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	<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>विवाहित व्यक्ति तलाक लिए बिना लिव-इन संबंध में नहीं रह सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Mar 2026 05:28:38 +0000</pubDate>
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<p><strong>प्रयागराज:&nbsp;</strong>इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि शादीशुदा महिला और पुरुष अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए उनसे तलाक लिए बगैर किसी तीसरे व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से सहजीवन (लिव इन) संबंध में नहीं रह सकते। न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि सक्षम अदालत से तलाक हासिल किए बिना न्यायालय लिव-इन संबंध में रहने वाले याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई रिट या निर्देश जारी नहीं कर सकता है।&nbsp;</p>



<p><strong>अदालत ने ये भी कहा…</strong><br>बहरहाल, अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता परेशान हैं या उन्हें किसी प्रकार की हिंसा की आशंका है तो वे एक विस्तृत प्रार्थना पत्र देकर संबंधित पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकते हैं और संबंधित अधिकारी प्रार्थना पत्र की विषय वस्तु की जांच कर याचिकाकर्ताओं के जीवन की सुरक्षा के लिए कानून के मुताबिक आवश्यक कार्रवाई करेगा। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने अंजू और उसके पुरुष साथी द्वारा दायर याचिका निस्तारित कर दी जिसमें प्रतिवादियों को उनके ”शांतिपूर्ण जीवन” में दखल नहीं देने और सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि ”दोनों याचिकाकर्ता पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें अपनी जान का खतरा है।”&nbsp;</p>



<p><strong>‘निजी स्वतंत्रता का अधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं’</strong><br>राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि दोनों याचिकाकर्ता किसी अन्य व्यक्तियों के साथ विवाहित हैं और इन याचिकाकर्ताओं का साथ रहना ”अवैध” है क्योंकि इन्होंने अपने जीवन साथी से तलाक नहीं लिया है। इस पर अदालत ने कहा, ”ऐसी स्थिति में लिव-इन संबंध में होने का दावा करने वाले इन याचिकाकर्ताओं को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए सुरक्षा नहीं दी जा सकती।”&nbsp;</p>



<p>अदालत ने 20 मार्च को दिए अपने निर्णय में कहा, “दो वयस्क व्यक्तियों की निजी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को भी नहीं है और उनके माता पिता तक उनके संबंधों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन, स्वतंत्रता का अधिकार या निजी स्वतंत्रता का अधिकार अपने आप में पूर्ण नहीं है, बल्कि इस पर कुछ पाबंदियां भी लागू होती हैं।”&nbsp;</p>



<p><strong>‘एक पति या पत्नी को अपने जीवन साथी के साथ रहने का कानूनी अधिकार’</strong><br>अदालत ने कहा, “एक व्यक्ति की स्वतंत्रता वहां खत्म हो जाती है जहां दूसरे व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार प्रारंभ होता है। एक पति या पत्नी को अपने जीवन साथी के साथ रहने का कानूनी अधिकार है और निजी स्वतंत्रता के नाम पर उसे उसके इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।” अदालत ने कहा, “यह स्थापित कानून है कि कानून के उलट या दंडात्मक प्रावधान सहित एक कानूनी प्रावधान को विफल करने के लिए निर्देश जारी नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं को कानूनी रूप से सुरक्षा पाने के लिए निर्देश जारी करने की मांग करने का अधिकार नहीं है।”</p>
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		<title>यहां सपा कार्यालय खाली करने की नोटिस वापस, हाईकोर्ट ने निस्तारित की समाजवादी पार्टी की याचिका</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 23 Jan 2026 06:33:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तरप्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[लखनऊ]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="327" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020.png 737w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020-300x159.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020-310x165.png 310w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सीतापुर में समाजवादी पार्टी के कार्यालय को खाली कराने सम्बंधी नगर पालिका परिषद की नोटिस को चुनौती देने वाली सपा की याचिका निस्तारित कर दी। बृहस्पतिवार को सुनवाई के समय सीतापुर नगर पालिका परिषद के वकीलों ने नगर पालिका के कार्यकारी अधिकारी का 22 जनवरी का आदेश/ नोटिस, कोर्ट &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="327" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020.png 737w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020-300x159.png 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/01/Screenshot-2026-01-22-223020-310x165.png 310w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सीतापुर में समाजवादी पार्टी के कार्यालय को खाली कराने सम्बंधी नगर पालिका परिषद की नोटिस को चुनौती देने वाली सपा की याचिका निस्तारित कर दी। बृहस्पतिवार को सुनवाई के समय सीतापुर नगर पालिका परिषद के वकीलों ने नगर पालिका के कार्यकारी अधिकारी का 22 जनवरी का आदेश/ नोटिस, कोर्ट के समक्ष पेश किया।</p>



