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	<title>जीवनशैली &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>जीवनशैली &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>फिटनेस ही नहीं, दिमागी क्षमता भी बढ़ाती है साइकिलिंग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 May 2026 05:12:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[साइकिलिंग]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU.jpg 781w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU-300x143.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU-768x365.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />बचपन में या फिटनेस के लिए हम सभी ने कभी न कभी साइकिल जरूर चलाई होगी और इसे एक बेहतरीन व्यायाम भी माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि साइकिल चलाने का फायदा सिर्फ आपके शरीर तक ही सीमित नहीं है? हाल ही में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="294" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU.jpg 781w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU-300x143.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/JGYUFYU-768x365.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>बचपन में या फिटनेस के लिए हम सभी ने कभी न कभी साइकिल जरूर चलाई होगी और इसे एक बेहतरीन व्यायाम भी माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि साइकिल चलाने का फायदा सिर्फ आपके शरीर तक ही सीमित नहीं है?</p>



<p>हाल ही में हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन से पता चला है कि साइकिल चलाना आपके मस्तिष्क को स्वस्थ रखने, मूड को बेहतर बनाने और आपके सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का एक बेहद सुलभ और शानदार तरीका हो सकता है। आइए जानते हैं कि इस दिलचस्प शोध में और क्या-क्या बातें सामने आई हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading">किसने किया यह शोध और क्यों?</h3>



<p>आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों का मकसद एक ऐसे सस्ते और असरदार तरीके की पहचान करना था, जो इन समस्याओं से निपटने में मददगार साबित हो।</p>



<p>यह महत्वपूर्ण शोध अमेरिका की गैर-लाभकारी संस्था &#8216;आउटराइड&#8217;, ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय और लोमा लिंडा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है।</p>



<p><strong>इस सटीक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने बहुत व्यापक स्तर पर काम किया:</strong></p>



<p>उन्होंने 19 देशों के डेटा को खंगाला, जिनमें अमेरिका, कनाडा और कई यूरोपीय देश शामिल हैं।<br>इन देशों में किए गए लगभग 90 अलग-अलग अध्ययनों की बारीकी से समीक्षा की गई।<br>यह पूरी रिसर्च मशहूर पत्रिका &#8216;फ्रंटियर्स इन स्पोर्ट्स एंड एक्टिव लिविंग&#8217; में प्रकाशित की गई है।</p>



<p><br><strong>दिमाग और मूड पर कैसे होता है असर?<br></strong>शोध के नतीजे बेहद सकारात्मक हैं। विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि साइकिलिंग का सीधा और सकारात्मक असर हमारे दिमाग के काम करने के तरीके पर पड़ता है।</p>



<p><strong>अध्ययन में साइकिल चलाने के ये प्रमुख फायदे बताए गए हैं:</strong></p>



<p>तेज प्रतिक्रिया और फोकस: साइकिल चलाने से लोगों का &#8216;रिएक्शन टाइम&#8217; बेहतर होता है और किसी भी काम में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है।<br>दिमागी क्षमता में सुधार: इससे संज्ञानात्मक प्रदर्शन से जुड़े मस्तिष्क के कार्य बेहतर होते हैं।<br>तनाव और अवसाद से दूरी: इसका नियमित अभ्यास मूड को अच्छा बनाता है और डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में भी मदद करता है।<br>बेहतर सामाजिक जीवन: साइकिलिंग को सामाजिक संबंधों में वृद्धि करने और समग्र कल्याण में सुधार से भी जोड़ा गया है।</p>



<p><strong>आगे क्या हैं संभावनाएं?<br></strong>हालांकि, इस शोध ने साइकिल चलाने के कई बेहतरीन फायदों पर मुहर लगाई है, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इस दिशा में अभी और काम करने की जरूरत है। उनका सुझाव है कि भविष्य में युवाओं, बुजुर्गों और ऐसे समुदायों के बीच जो अभी भी इन सुविधाओं की पहुंच से दूर हैं, वहां और अधिक रिसर्च की जानी चाहिए।</p>



