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	<title>धर्म &#8211; Live Halchal</title>
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	<title>धर्म &#8211; Live Halchal</title>
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		<title>स्वर्ग से अमृत लाने वाले गरुड़ कैसे बने भगवान विष्णु के वाहन?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Sep 2026 05:12:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[भगवान विष्णु]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="473" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg 626w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3-300x230.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को एक अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन किया गया है। अठारह महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को सुनाया गया था। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ हैं। हिंदू धर्म में प्रभु &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="473" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3.jpg 626w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/3-300x230.jpg 300w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>हिंदू धर्म में गरुड़ पुराण को एक अधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इसमें व्यक्ति की मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन किया गया है। अठारह महापुराणों में से एक गरुड़ पुराण स्वयं जगत के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ को सुनाया गया था। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ हैं।</p>



<p>हिंदू धर्म में प्रभु के वाहन को शक्ति, गति, निष्ठा और धर्म का प्रतीक माना जाता है। क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु ने गरुड़ को अपना वाहन क्यों बनाया? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके पीछे की वजह के बारे में विस्तार से बताते हैं।</p>



<p><strong>गरुड़ कैसे बने विष्णु जी के वाहन?<br></strong>पौराणिक कथा के अनुसार, गरुड़ की माता का नाम विनता था। वे नागों की माता कद्रू की दासी थीं। कद्रू ने गरुड़ से कहा कि अगर तुम मेरे पुत्रों के लिए स्वर्ग से अमृत ला दोगे, तो तुम्हारी माता दासत्व से मुक्त हो जाएंगी।</p>



<p>समुद्र मंथन से देवताओं ने असुरों से जो अमृत कलश प्राप्त किया था, उसे गरुड़ देवताओं से छीन लाए थे। इसके पीछे की वजह यह थी कि गरुड़ अपनी माता को नागों की माता कद्रू की दासता से छुटकारा दिलाना चाहते थे। जब गरुड़ स्वर्ग पहुंचे, तो उन्होंने वहां से अमृत का कलश ले लिया। सभी देवताओं ने गरुड़ से अमृत का कलश बचाने के लिए खूब प्रयास किया, लेकिन गरुड़ कलश को लेकर उड़ गए। इसके बाद जब गरुड़ कलश लेकर कद्रू के पास पहुंचे, तो उन्होंने कद्रू से कहा कि मैं कलश ले आया हूं। अब आप मेरी माता को मुक्त कर दें। कद्रू ने अपने वचन के अनुसार विनता को मुक्त कर दिया। इसके बाद देवराज इंद्र अमृत का कलश उठाकर वापस स्वर्ग लोक ले गए।</p>



<p>जब इस बात का पता नागों को चला, तो वे बहुत ही दुखी हुए। अमृत की लालसा में वे उस कुशा को ही चाटने लगे जिस पर कलश रखा गया था। कुशा के तेज किनारों की वजह से उनकी जीभ हमेशा के लिए दो हिस्सों में कट गई।</p>



<p>गरुड़ की मातृभक्ति को देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि पक्षीराज मैं तुम्हारी मातृभक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हूं और चाहता हूं कि तुम मेरे वाहन के रूप में सदैव मेरे साथ रहो। भगवान विष्णु के इस प्रस्ताव को गरुड़ ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। गरुड़ ने कहा कि वे स्वयं को बहुत धन्य मानते हैं और अब से अपना जीवन प्रभु की सेवा में व्यतीत करेंगे। इसी प्रकार गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बने। गरुड़ के वाहन बनने का वर्णन गरुड़ पुराण के आचार खंड में मिलता है।</p>
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		<title>रक्षाबंधन के 5 दिन बाद क्यों मनाई जाती है रक्षा पंचमी?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Sep 2026 05:04:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[रक्षा पंचमी]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="598" height="466" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg 598w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4-300x234.jpg 300w" sizes="(max-width: 598px) 100vw, 598px" />रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प से जुड़ा हुआ है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि राखी के ठीक पांच दिन बाद भी एक खास पर्व मनाया जाता है, जिसे रक्षा पंचमी कहा जाता है? इस साल रक्षा पंचमी 1 सितंबर 2026 यानी आज मंगलवार को मनाई जा रही &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="598" height="466" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4.jpg 598w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/09/4-300x234.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 598px) 100vw, 598px" />
<p>रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के रिश्ते और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प से जुड़ा हुआ है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि राखी के ठीक पांच दिन बाद भी एक खास पर्व मनाया जाता है, जिसे रक्षा पंचमी कहा जाता है? इस साल रक्षा पंचमी 1 सितंबर 2026 यानी आज मंगलवार को मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह दिन भगवान शिव के रौद्र स्वरूप और विशेष रूप से बटुक भैरव की पूजा के लिए जरूरी माना जाता है।</p>