<p>इसमें कहा गया था कि याचिका में चुनौती दिए गए 7 जनवरी के आदेश/ नोटिस को यह कहकर वापस ले लिया गया है कि समुचित नियमों के तहत करवाई की जाएगी। इसपर, कोर्ट ने कहा कि मामले में कोई नई कारवाई होने पर, याची को इसे चुनौती देने की छूट होगी। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका निस्तारित कर दी।</p>



<p>न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश समाजवादी पार्टी की याचिका पर दिया। याची की ओर से दलील दी गई थी कि नोटिस के अनुसार टाउन हॉल प्रांगण में जिस जमीन पर सपा कार्यालय बना हुआ है, वह नजूल की भूमि है।</p>



<p>15 जनवरी 2005 को इस भूमि को पार्टी कार्यालय के लिए आवंटित किया गया था, हालांकि, आवंटन के चार महीने बाद ही 14 मई 2005 को इसका आवंटन निरस्त भी कर दिया गया था। दलील दी गई कि नोटिस तथ्यात्मक तौर पर पूरी तरह से गलत है, क्योंकि वर्ष 2005 में नगर पालिका अध्यक्ष की ओर से 90 साल के पट्टे पर यह जमीन पार्टी कार्यालय बनाने के लिए दी गई थी।</p>



<p>सपा कार्यालय 90 साल के लीज डीड के आधार पर बना है न कि 15 जनवरी 2005 के आवंटन के आधार पर। यह भी कहा गया था कि यदि 90 साल की लीज डीड निरस्त करनी है तो याची पक्ष को उसकी नोटिस तामील करायी जानी चाहिए। वहीं, नगर पालिका की ओर से पेश वकील का कहना था कि उन्हें याची पक्ष की ओर से किए गए इस दावे के संबंध में निर्देश( जानकारी) प्राप्त करने के लिए समय चाहिए। इस पर कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 22 जनवरी को निर्धारित की थी।</p>
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		<title>यूपी: श्रावस्ती के बंद किए गए 30 मदरसों को खोलने का हाईकोर्ट ने दिया आदेश</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 Aug 2025 04:42:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तरप्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="351" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19.jpg 814w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-768x436.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती में बंद करवाए गए 30 मदरसों को फिर से खोलने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अफसर तय प्रक्रिया का पालन कर नए आदेश पारित कर सकते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती जिले के सील किए गए करीब 30 मदरसों की सील तुरंत &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="351" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19.jpg 814w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/65-19-768x436.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती में बंद करवाए गए 30 मदरसों को फिर से खोलने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अफसर तय प्रक्रिया का पालन कर नए आदेश पारित कर सकते हैं।</p>



<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने श्रावस्ती जिले के सील किए गए करीब 30 मदरसों की सील तुरंत खोलने का आदेश अफसरों को दिया है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने बृहस्पतिवार को यह आदेश मदरसों की ओर से दाखिल याचिकाओं के समूह पर दिया। याचियों के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत चंद्रा ने बताया कि इन मदरसों को बंद करने के लिए सरकार द्वारा जारी नोटिसों को याचिकाओं में चुनौती दी थी।</p>



<p>याचियों के अधिवक्ता का कहना था कि बगैर दिमाग लगाए जारी इन नोटिसों को न तो याचियों पर ठीक से तामील किया गया और न ही याचियों को सुनवाई का मौका दिया गया। उधर, राज्य सरकार के वकील ने याचिकाओं का विरोध किया। याचियों के अधिवक्ता ने बताया कि जहां, कोर्ट ने पहले बीती जून में इस मामले में अंतरिम राहत दी थी वहीं अब टिप्पणी की है कि ऐसे में इन मदरसों को बंद नहीं किया जा सकता।</p>



