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	<title>कैंसर &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>कैंसर &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>कैंसर से ठीक हो चुके मरीजों में दोगुना हुआ इस जानलेवा बीमारी का रिस्क</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 05:54:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="315" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg 918w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-300x153.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-768x392.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद हर मरीज एक स्वस्थ जीवन की उम्मीद करता है, लेकिन जापान में किए गए एक हालिया अध्ययन ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। मशहूर मेडिकल पत्रिका ‘कैंसर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैंसर का इलाज करने वाली &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="315" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7.jpg 918w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-300x153.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/04/7-768x392.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद हर मरीज एक स्वस्थ जीवन की उम्मीद करता है, लेकिन जापान में किए गए एक हालिया अध्ययन ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। मशहूर मेडिकल पत्रिका ‘कैंसर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैंसर का इलाज करने वाली कुछ थेरेपीज, भविष्य में ब्लड से जुड़े कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।</p>



<p><strong>क्या है यह नई समस्या?<br></strong>इस अध्ययन में बताया गया है कि हाल के वर्षों में जापान के अंदर ‘थेरेपी संबंधित तीव्र मायलोइड ल्यूकेमिया’ (tAML) के मामलों में धीरे-धीरे वृद्धि देखी गई है। यह खतरा विशेष तौर पर उन मरीजों में ज्यादा देखा जा रहा है जिनका पहले स्तन कैंसर का इलाज हो चुका है।</p>



<p>tAML असल में खून और बोन मैरो का एक बहुत ही आक्रामक कैंसर है। यह बीमारी आमतौर पर तब पनपती है जब कोई मरीज कैंसर से ठीक होने के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी से गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कड़े उपचारों की वजह से मरीज के डीएनए को जो नुकसान पहुंचता है, संभवतः वही इस नए ब्लड कैंसर का मुख्य कारण है।</p>



<p><strong>ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के चौंकाने वाले आंकड़े<br></strong>यह समझने के लिए कि क्या कैंसर से ठीक होने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ यह नई बीमारी भी बढ़ रही है, शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया। उन्होंने ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के डेटा का गहराई से विश्लेषण किया, जिसमें साल 1990 से 2020 के बीच ‘तीव्र माइलायड ल्यूकेमिया’ (AML) के शिकार हुए मरीजों की जांच की गई।</p>



<p><strong>इस जांच में सामने आए मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:</strong></p>



<p>कुल मामले: जांचे गए 9,841 AML मरीजों में से 636 मरीजों (यानी 6.5 प्रतिशत) में tAML पाया गया।<br>तेजी से बढ़ती दर: साल 1990 में, प्रति 100,000 की जनसंख्या पर tAML की वार्षिक घटना दर मात्र 0.13 थी।<br>वर्तमान स्थिति: साल 2020 तक यह दर काफी हद तक बढ़ गई और प्रति 100,000 की जनसंख्या पर 0.36 तक पहुंच गई।</p>



<p><strong>दोगुना हुआ खतरा<br></strong>अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कुल AML मामलों के बीच, थेरेपी से होने वाले इस नए कैंसर का अनुपात अब दोगुना हो गया है। यह डेटा इस बात की ओर इशारा करता है कि कैंसर के इलाज के बाद भी मरीजों के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी करना बेहद जरूरी है।</p>
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		<title>आंतों में इन दो तरह की गांठ से 5 गुना तक बढ़ जाता है कैंसर का खतरा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Mar 2026 05:01:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui.png 726w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui-300x143.png 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />कैंसर एक बेहद जटिल बीमारी है और अब तक इसका कोई एक विशिष्ट कारण सामने नहीं आ पाया है। हालांकि, हाल ही में हुए एक शोध ने आंत के कैंसर (जिसे कोलोरेक्टल कैंसर भी कहा जाता है) के एक बड़े खतरे को उजागर किया है। हमारे शरीर की आंतों की भीतरी परत पर कभी-कभी टिश्यूज &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui.png 726w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/03/uytyui-300x143.png 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>कैंसर एक बेहद जटिल बीमारी है और अब तक इसका कोई एक विशिष्ट कारण सामने नहीं आ पाया है। हालांकि, हाल ही में हुए एक शोध ने आंत के कैंसर (जिसे कोलोरेक्टल कैंसर भी कहा जाता है) के एक बड़े खतरे को उजागर किया है। हमारे शरीर की आंतों की भीतरी परत पर कभी-कभी टिश्यूज की असामान्य वृद्धि होने लगती है, जिसे &#8216;पॉलीप्स&#8217; कहते हैं। वैसे तो शुरुआत में ये वृद्धि हानिरहित और सौम्य होती है, लेकिन अगर इन पर ध्यान न दिया जाए, तो ये धीरे-धीरे कैंसर का रूप ले सकती हैं।</p>