<p><strong>रक्षाबंधन के 5 दिन बाद ही क्यों?<br></strong>रक्षा पंचमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस वजह से इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है। इस साल कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि 1 सितंबर की सुबह करीब 7:42 बजे से शुरू होकर 2 सितंबर की सुबह तक रहेगी। इसी कारण इस बार रक्षा पंचमी 1 सितंबर को मनाई जा रही है।</p>



<p>मान्यता है कि यह पर्व सुरक्षा और संकटों से बचाव की कामना से जुड़ा हुआ है। कुछ परंपराओं में इसे रेखा पंचमी या राख्य पंचमी भी कहा जाता है। खासतौर पर पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में इस दिन का विशेष महत्व है।</p>



<p><strong>इस दिन क्या करें?<br></strong>रक्षा पंचमी पर सुबह स्नान करके भगवान शिव, बटुक भैरव और गणेश जी की पूजा करने का विधान है। घर में सुख-शांति और परिवार की सुरक्षा की कामना से दीपक जलाया जा सकता है। श्रद्धा के अनुसार भगवान को फल, फूल और प्रसाद अर्पित करें।</p>



<p>अगर किसी वजह से रक्षाबंधन के दिन भाई को राखी नहीं बांध पाई हैं, तो कुछ परंपराओं में रक्षा पंचमी के दिन भी राखी बांधने का अवसर माना गया है। हालांकि, यह प्रथा सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं है।</p>



<p><strong>इस दिन क्या नहीं करना चाहिए?<br></strong>आज के दिन किसी के साथ बेवजह विवाद या बहस वाला व्यवहार करने से पूरी तरह से बचें। पूजा-पाठ में मन लगाएं और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। साथ ही, स्थानीय परंपरा और अपने परिवार की मान्यताओं के अनुसार ही पूजा-विधि करें। रक्षा पंचमी और पंचक दो अलग-अलग चीजें हैं। इस साल पंचक 27 अगस्त दोपहर से 1 सितंबर की सुबह तक था, जबकि रक्षा पंचमी पंचमी तिथि पर 1 सितंबर को मनाई जा रही है।</p>
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		<title>मंदिर में रखी ऐसी मूर्तियां बन सकती हैं वास्तु दोष का कारण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Aug 2026 05:40:31 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="511" height="313" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u.png 511w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u-300x184.png 300w" sizes="auto, (max-width: 511px) 100vw, 511px" />हिंदू धर्म में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व है। वास्तु शास्त्र में मंदिर, किचन और बाथरूम आदि से जुड़े नियमों के बारे में बताया गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, मंदिर में रखी मूर्तियों का प्रभाव परिवार की सुख-शांति और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। इसलिए मंदिर में शुभ मूर्तियों को ही विराजमान करना चाहिए। &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="511" height="313" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u.png 511w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/78u-300x184.png 300w" sizes="auto, (max-width: 511px) 100vw, 511px" />
<p>हिंदू धर्म में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व है। वास्तु शास्त्र में मंदिर, किचन और बाथरूम आदि से जुड़े नियमों के बारे में बताया गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, मंदिर में रखी मूर्तियों का प्रभाव परिवार की सुख-शांति और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।</p>



<p>इसलिए मंदिर में शुभ मूर्तियों को ही विराजमान करना चाहिए। माना जाता है कि कुछ मूर्तियों को रखने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और परिवार के सदस्यों को दरिद्रता का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं कि घर के मंदिर में कौन-सी मूर्तियों को नहीं रखना चाहिए।</p>



<p><strong>मंदिर में न रखें ऐसी मूर्तियां<br></strong>खंडित या टूटी हुई मूर्तियां- अगर आपके मंदिर में खंडित या चटकी हुई कोई मूर्ति रखी है, तो उसे आज ही हटा दें। वास्तु शास्त्र के अनुसार, मंदिर में खंडित और चटकी हुई मूर्ति को रखने से वास्तु दोष उत्पन्न होता है, जिसकी वजह से मानसिक तनाव, आर्थिक हानि और पारिवारिक कलह की समस्याएं आ सकती हैं। ऐसी मूर्तियों को किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए।</p>



<p>खड़ी मुद्रा में माता लक्ष्मी- मंदिर में माता लक्ष्मी की खड़ी मुद्रा वाली मूर्ति को विराजमान नहीं करना चाहिए। देवी की इस मुद्रा वाली मूर्ति को मंदिर में रखना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि खड़ी मुद्रा वाली लक्ष्मी जी की मूर्ति रखने से घर में धन टिकता नहीं है, जिसकी वजह से परिवार के लोगों को धन की कमी का सामना करना पड़ सकता है।</p>



