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	<title>अमेरिका के हाथ खाली &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>अमेरिका के हाथ खाली, खरबों डॉलर गंवाने के बाद भी, भागना पड़ेगा रूस की तरह</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Hema Bisht]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Aug 2019 06:27:42 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[अन्तर्राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका के हाथ खाली]]></category>
		<category><![CDATA[खरबों डॉलर गंवाने के बाद भी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="251" height="201" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/images-2019-08-04T115527.009.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" />अफगानिस्&#x200d;तान दक्षिण एशिया का वो देश है जहां के लोग वर्षों से शांति और स्थिरता की बाट जोह रहे हैं। यहां पर पहले रूस और उसके बाद अमेरिका ने काफी तबाही मचाई। इसके बाद भी ये यहां से कुछ हासिल नहीं कर सके। आलम ये है कि रूस को यहां से मुंह छिपाकर भागना पड़ा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="251" height="201" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/images-2019-08-04T115527.009.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" /><p><strong>अफगानिस्&#x200d;तान दक्षिण एशिया का वो देश है जहां के लोग वर्षों से शांति और स्थिरता की बाट जोह रहे हैं। यहां पर पहले रूस और उसके बाद अमेरिका ने काफी तबाही मचाई। इसके बाद भी ये यहां से कुछ हासिल नहीं कर सके। आलम ये है कि रूस को यहां से मुंह छिपाकर भागना पड़ा था।</strong></p>
<p><img decoding="async" class=" wp-image-262058 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/images-2019-08-04T115527.009.jpg" alt="" width="500" height="400" /></p>
<p><strong>रूस के जाने के बाद यहां पर तालिबान ने अपने पैर पसारने शुरू किए। इसकी वजह से भी यहां पर अशांति छाई रही। तालिबान ने यहां पर अपनी सरकार तक बनाई। इसको हटाने के नाम पर अमेरिका ने यहां पर अपनी पैठ बढ़ाई और अब वो भी अपनी वापसी के बहाने तलाश रहा है। कुल मिलाकर अफगानिस्&#x200d;तान में जो देश आया उसको खोने के अलावा और कुछ हासिल नहीं कर सका।</strong></p>
<p><strong>अफगानिस्&#x200d;तान की राजनीतिक और आर्थिक उठापठक के बीच रूस और अमेरिका दोनों ही जिम्&#x200d;मेदार रहे हैं।वर्तमान की बात करें तो यहां पर नाटो सेनाओं के हाथों इसी वर्ष में अब तक तालिबान से ज्&#x200d;यादा आम नागरिक मारे गए हैं। यूएन मिशन की रिपोर्ट के मुताबिक नाटो सेनाओं द्वारा यहां पर की गई एयर स्&#x200d;ट्राइक और आतंकियों के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन के दौरान पिछले छह माह में 717 आम नागरिकों की मौत हुई हैं।</strong></p>
<p><img decoding="async" class=" wp-image-262059 aligncenter" src="http://www.livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/2018_12image_10_29_037808610afgan-ll-1-1-300x200.jpg" alt="" width="518" height="345" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/2018_12image_10_29_037808610afgan-ll-1-1-300x200.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/2018_12image_10_29_037808610afgan-ll-1-1-310x205.jpg 310w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2019/08/2018_12image_10_29_037808610afgan-ll-1-1.jpg 600w" sizes="(max-width: 518px) 100vw, 518px" /></p>
<p><strong>इनमें से 403 लोगो की मौत अफगान सेना और 314 की मौत नाटो सेना के हाथों हुई हैं। वहीं इन ऑपरेशंस में महज 531 तालीबानी आतंकी मारे गए हैं। ये आंकड़ा पिछले वर्ष जनवरी-जून में हुई मौतों से करीब 43 फीसद कम है। इस वर्ष जनवरी से जून तक के बीच 20 अमेरिकी सैनिक भी यहां पर मारे जा चुके हैं।</strong></p>