<p><strong>दो तरह के पॉलीप्स का संयोजन है खतरे की घंटी<br></strong>आंतों में पनपने वाले पॉलीप्स कई तरह के हो सकते हैं, लेकिन इनमें से दो विशेष प्रकार ऐसे हैं जो समय के साथ कैंसर में बदलने की क्षमता रखते हैं:</p>



<p>एडेनोमा: यह एक बहुत ही सामान्य और धीमी गति से बढ़ने वाला ट्यूमर है। यह शरीर के ग्रंथियों वाले &#8216;एपिथेलियल&#8217; टिश्यूज से पैदा होता है।<br>सेरेटेड पॉलीप्स: यह आंत या मलाशय की भीतरी परत पर होने वाली एक असामान्य वृद्धि है। इसके किनारे आरी के दांतों की तरह दिखाई देते हैं।<br>अध्ययन से यह बात सामने आई है कि सेरेटेड पॉलीप्स, एडेनोमा की तुलना में कहीं अधिक तेजी से कैंसर में विकसित हो सकते हैं।</p>



<p><strong>क्या कहती है नई रिसर्च?<br></strong>&#8216;क्लीनिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी&#8217; जर्नल में प्रकाशित, फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी और फ्लिंडर्स मेडिकल सेंटर के एक महत्वपूर्ण अध्ययन में 8,400 से ज्यादा कोलोनोस्कोपी रिकॉर्ड्स की गहन जांच की गई।</p>



<p>शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन लोगों की आंतों में &#8216;एडेनोमा&#8217; और &#8216;सेरेटेड पॉलीप्स&#8217; दोनों एक साथ मौजूद थे, उनमें एडवांस कैंसर विकसित होने का जोखिम बहुत अधिक था। यह जोखिम केवल एक प्रकार के पॉलीप वाले व्यक्ति की तुलना में पांच गुना अधिक पाया गया। चिंता की बात यह है कि सेरेटेड पॉलीप्स वाले लगभग आधे मरीजों की जांच में एडेनोमा भी पाया गया, जो इस उच्च जोखिम वाले संयोजन को अपेक्षा से कहीं अधिक आम बनाता है।</p>



<p><strong>बचाव ही है सबसे सही इलाज<br></strong>उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर में पॉलीप्स होने की संभावना भी आम हो जाती है। असल चुनौती इन पॉलीप्स को कैंसर बनने से पहले पहचानना और उन्हें हटाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी को प्रबंधित करने और इससे बचने का सबसे कारगर तरीका नियमित कोलोनोस्कोपी कराना है। यह दोनों प्रकार के पॉलीप्स के बीच के अंतर को समझने और सही समय पर इलाज शुरू करने में मदद करता है।</p>



<p><strong>किसे है सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत?<br></strong>जिन लोगों की उम्र 45 वर्ष से अधिक हो चुकी है।<br>जिनके परिवार में पहले किसी को आंत की बीमारी या कैंसर का इतिहास रहा हो।</p>



<p>ऐसे लोगों को अपनी सेहत को लेकर सतर्क रहना चाहिए और कैंसर स्क्रीनिंग पर विशेष ध्यान देना चाहिए। समय पर की गई जांच आपकी जान बचा सकती है।</p>
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		<title>कैंसर को हराकर सामान्य जीवन जी रहे हैं 94.5% बच्चे, एम्स की स्टडी में राहत भरी खबर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Feb 2026 04:40:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="339" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940.png 805w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940-300x164.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940-768x421.png 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />एम्स और राजीव गांधी कैंसर संस्थान द्वारा किए गए इस अध्ययन में 5,419 बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया। &#8216;कैंसर&#8217; महज एक शब्द नहीं है, बल्कि एक ऐसा डर है जो किसी भी परिवार को अंदर तक झकझोर देता है। ऐसे में जब कोई बच्चा इस गंभीर बीमारी को मात देकर &#8216;कैंसर-फ्री&#8217; होता है, &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="339" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940.png 805w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940-300x164.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-22-203940-768x421.png 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>एम्स और राजीव गांधी कैंसर संस्थान द्वारा किए गए इस अध्ययन में 5,419 बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया।</p>



<p>&#8216;कैंसर&#8217; महज एक शब्द नहीं है, बल्कि एक ऐसा डर है जो किसी भी परिवार को अंदर तक झकझोर देता है। ऐसे में जब कोई बच्चा इस गंभीर बीमारी को मात देकर &#8216;कैंसर-फ्री&#8217; होता है, तो वह पूरे परिवार के लिए एक नई जिंदगी की सुखद शुरुआत होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इलाज पूरी तरह खत्म होने के बाद इन बच्चों का जीवन कैसा होता है? भारत में अब तक इस विषय पर बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध थी।</p>