<p><strong>कोर्ट ने कहा… प्रक्रिया का पालन कर नया आदेश दे सकते हैं अफसर</strong><br>कोर्ट ने मदरसों को पुनः खोलने का आदेश देकर अफसरों को यह छूट भी दी है कि वे तय प्रक्रिया का पालन करने और मदरसों को सुनवाई का मौका देकर मामले में नए आदेश पारित कर सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>यूपी: हाईकोर्ट का अहम फैसला &#8211; अब दो के बजाय एक जमानतदार पर भी मिलेगी रिहाई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Aug 2025 06:54:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इलाहाबाद]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तरप्रदेश]]></category>
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		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="349" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16.jpg 808w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-768x433.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में दो के बजाए एक जमानतदार के होने पर भी कैदी को जेल से रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कई ऐसे संज्ञान में आए हैं कि धनाभाव के चलते तमाम कैदी दो जमानदार की व्यवस्था न कर पाने के कारण लंबे समय तक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="349" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16.jpg 808w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/56-16-768x433.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में दो के बजाए एक जमानतदार के होने पर भी कैदी को जेल से रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कई ऐसे संज्ञान में आए हैं कि धनाभाव के चलते तमाम कैदी दो जमानदार की व्यवस्था न कर पाने के कारण लंबे समय तक जेल में बंद रहते हैं।</p>



<p>अब दो के बजाय एक जमानतदार से भी रिहाई मिलेगी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामाजिक और आर्थिक स्थिति की वजह से दो जमानतदारों की व्यवस्था नहीं कर पाने पर कई वर्षों से जेल में बंद रहने के कई मामलों का संज्ञान लेकर यह फैसला दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने गोरखपुर की बच्ची देवी की अर्जी पर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि मजिस्ट्रेट या संबंधित न्यायालय आरोपी की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को देखते हुए संतुष्टि पर अब दो के बजाय केवल एक ही जमानतदार पर जमानत स्वीकृत करें। साथ ही जमानत बॉन्ड राशि आरोपी की वित्तीय क्षमता के अनुसार तय की जाए।</p>



<p>कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि कोई अभियुक्त सात दिनों के भीतर जमानती पेश नहीं कर पाता है तो जेल अधीक्षक को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को सूचित करना होगा। इसके बाद उसकी रिहाई के लिए एक वकील की व्यवस्था की जाएगी, ताकि वह बाहर आ सके। अगर किसी अभियुक्त पर कई राज्यों में कई मामले दर्ज हैं तो अदालत गिरीश गांधी बनाम भारत संघ के मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार उसे तुरंत रिहा करेगी।</p>



<p>कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वह मुख्य न्यायाधीश के समक्ष इस आदेश की एक प्रति रखें ताकि नए दिशानिर्देश जारी करने पर विचार किया जा सके। साथ ही कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि इस आदेश की एक प्रति सभी जिला न्यायाधीशों, पुलिस महानिदेशक, अपर महानिदेशक (अभियोजन) और निदेशक, न्यायिक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान, लखनऊ को भेजी जाए। इन अधिकारियों को सुनिश्चित करना होगा कि यह निर्देश प्रभावी ढंग से लागू हो।</p>



<p><strong>बिना गिरफ्तारी चार्जशीट वाले आरोपियों को जेल भेजने पर रोक<br></strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने उन आरोपियों को सीधे न्यायिक हिरासत (जेल) में भेजने पर रोक लगा दी है जिन्हें पुलिस ने जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया था। साथ ही निर्देश दिया कि यदि आरोप पत्र गिरफ्तारी के बिना दायर किया गया है तो ट्रायल कोर्ट अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में भेजने के बजाय सीधे जमानत बॉन्ड पर रिहा कर सकता है। अभियुक्त को अलग से जमानत आवेदन दायर करने की आवश्यकता नहीं होगी।</p>