<p><strong>अफगानिस्&#x200d;तान में नाटो के करीब 13 हजार जवान तैनात हैं जिनमें से 9800 अकेले अमेरिका से ही हैं। बराक ओबामा ने यहां पर जवानों की तैनाती बढ़ाई थी जबकि मौजूदा राष्&#x200d;ट्रपति ने अपने कार्यकाल में इसको कम किया है। अफगान सेना को अमेरिकी सेना प्रशिक्षित कर रही है। यह प्रशिक्षण अमेरिका की उस भावी रणनीति का हिस्&#x200d;सा है जिसके तहत वह यहां से निकल जाएगा और अफगानिस्&#x200d;तान को इन सुरक्षाबलों के हवाले कर दिया जाएगा।</strong></p>
<p><strong>तालिबान की बात चली है तो यहां पर ये भी जान लेना जरूरी होगा कि अमेरिका की पैरवी पर अफगा&#x200d;न-तालिबान शांति वार्ता के कई दौर हो चुके हैं। यह वार्ता अब तक अपने निर्णायक दौर में नहीं पहुंची है। इतना ही नहीं इस वार्ता में अफगानिस्&#x200d;तान सरकार का कोई नुमांइदा नहीं है। इसके अलावा तालिबान ने भी अफगानिस्&#x200d;तान से सीधी बात करने से इंकार कर दिया है।</strong></p>
<p><strong> उसका कहना है कि जब तक इस शांति वार्ता से कुछ सकारात्&#x200d;मक नहीं निकलता है तब तक वह अफगान सरकार से कोई बातचीत नहीं करेगा। वहीं दूसरी तरफ तालिबान ने सीजफायर करने से भी इनकार कर दिया है।</strong></p>
<p><strong>अमेरिका ने इस वार्ता की शुरुआत की है, लेकिन इसके पीछे भी मकसद उसका यहां से निकलना ही है। करीब दो दशकों से जारी जंग में अमेरिका यहां पर खरबों डॉलर बर्बाद कर चुका है। इस दौरान उसके कई जवानों को भी जान से हाथ धोना पड़ा या स्&#x200d;थायी दिव्&#x200d;यांगता का शिकार होना पड़ा है। अमेरिकी राष्&#x200d;ट्रपति ने अपने बयानों और और विभिन्&#x200d;न रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया है। राष्&#x200d;ट्रपति ट्रंप खुद कई बार इस बात को सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि अमेरिका को अफगानिस्&#x200d;तान में सिवाय नुकसान के कुछ और नहीं मिला है। </strong></p>
<p><strong>70 के दशक में यहां पर सोवियत संघ ने हमले करने के बाद इसके कुछ इलाकों पर कब्&#x200d;जा भी कर लिया था। इसको यहां से निकालने के लिए अमेरिका ने पाकिस्&#x200d;तान के साथ मिलकर तालिबान का गठन किया। इसमें शामिल लोगों को अमेरिका ने न सिर्फ प्रशिक्षण दिया बल्कि उन्&#x200d;हें हथियार भी सप्&#x200d;लाई किए। </strong></p>
<p><strong>ता&#x200d;लिबान को अमेरिका ने आर्थिक मदद भी दी। अमेरिका की इस मुहिम में चीन समेत सऊदी अरब भी शामिल था। यहां पर अमेरिका की चाल काम कर गई और रूस को यहां से उलटे पांव भागना पड़ा। अमेरिका को उस वक्&#x200d;त तक इस बात का अंदेशा नहीं था कि यही तालिबान कभी उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगा।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>रूस को यहां से खदेड़े जाने के बाद 80 के दशक के अंत तक तालिबान को स्&#x200d;थानीय लोगों का समर्थन भी हासिल हो चुका था। तालिबान ने यहां के कई इलाकों को अपने कब्&#x200d;जे में ले लिया। अबतक वह अलकायदा के साथ मिलकर अमेरिका को भी टक्&#x200d;कर देने लायक हो चुका था। जिस वक्&#x200d;त तालिबान ने अफगानिस्&#x200d;तान में अपनी सरकार का गठन किया उस वक्&#x200d;त उसको सऊदी अरब का भी समर्थन मिला था। तालिबान ने यहां पर अपने कानून लागू किए।</strong></p>
<p><strong> 1998 आते-आते लगभग काबुल समेत 90 फीसद अफगानिस्&#x200d;तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था। 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने यहां पर तालिबान और अलकायदा को खत्&#x200d;म करने की जो मुहिम चालू की उसमें उसके खरबों डॉलर स्&#x200d;वाह हो गए। इसके बाद भी उसको कुछ हाथ नहीं लगा। अफगान-तालिबान वार्ता इसका सीधा सा उदाहरण है।</strong></p>
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