<p><strong>कैंसर को हराकर सामान्य जीवन जी रहे 94.5% बच्चे<br></strong>अब एक बेहद राहत भरी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। बचपन में कैंसर से उबर चुके बच्चों के स्वास्थ्य पर नज़र रखने वाली भारत की पहली राष्ट्रव्यापी रजिस्ट्री ने अपनी अहम रिपोर्ट जारी की है। इस अध्ययन के अनुसार, कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद बच्चों के जीवित रहने की दर 94.5 प्रतिशत पाई गई है। यह आंकड़ा उन माता-पिता के लिए एक बड़ी उम्मीद है, जिनके बच्चे इस कठिन समय से गुजर रहे हैं।</p>



<p><strong>कैंसर के खिलाफ बड़ी जीत<br></strong>यह महत्वपूर्ण अध्ययन नई दिल्ली के एम्स और राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं की एक टीम ने किया है। इस टीम ने देश भर के 20 अलग-अलग केंद्रों से ऐसे 5,419 बच्चों के आंकड़ों का गहराई से अध्ययन किया, जिन्हें 18 साल की उम्र से पहले कैंसर हुआ था और वे इलाज के बाद पूरी तरह रोगमुक्त हो गए थे। जांच के दौरान इनमें से 5,140 बच्चों के जीवित रहने के स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध थे।</p>



<p><strong>40% मामलों में &#8216;एक्यूट ल्यूकेमिया&#8217; की पहचा<br></strong>रिपोर्ट बताती है कि इन बच्चों में जो कैंसर सबसे आम पाया गया, वह &#8216;एक्यूट ल्यूकेमिया&#8217; (40.9 प्रतिशत) था। अगर इलाज के तरीकों की बात करें, तो इन बच्चों में से 94.7 प्रतिशत मामलों में कीमोथेरेपी का उपयोग किया गया। इसके अलावा 30 प्रतिशत बच्चों में सर्जरी और 26.3 प्रतिशत मामलों में रेडियोथेरेपी का इस्तेमाल किया गया।</p>



<p><strong>कैंसर को मात देने के बाद भी सतर्कता है जरूरी<br></strong>जहां एक ओर पांच वर्ष से ज्यादा समय तक 94.5 प्रतिशत का सर्वाइवल रेट सुकून देता है, वहीं यह रिपोर्ट भविष्य के लिए एक चेतावनी भी देती है। अध्ययन में बताया गया है कि कैंसर को हराने वाले कई बच्चों को अपना इलाज पूरा करने के महीनों या सालों बाद भी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि प्राथमिक इलाज खत्म होने के बाद 89.9 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो इन जटिलताओं से पूरी तरह मुक्त और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>सिर्फ बड़ों को ही नहीं, बच्चों को भी हो सकता है कैंसर, डॉक्टर ने बताए इसके 6 शुरुआती संकेत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Feb 2026 09:21:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="312" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918.png 787w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918-300x151.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918-768x387.png 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />कैंसर बच्चों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। ऐसे में जरूरी है कि इसके शुरुआती लक्षणों के बारे में पेरेंट्स को जरूर पता हो, ताकि वक्त पर इसकी पहचान की जा सके। इस बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 15 फरवरी को इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे मनाया जाता है। कैंसर सिर्फ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="312" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918.png 787w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918-300x151.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/02/Screenshot-2026-02-15-011918-768x387.png 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>कैंसर बच्चों को भी अपनी चपेट में ले सकता है। ऐसे में जरूरी है कि इसके शुरुआती लक्षणों के बारे में पेरेंट्स को जरूर पता हो, ताकि वक्त पर इसकी पहचान की जा सके। इस बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल 15 फरवरी को इंटरनेशनल चाइल्डहुड कैंसर डे मनाया जाता है।</p>



<p>कैंसर सिर्फ वयस्कों को ही नहीं, बल्कि बच्चों को भी अपना शिकार बना सकता है। 0-19 साल की उम्र में होने वाले कैंसर को चाइल्डहुड कैंसर कहा जाता है। हालांकि बच्चों में कैंसर वयस्कों की तुलना में काफी दुर्लभ है, लेकिन जल्द पहचान और समय पर इलाज जान बचाने में काफी मददगार साबित हो सकती है।</p>



<p>चाइल्डहुड कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण अक्सर आम बीमारियों, जैसे फ्लू या हल्की चोट से मिलते-जुलते होते हैं। इसलिए इसके लक्षणों के बारे में हर मात-पिता को जरूर पता होना चाहिए, ताकि वक्त रहते कैंसर का पता लगाया जा सके। आइए चाइल्डहुड कैंसर के कुछ शुरुआती लक्षणों के बारे में डॉ. सज्जन राजपुरोहित (डायरेक्टर एंड हेड- मेडिकल ऑन्कोलॉजी, मेदांता हॉस्पिटल, नोएडा) से जानते हैं।</p>