<p>कुल मिलाकर, यह अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि साइकिल चलाना खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रखने का एक बेहद सुलभ, कम लागत वाला और प्रभावी जरिया है।</p>
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		<item>
		<title>भारत में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित 13% महिलाओं में फैला &#8216;मेटास्टेसिस&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 25 May 2026 05:21:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="272" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui.jpg 803w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui-300x132.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui-768x339.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />भारत में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक बेहद अहम रिपोर्ट सामने आई है। इस हालिया अध्ययन के मुताबिक, देश में स्तन कैंसर से जूझ रही करीब 13 फीसदी महिलाओं में &#8216;मेटास्टेसिस&#8217; की समस्या पाई गई है। आसान भाषा में समझें तो मेटास्टेसिस का मतलब है कि कैंसर अपनी मूल जगह से निकलकर शरीर के दूसरे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="272" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui.jpg 803w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui-300x132.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jhgyui-768x339.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>भारत में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर एक बेहद अहम रिपोर्ट सामने आई है। इस हालिया अध्ययन के मुताबिक, देश में स्तन कैंसर से जूझ रही करीब 13 फीसदी महिलाओं में &#8216;मेटास्टेसिस&#8217; की समस्या पाई गई है। आसान भाषा में समझें तो मेटास्टेसिस का मतलब है कि कैंसर अपनी मूल जगह से निकलकर शरीर के दूसरे अंगों तक फैल चुका है। इस स्टडी के जरिए इस गंभीर बीमारी से जुड़े कई अहम तथ्य सामने आए हैं। आइए जानते हैं रिपोर्ट की मुख्य बातें।</p>



<h3 class="wp-block-heading">76 हजार से ज्यादा महिलाओं के डेटा पर हुई स्टडी</h3>



<p>यह महत्वपूर्ण रिसर्च जानी-मानी मेडिकल पत्रिका &#8216;द लैंसेट रीजनल हेल्थ साउथईस्ट एशिया&#8217; में प्रकाशित हुई है। इस अध्ययन में कुल 76,356 महिलाओं के स्वास्थ्य आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया गया, जिनमें से 12.96 प्रतिशत में मेटास्टेसिस की पुष्टि हुई।</p>



<p>ये आंकड़े भारत के &#8216;राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम&#8217; के तहत जुटाए गए थे। इस रिसर्च में मुख्य रूप से उन महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनमें साल 2009 से लेकर 2020 के बीच पहली बार स्तन कैंसर की पहचान हुई थी।</p>



<p><strong>हड्डियों में फैलने का सबसे ज्यादा खतरा<br></strong>स्टडी में एक और जरूरी जानकारी निकलकर सामने आई है कि जब स्तन कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैलता है, तो इसका सबसे आम ठिकाना हड्डियां होती हैं। रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, मेटास्टेसिस के कुल मामलों में से 25.1 प्रतिशत हिस्सेदारी हड्डियों की पाई गई।</p>



<p><strong>हाल के सालों में बढ़ा है जोखिम<br></strong>शोधकर्ताओं की टीम ने समय के साथ बीमारी के रुझान में भी बदलाव देखा। उन्होंने पाया कि 2009-2014 की तुलना में, 2015 से 2020 के बीच सामने आए मामलों में कैंसर के फैलने का जोखिम काफी अधिक था।</p>



<p>भारत में मेटास्टेटिक स्तन कैंसर का सीधा संबंध मुख्य रूप से ट्यूमर के भार और बीमारी के तेजी से बढ़ने के संकेतों से पाया गया है। हालांकि, रिसर्च टीम ने इस बात पर भी जोर दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर मेटास्टेटिक स्तन कैंसर से जुड़े कारकों के व्यापक और पुख्ता सबूत अभी भी काफी सीमित हैं।</p>