<p><strong>गिरीश गांधी बनाम भारत संघ का मामला<br></strong>गिरीश गांधी पर 13 अलग-अलग मुकदमे दर्ज थे। सभी में जमानत मिल गई लेकिन वह केवल दो जोड़ी जमानतदार ही ला पाया। बाकी मुकदमों के लिए 22 अन्य जमानतदार नहीं ला पाया और उसे जेल में ही रहना पड़ा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 13 मुकदमों में दो जोड़ी जमानतदार पर ही रिहा करने का आदेश दिया।</p>



<p><strong>याची बच्ची देवी को भी मिली राहत</strong><br>गोरखपुर के शांति नगर के बिछिया में याची की कृष्णा हार्डवेयर पेंट्स सेंटर नाम से दुकान है। अधिकृत कंपनी के अधिकारियों के निरीक्षण के दौरान उनकी दुकान से नकली एशियन पेंट्स बरामद हुआ था। 2021 में उन पर धोखाधड़ी, कॉपीराइट अधिनियम सहित कई आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया। चार्जशीट का संज्ञान लेकर ट्रायल कोर्ट ने समन आदेश जारी किया था। याची ने समस्त कार्यवाही को रद्द करने की मांग कर हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होकर बेल बॉन्ड भरने का आदेश दिया। साथ ही कहा कि जब तक विशेष परिस्थितियां न हो हिरासत में न लिया जाए।</p>
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		<title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा-रिश्ते प्रमाण के मोहताज नहीं, पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Aug 2025 05:50:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इलाहाबाद]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तरप्रदेश]]></category>
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		<category><![CDATA[इलाहाबाद हाईकोर्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="351" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5.jpg 812w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-768x436.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो भरण-पोषण का हक बनता है। लिहाजा, भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण के मामले में पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी है। पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="351" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-large.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5.jpg 812w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-medium.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2025/08/456-5-768x436.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो भरण-पोषण का हक बनता है। लिहाजा, भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है।</p>



<p>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण के मामले में पत्नी की परिभाषा दस्तावेज से बड़ी है। पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं तो भरण-पोषण का हक बनता है। लिहाजा, भरण-पोषण के लिए विवाह को साबित करना जरूरी नहीं है। कानून का मकसद न्याय है न कि ऐसे रिश्तों को नकारना जो समाज में पति-पत्नी की तरह माने जाते है।</p>



<p>इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की अदालत ने देवरिया निवासी याची की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय का आदेश रद्द कर नए सिरे से मामले की सुनवाई करने के लिए वापस भेज दिया। साथ ही कांस्टेबल पति को मामले के निस्तारण होने तक याची को 8,000 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया है।</p>



<p>याची ने 2017 में पति के निधन के बाद कांस्टेबल देवर संग शादी होने का दावा किया है। देवरिया के पारिवारिक न्यायालय में आरोप लगाया कि हिंदू रीति से विवाह होने के बाद देवर दहेज की मांग करने लगा। साथ ही दूसरी शादी रचा ली और उसे व बच्चों को घर से निकाल दिया। वहीं, विपक्षी ने शादी होने से इन्कार कर दिया।</p>



<p>इस पर पारिवारिक न्यायालय ने याची की भरण-पाेषण की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह वैध शादी के प्रमाण नहीं दे सकी। लिहाजा, वह विपक्षी की पत्नी नहीं है। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने आधार कार्ड, बैंक रिकॉर्ड और गवाहों के बयान पेश कर दलील दी कि दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे हैं। पहले पति की मृत्यु के बाद दूसरी शादी वैध है।</p>



<p>दूसरा पति यूपी पुलिस में कांस्टेबल है, वेतन के अलावा खेती से भी उसकी आमदनी है जबकि याची बेसहारा है। लिहाजा, वह भरण-पोषण की हकदार है। विपक्षी के अधिवक्ता ने दलील दी कि वे कभी शादीशुदा नहीं थे, बच्चे भाई की संतान हैं और याची पैतृक संपत्ति से पहले ही लाभ ले रही है। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। कहा कि अदालत ने विवाह का प्रमाण न होने के तकनीकी आधार पर अर्जी खारिज कर कानूनी व तथ्यात्मक गलती की है।</p>
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