<p><strong>इन 6 लक्षणों पर रखें पैनी नजर<br></strong>लगातार बुखार और वजन में गिरावट- अगर बच्चे को बिना किसी इन्फेक्शन के बार-बार बुखार आ रहा है या उसका वजन अचानक तेजी से गिर रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें। भूख में कमी और लगातार सुस्ती भी इसी का हिस्सा हो सकते हैं।<br>असामान्य गांठ या सूजन- शरीर के किसी भी हिस्से, खासकर गर्दन, पेट, बगल या जांघ के आसपास कोई भी ऐसी गांठ लंबे समय से है या आकार में बढ़ रही हो, उसे डॉक्टर को दिखाएं।<br>हड्डियों और जोड़ों में दर्द- अगर बच्चा खेल-कूद के दौरान लगी किसी चोट के बिना ही हड्डियों में दर्द की शिकायत करता है, लंगड़ा कर चलता है या चलने से मना कर देता है, तो यह हड्डियों के कैंसर या ल्यूकेमिया का संकेत हो सकता है।<br>बार-बार सिरदर्द और उल्टी- सुबह के समय होने वाला तेज सिरदर्द, जिसके साथ अक्सर उल्टी भी हो, दिमाग से जुड़ी समस्याओं का संकेत हो सकता है।<br>त्वचा के रंग में बदलाव और ब्लीडिंग- बिना किसी चोट के शरीर पर नीले निशान पड़ना, मसूड़ों या नाक से खून आना और त्वचा का पीला पड़ना एनीमिया या ब्लड कैंसर के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।<br>व्हाइट रिफ्लेक्स- कैंसर का एक लक्षण आंखों में देखा जा सकता है। धुंधला दिखना या अगर आप बच्चे की फोटो खींचते हैं और फ्लैश के कारण उसकी पुतली में सफेद चमक दिखाई देती है, तो यह भी कैंसर का संकेत हो सकता है।</p>



<p><strong>डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?<br></strong>अगर ऊपर बताए गए लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा समय तक बने रहें या लक्षण तेजी से बढ़ने लगें, तो आपको तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।</p>
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		<title>कैंसर को मात देकर पांच हजार बच्चे जी रहे हैं स्वस्थ जीवन, समय पर इलाज से लौट आईं खुशियां</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Feb 2026 08:52:15 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[कैंसर]]></category>
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<p>कैंसर को मात देकर 5 हजार से अधिक बच्चे अब स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक विभाग की ऑन्कोलॉजी इकाई प्रमुख डॉ. रचना सेठ के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में ये जानकारी सामने आई है। इलाज के पांच साल बाद भी करीब 95 फीसदी बच्चे पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।</p>



<p>ये अध्ययन 2016 से 2024 के बीच देशभर के 20 केंद्रों में किया गया, जिसकी रिपोर्ट इसी महीने द लैंसेट जर्नल हेल्थ में प्रकाशित हुई है। इसमें 0-18 वर्ष के 5419 कैंसर सर्वाइवर बच्चों को शामिल किया गया। पूरे समूह में पांच वर्ष तक कुल सर्वाइवल दर 94.5 फीसदी रही और 89.9 फीसदी बच्चे बीमारी से मुक्त रहे।</p>



<p>वहीं, दो वर्ष तक पोस्ट ट्रीटमेंट फॉलोअप लेने वाले 2266 बच्चों में पांच साल तक सर्वाइवल दर 98.2 फीसदी और 95.7 फीसदी बच्चे बीमारी से मुक्त पाए गए। डॉ रचना सेठ ने कहा कि कैंसर को मात देकर ये बच्चे सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। जागरूकता बढ़ाने के लिए रविवार को इंडिया गेट पर वॉकथॉन आयोजित की जाएगी।&nbsp;</p>



<p><strong>इलाज के दौरान इन बातों का रखा ध्यान</strong><br>इलाज के दौरान 94.7 फीसदी बच्चों को कीमोथेरेपी दी गई, जबकि 30.3 फीसदी की सर्जरी और 26.3 फीसदी को रेडियोथेरेपी कराई गई। अध्ययन में मेल बच्चे अधिक पाए गए। कुल 3537 लड़के और 1812 लड़कियां शामिल थीं। परिणाम 5140 बच्चों के उपलब्ध रहे।</p>



<p>बच्चों में सबसे ज्यादा एक्यूट ल्यूकेमिया (40.9%) पाया गया। इसके अलावा लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (34.4%), हॉजकिन लिंफोमा (12.9%), रेटिनोब्लास्टोमा (7.4%), बोन ट्यूमर (8.4%), किडनी ट्यूमर (4.61%) सहित अन्य कैंसर भी सामने आए। अध्ययन के मुताबिक, समय पर इलाज और नियमित फॉलोअप से बच्चों के स्वस्थ भविष्य की उम्मीद मजबूत हुई है।</p>
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