<p><strong>उम्र से नहीं, ट्यूमर की बनावट से है सीधा संबंध<br></strong>अक्सर माना जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ कैंसर का खतरा बदलता है, लेकिन इस स्टडी ने इस बात को स्पष्ट किया है कि मेटास्टेसिस का मरीज की उम्र से कोई खास संबंध नहीं है। शोध के नतीजे बताते हैं कि कैंसर के शरीर में फैलने का जोखिम मरीज की उम्र पर नहीं, बल्कि मुख्य रूप से ट्यूमर की जैविक बनावट पर निर्भर करता है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>एनीमिया के इलाज में फोलिक एसिड जितनी ही कारगर हैं ये आयुर्वेदिक दवाएं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 04:47:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[एनीमिया]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="436" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj.jpg 629w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj-300x212.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से किए गए बहु केंद्रित क्लिनिकल परीक्षण में पाया गया है कि आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली दो आयुर्वेदिक औषधियां मध्यम एनीमिया वाली महिलाओं में म आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="436" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj.jpg 629w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/ykhj-300x212.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से किए गए बहु केंद्रित क्लिनिकल परीक्षण में पाया गया है कि आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के उपचार के लिए उपयोग की जाने वाली दो आयुर्वेदिक औषधियां मध्यम एनीमिया वाली महिलाओं में म आयरन फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के समान प्रभावी हैं। फेज- 3 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (आरसीटी) के नतीजे 20 मई को आरसीएमआर द्वारा आयोजित &#8220;पहला आइसीएमआर वार्षिक क्लिनिकल ट्रायल मीट 2026 &#8221; के दौरान पेश किए गए।</p>



<p><strong>समान रूप से प्रभावी<br></strong>केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इस अध्ययन में आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया के इलाज में आयुर्वेदिक दवाओं अकेले पुनर्नवाड़ी मंडूर और द्राक्षावलेह के साथ मिलाकर प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया। भारत में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक बड़ी जन स्वास्थ्य समस्या है। इस अध्ययन में इन आयुर्वेदिक दवाओं की तुलना पारंपरिक आयरन फोलिक एसिड थेरेपी से की गई। यह परीक्षण लगभग 4,000 गैर &#8211; गर्भवती महिलाओं के बीच किया गया, जो 18- 49 आयु वर्ग में मध्यम एनीमिया से ग्रस्त थीं।</p>



<p>शोधकर्ताओं ने 90 दिनों की अवधि में हीमोग्लोबिन स्तर और अन्य क्लिनिकल परिणामों का मूल्यांकन किया। बयान में यह कहा गया कि निष्कर्षों ने यह दर्शाया कि दोनों आयुर्वेदिक हस्तक्षेप मानक आयरनफोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन के समान प्रभावी थे। राष्ट्रीय स्तर की इस बैठक में नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, शोधकर्ताओं, नियामक प्राधिकरणों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एकत्रित किया गया, ताकि भारत के क्लिनिकल परीक्षण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और साक्ष्य-आधारित समग्र चिकित्सा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर चर्चा की जा सके। कार्यक्रम में आइसीएमआर के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल व केंद्रीय आयुष सचिव राजेश कोटेचा सहित स्वास्थ्य और विज्ञानी समुदाय के विशेषज्ञों व हितधारकों ने भाग लिया।</p>



<p>आइसीएमआर और सेंट्रल काउंसिल फार रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज द्वारा मल्टीसेंट्रिक क्लिनिकल ट्रायल में पता चला<br>यह परीक्षण 18-49 आयु वर्ग की 4,000 ऐसी गैर गर्भवती महिलाओं पर किया गया, जो एनीमिया से पीड़ित थीं</p>



