए कुछ संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए-</p>



<p>त्वचा पर बार-बार ज्यादा रेडनेस, जलन या छाले पड़ना।<br>शरीर पर मौजूद किसी तिल या मस्से के आकार, रंग या बनावट में बदलाव आना।<br>त्वचा पर कोई ऐसा घाव या दाग होना जो लंबे समय से ठीक न हो रहा हो।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>आंतों में पनपने वाली ये दो गांठें 5 गुना बढ़ा देती हैं कैंसर का खतरा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 18 May 2026 06:00:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="367" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti.jpg 729w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti-300x178.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />आंत का कैंसर, एक बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसे मेडिकल भाषा में &#8216;कोलोरेक्टल कैंसर&#8217; भी कहा जाता है। हाल ही में हुए एक नए अध्ययन ने इस बीमारी के पनपने के पीछे के एक बड़े कारण का खुलासा किया है। शोध के अनुसार, हमारी आंतों में पनपने वाले दो खास तरह के &#8216;पॉलीप्स&#8217; आंत &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="367" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti.jpg 729w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/kti-300x178.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>आंत का कैंसर, एक बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जिसे मेडिकल भाषा में &#8216;कोलोरेक्टल कैंसर&#8217; भी कहा जाता है। हाल ही में हुए एक नए अध्ययन ने इस बीमारी के पनपने के पीछे के एक बड़े कारण का खुलासा किया है। शोध के अनुसार, हमारी आंतों में पनपने वाले दो खास तरह के &#8216;पॉलीप्स&#8217; आंत के कैंसर के खतरे को पांच गुना तक बढ़ा सकते हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading">क्या हैं ये पॉलीप्स और कैसे बनते हैं खतरा?</h3>



<p>पॉलीप्स असल में आंत की भीतरी दीवार या परत पर विकसित होने वाली छोटी-छोटी गांठें होती हैं। ज्यादातर कोलोरेक्टल कैंसर की शुरुआत इन्हीं गांठों के रूप में होती है। हालांकि, शुरुआत में इन गांठों से शरीर को तुरंत कोई नुकसान नहीं पहुंचता है, लेकिन अध्ययन बताता है कि &#8216;एडेनोमा&#8217; और &#8216;सेरेटेड&#8217; नाम के दो विशिष्ट पॉलीप्स में समय के साथ कैंसर में तब्दील होने की क्षमता होती है।</p>



<p>इस कैंसर की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया में यह कैंसर से होने वाली मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। वहीं, सबसे ज्यादा निदान किए जाने वाले कैंसर के मामलों में यह चौथे नंबर पर आता है।</p>



<p><strong>हैरान करने वाले शोध के नतीजे<br></strong>यह महत्वपूर्ण शोध फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय और फ्लिंडर्स मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसके लिए उन्होंने 8,400 से अधिक &#8216;कोलोनोस्कोपी&#8217; रिकॉर्ड्स की बारीकी से जांच की। जांच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई:</p>



<p>जिन मरीजों की आंत में &#8216;सेरेटेड&#8217; पॉलीप्स थे, उनमें से लगभग आधे मरीजों में &#8216;एडेनोमा&#8217; पॉलीप्स भी पाए गए।<br>इन दोनों खतरनाक गांठों का एक साथ होना एक उच्च जोखिम वाला संयोजन है, जो विशेषज्ञों की उम्मीद से कहीं ज्यादा आम निकला है।<br>इस महत्वपूर्ण शोध के निष्कर्षों को &#8216;क्लिनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी&#8217; नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।</p>



<p><strong>बचाव का तरीका क्या है?<br></strong>शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि आंत के कैंसर और पॉलीप्स के बीच एक गहरा संबंध है। इस अध्ययन के परिणाम इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि बीमारी से बचाव के लिए शीघ्र निदान सबसे बड़ा हथियार है। इन खतरनाक पॉलीप्स को समय रहते पहचानने और कैंसर के खतरे को टालने के लिए नियमित रूप से कोलोनोस्कोपी द्वारा निगरानी करवाना बेहद आवश्यक है।</p>
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		<title>कैंसर से ठीक हो चुके मरीजों में दोगुना हुआ इस जानलेवा बीमारी का रिस्क</title>
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		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 05:54:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="315" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg 918w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-300x153.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-768x392.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद हर मरीज एक स्वस्थ जीवन की उम्मीद करता है, लेकिन जापान में किए गए एक हालिया अध्ययन ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। मशहूर मेडिकल पत्रिका ‘कैंसर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैंसर का इलाज करने वाली &#8230;]]></description>
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<p>कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद हर मरीज एक स्वस्थ जीवन की उम्मीद करता है, लेकिन जापान में किए गए एक हालिया अध्ययन ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। मशहूर मेडिकल पत्रिका ‘कैंसर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैंसर का इलाज करने वाली कुछ थेरेपीज, भविष्य में ब्लड से जुड़े कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।</p>



<p><strong>क्या है यह नई समस्या?<br></strong>इस अध्ययन में बताया गया है कि हाल के वर्षों में जापान के अंदर ‘थेरेपी संबंधित तीव्र मायलोइड ल्यूकेमिया’ (tAML) के मामलों में धीरे-धीरे वृद्धि देखी गई है। यह खतरा विशेष तौर पर उन मरीजों में ज्यादा देखा जा रहा है जिनका पहले स्तन कैंसर का इलाज हो चुका है।</p>



<p>tAML असल में खून और बोन मैरो का एक बहुत ही आक्रामक कैंसर है। यह बीमारी आमतौर पर तब पनपती है जब कोई मरीज कैंसर से ठीक होने के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी से गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कड़े उपचारों की वजह से मरीज के डीएनए को जो नुकसान पहुंचता है, संभवतः वही इस नए ब्लड कैंसर का मुख्य कारण है।</p>



<p><strong>ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के चौंकाने वाले आंकड़े<br></strong>यह समझने के लिए कि क्या कैंसर से ठीक होने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ यह नई बीमारी भी बढ़ रही है, शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया। उन्होंने ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के डेटा का गहराई से विश्लेषण किया, जिसमें साल 1990 से 2020 के बीच ‘तीव्र माइलायड ल्यूकेमिया’ (AML) के शिकार हुए मरीजों की जांच की गई।</p>



<p><strong>इस जांच में सामने आए मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:</strong></p>



<p>कुल मामले: जांचे गए 9,841 AML मरीजों में से 636 मरीजों (यानी 6.5 प्रतिशत) में tAML पाया गया।<br>तेजी से बढ़ती दर: साल 1990 में, प्रति 100,000 की जनसंख्या पर tAML की वार्षिक घटना दर मात्र 0.13 थी।<br>वर्तमान स्थिति: साल 2020 तक यह दर काफी हद तक बढ़ गई और प्रति 100,000 की जनसंख्या पर 0.36 तक पहुंच गई।</p>



<p><strong>दोगुना हुआ खतरा<br></strong>अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कुल AML मामलों के बीच, थेरेपी से होने वाले इस नए कैंसर का अनुपात अब दोगुना हो गया है। यह डेटा इस बात की ओर इशारा करता है कि कैंसर के इलाज के बाद भी मरीजों के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी करना बेहद जरूरी है।</p>
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