<p><br><strong>37 विशेषज्ञों के साथ विकसित की गई रिपोर्ट<br></strong>गणमान्य व्यक्तियों ने उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने और स्वास्थ्य सेवा वितरण को सुदृढ़ बनाने के लिए मजबूत क्लिनिकल अनुसंधान प्रणालियों, नैतिक शासन और एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल पद्धतियों के वैज्ञानिक सत्यापन के महत्व पर ज़ोर दिया। इस कार्यक्रम के दौरान आइसीएमआर ने &#8220;भारत में &#8216;फर्स्ट-इन- ह्यूमन&#8217; फेज 1 क्लिनिकल परीक्षणों को आगे बढ़ानाः विनियामक मार्गों और अवसरों पर एक डेल्फी अध्ययन&#8221; शीर्षक से एक रिपोर्ट भी जारी की।</p>



<p>यह रिपोर्ट फार्मास्यूटिकल उद्योग, अनुबंध अनुसंधान संगठनों, अकादमिक संस्थानों और राष्ट्रीय नियामक एजेंसियों के 37 विशेषज्ञों के साथ दो दौर की परामर्श के माध्यम से विकसित की गई थी, जिसमें भारत में प्रारंभिक चरण के क्लिनिकल परीक्षणों को आगे बढ़ाने में बाधाओं की पहचान की गई।</p>



<p>रिपोर्ट ने नियामक क्षमता को मजबूत करने, अनुमोदन तंत्र को सरल बनाने और एजेंसियों के बीच समन्वय में सुधार करने की सिफारिश की । इस कार्यक्रम में भारत में बहु केंद्र अनुसंधान के लिए एकल नैतिक समीक्षा के संचालन संबंधी दिशानिर्देश &#8221; भी जारी किए गए, जिसका उद्देश्य देश भर में बहु-केंद्र अध्ययनों के लिए नैतिक समीक्षा तंत्र को समन्वयित करना है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>लू से बचने के लिए जानें क्या खाएं और किन चीजों से करें परहेज</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 May 2026 05:27:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="336" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu.jpg 635w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu-300x163.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />उत्तर भारत में जेठ के महीने में जब गर्मी अपने प्रचंड रूप में होती है, तब शुरू होता है नौतपा। यह साल के वे 9 दिन होते हैं जब गर्मी अपने चरम पर होती है। इस साल नौतपा 25 मई से शुरू होगा और 2 जून तक चलेगा। इस दौरान चलने वाली तेज लू और &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="336" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu.jpg 635w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/utourtu-300x163.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>उत्तर भारत में जेठ के महीने में जब गर्मी अपने प्रचंड रूप में होती है, तब शुरू होता है नौतपा। यह साल के वे 9 दिन होते हैं जब गर्मी अपने चरम पर होती है। इस साल नौतपा 25 मई से शुरू होगा और 2 जून तक चलेगा। इस दौरान चलने वाली तेज लू और झुलसा देने वाली धूप सीधे हमारे शरीर पर असर डालती है।&nbsp;</p>



<p>ज्यादा पसीने के कारण शरीर से पानी और जरूरी मिनरल्स तेजी से बाहर निकल जाते हैं, जिससे डिहाइड्रेशन, कमजोरी, सिरदर्द और पाचन संबंधी परेशानियां आम हो जाती हैं। इस भीषण गर्मी से बचने और खुद को अंदर से ठंडा रखने के लिए हमारी डाइट का सही होना बेहद जरूरी है।</p>



<p>आइए&nbsp;<em><strong>डायटीशियन निधि सहाई</strong></em>&nbsp;(डिपार्टमेंट हेड डायटिक्स, मेदांता हॉस्पिटल, नोएडा) से जानते हैं कि नौतपा के दौरान हमारी थाली में किन-किन चीजों को शामिल करना चाहिए और किन चीजों से परहेज करना चाहिए।</p>



<h3 class="wp-block-heading">नौतपा के दौरान क्या खाना चाहिए?</h3>



<p>नौतपा के दौरान खाने का सबसे पहला नियम है कि ऐसा खाना खाएं, जो पचाने में हल्का हो और जिसमें पानी की भरपूर मात्रा हो।&nbsp;</p>



<h3 class="wp-block-heading">पानी से भरपूर मौसमी फल और सब्जियां</h3>



<p>प्रकृति हमें मौसम के हिसाब से ही फल देती है। इन दिनों अपनी डाइट में तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और संतरा जैसी चीजें जरूर शामिल करें। इनमें 90% से ज्यादा पानी होता है, जो शरीर में फ्लूइड बैलेंस बनाए रखता है। सब्जियों में लौकी, तोरई, कद्दू और टिंडा जैसी हरी सब्जियां खाएं, जो पेट के लिए हल्की होती हैं।</p>



<p><strong>देसी ड्रिंक्स<br></strong>बाजार के पैक्ड जूस या कोल्ड ड्रिंक्स के बजाय घर के बने पारंपरिक ड्रिंक्स को डाइट में शामिल करें।</p>



<p>छाछ और दही- दोपहर के खाने में एक गिलास पुदीने और भुने जीरे वाली छाछ या एक कटोरी दही अमृत से कम नहीं है। यह पेट में गुड बैक्टीरिया को बढ़ाती है और पाचन दुरुस्त रखती है।<br>आम पन्ना- कच्चे आम का पन्ना लू से बचाने का अचूक इलाज है।<br>सत्तू का शरबत- चने का सत्तू न सिर्फ शरीर को तुरंत ठंडक देता है, बल्कि लंबे समय तक एनर्जी भी बनाए रखता है।<br>नारियल पानी और नींबू पानी- यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को तुरंत पूरा करते हैं।</p>



<p><strong>हल्का और आसानी से पचने वाला खाना<br></strong>दोपहर और रात के खाने में भारी खाने की जगह सादा और हल्का खाना खाएं। मूंग दाल की खिचड़ी, दाल-चावल, दलिया या पतली रोटी और हरी सब्जी सबसे अच्छे ऑप्शन हैं।</p>



<p><strong>नौतपा में किन चीजों से करें परहेज?<br></strong>गर्मी के दिनों में कुछ चीजें हमारे शरीर का तापमान और बढ़ा देती हैं और पाचन तंत्र को धीमा कर देती हैं।</p>



<p>ज्यादा मसालेदार और तला-भुना खाना- मिर्च-मसाले, समोसे, कचोरी और प्रोसेस्ड फूड पचाने में भारी होते हैं। ये पेट में एसिडिटी और गर्मी बढ़ाते हैं, जिससे आप दिनभर सुस्त और थका हुआ महसूस कर सकते हैं।<br>चाय और कॉफी- चाय और कॉफी में कैफीन होता है, जो डाईयूरेटिक का काम करता है। इससे बार-बार पेशाब आता है और शरीर में पानी की कमी हो सकती है।<br>ज्यादा मीठी चीजें और शराब- ज्यादा चीनी वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स और अल्कोहल भी डिहाइड्रेशन को बढ़ावा देते हैं।<br>बासी और खुला हुआ खाना- गर्मियों में तेज तापमान के कारण बैक्टीरिया बहुत जल्दी पनपते हैं, जिससे खाना जल्दी खराब हो जाता है। इसलिए फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए हमेशा ताजा बना भोजन ही खाएं।</p>



<p><strong>नौतपा के लिए जरूरी टिप<br></strong>नौतपा के दौरान प्यास लगने का इंतजार न करें। हर आधे-एक घंटे में थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहें। दोपहर 12 से शाम 4 बजे के बीच, जब धूप सबसे तेज होती है, बहुत जरूरी न हो तो घर से बाहर निकलने से बचें। सही खान-पान अपनाकर आप नौतपा की इस भीषण गर्मी को भी सेहतमंद रहकर आसानी से मात दे सकते हैं।</p>
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		<title>कैसे मॉडर्न लाइफस्टाइल युवाओं के दिमाग को कर रही है खोखला?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 05:04:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
		<category><![CDATA[मॉडर्न लाइफस्टाइल]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="353" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg.jpg 618w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg-300x171.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />भारत में युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी समस्याएं सिर्फ उदासी या मूड खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका युवाओं की सेहत और जिंदगी पर भी गहरा असर पड़ रहा है।&#160; ऐसे में यब सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि युवाओं &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="353" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg.jpg 618w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/05/jkgkjg-300x171.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>भारत में युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी समस्याएं सिर्फ उदासी या मूड खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका युवाओं की सेहत और जिंदगी पर भी गहरा असर पड़ रहा है।&nbsp;</p>



<p>ऐसे में यब सवाल पूछना जरूरी हो जाता है कि युवाओं में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं के पीछे क्या कारण हैं। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने&nbsp;<em><strong>डॉ. कुणाल बहरानी</strong></em>&nbsp;(चेयरमैन एंड ग्रुप डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी, यथार्थ हॉस्पिटल्स) से बात की। आइए जानें इस बारे में डॉक्टर क्या बताते हैं।&nbsp;&nbsp;</p>



<h3 class="wp-block-heading">पढ़ाई का दबाव और न्यूरोलॉजिकल स्ट्रेस</h3>



<p>भारतीय समाज में करियर को लेकर उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं, नंबर लाने का दबाव और परिवार की उम्मीदें टीनएजर्स में क्रॉनिक स्ट्रेस को जन्म दे रही हैं। जब कोई युवा लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो उसके शरीर में कोर्टिसोल नाम के स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है।&nbsp;</p>



<p>न्यूरोलॉजी के अनुसार, कोर्टिसोल बढ़ने से दिमाग की याद रखने, नई चीजें सीखने और भावनाओं को कंट्रोल करने की क्षमता को नुकसान पहुंचता है।</p>



<p><strong>डिजिटल दुनिया का मायाजाल<br></strong>आजकल युवाओं का ज्यादा समय रील्स और शॉर्ट्स देखते हुए बीतता है। इस डिजिटल हाइपरकनेक्टिविटी ने हमारे दिमाग के काम करने के तरीके को बदल दिया है। स्क्रीन पर मिलने वाले हर लाइक और नोटिफिकेशन से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है।</p>



<p>इस वजह से युवाओं को स्क्रीन की लत लग जाती है, जो बाद में चिड़चिड़ापन, ध्यान न लगना, नींद की कमी और सिरदर्द जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं में बदल जाती है।</p>



<p><strong>अकेलेपन को बढ़ावा देती शहरी लाइफस्टाइल<br></strong>बड़े शहरों में पढ़ाई और नौकरी के लिए युवाओं का पलायन तेजी से बढ़ा है। नए शहरों में जाकर युवा अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। ऑफिस में कड़ा मुकाबला, नौकरी जाने का डर और आर्थिक असुरक्षा उनके भीतर एंग्जायटी और डिप्रेशन को बढ़ा रही है।</p>



<p><strong>फ्रंटल लोब पर असर<br></strong>कम उम्र में निकोटीन, शराब या ड्रग्स का इस्तेमाल दिमाग के विकास को रोक देता है। यह स्थिति खासतौर से फ्रंटल लोब को प्रभावित करती है, जो हमारे फैसले लेने की क्षमता को संभालता है।</p>



<p><strong>सामाजिक संकोच और लोक-लाज<br></strong>आज भी भारत में मानसिक बीमारी को एक कलंक या कमजोरी माना जाता है। युवा इस डर से मदद नहीं मांगते कि समाज या परिवार क्या सोचेगा। इसका नतीजा यह होता है कि मानसिक तनाव अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है और शरीर में चक्कर आने, हर समय थकान रहने, भूलने की बीमारी या तेज सिरदर्द के रूप में बाहर आता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन और एंग्जायटी का रूप ले लेता है।</p>
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