<p>शनिदेव और काल भैरव की मूर्ति- इसके अलावा, मंदिर में शनिदेव और काल भैरव की मूर्ति भी नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इन्हें उग्र देवता माना गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर के मंदिर में शनिदेव और काल भैरव की मूर्ति विराजमान करने से पारिवारिक कलह की समस्या बढ़ सकती है।</p>



<p><strong>मंदिर में कौन-सी मूर्ति रखें?<br></strong>घर के मंदिर में अपने इष्टदेव और मुख्य देवी-देवताओं की मूर्तियों को विराजमान करना चाहिए। एक बात का विशेष ध्यान रखें कि मूर्तियों को घर लाने से पहले उन्हें अच्छी तरह देख लें। अगर कोई मूर्ति खंडित या चटकी हुई है, तो उसे मंदिर में विराजमान न करें। इस तरह की मूर्तियों को मंदिर में रखने से शुभ फलों की प्राप्ति नहीं होती है।</p>
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		<title>शनि की साढ़ेसाती और पितृ दोष को दूर करने के लिए किस दिन करें पीपल की पूजा? </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Aug 2026 06:10:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[पितृ दोष]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="314" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-1024x520.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-1024x520.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-300x152.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-768x390.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6.jpg 1050w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ में देवी-देवताओं का वास माना गया है। इसलिए इस पेड़ की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, पीपल के पेड़ की जड़ में भगवान विष्णु, तने में महादेव शिव और शाखाओं में ब्रह्मा जी का वास होता है। धार्मिक मान्यता &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="314" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-1024x520.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-1024x520.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-300x152.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6-768x390.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/87-6.jpg 1050w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ में देवी-देवताओं का वास माना गया है। इसलिए इस पेड़ की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, पीपल के पेड़ की जड़ में भगवान विष्णु, तने में महादेव शिव और शाखाओं में ब्रह्मा जी का वास होता है।</p>



<p>धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीपल की विधिपूर्वक पूजा करने से पितृ दोष, शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव दूर होता है और व्यक्ति के जीवन में सदैव सुख-शांति बनी रहती है। क्या आप जानते हैं कि पीपल के पेड़ की पूजा किस दिन करनी चाहिए और किस नहीं करनी चाहिए। अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि इस पेड़ की पूजा करना किस दिन शुभ माना जाता है।</p>



<p><strong>पूजा के लिए सबसे शुभ दिन<br>शनिवार- </strong>हिंदू धर्म में पीपल की पूजा करने के लिए शनिवार का दिन अधिक शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शनिवार के दिन विधिपूर्वक पेड़ के पास सरसों के तेल का दीपक जलाने और पेड़ की परिक्रमा करने से साढ़ेसाती और पितृ दोष की समस्या दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।</p>



<p><strong>गुरुवार- </strong>गुरुवार का दिन भी पीपल की पूजा करने के लिए लाभकारी माना जाता है। इस दिन पीपल की जड़ में जल अर्पित करने से व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह मजबूत होता है। इससे व्यक्ति के मान-सम्मान और आर्थिक समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन में शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।</p>



<p><strong>अमावस्या- </strong>अमावस्या के दिन भी पीपल की पूजा की जा सकती है। इस दिन सुबह स्नान करने के बाद एक लोटे में जल, थोड़ा कच्चा दूध, गंगाजल और काले तिल मिलाकर पेड़ की जड़ में अर्पित करें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को करने से परिवार के सदस्यों पर पितरों की कृपा बरसती है और जीवन में आने वाले सभी दुख-दर्द दूर होते हैं।</p>



<p><strong>किस दिन न करें पीपल की पूजा?<br></strong>रविवार के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करने और जड़ में जल अर्पित करने की सख्त मनाही है।</p>



<p><strong>पीपल की पूजा में ध्यान रखें ये बातें<br></strong>पीपल के पेड़ की जड़ में हमेशा सूर्योदय के बाद ही जल अर्पित करें।<br>पूजा के दौरान सरसों के तेल का दीपक जलाएं।<br>रविवार के दिन पेड़ की पूजा न करें। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पेड़ पर दरिद्रता की देवी &#8216;अलक्ष्मी&#8217; का वास होता है।<br>पेड़ की जड़ में जल चढ़ाते समय मुख पूर्व या पश्चिम दिशा की तरफ होना चाहिए।</p>
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		<title>कजरी तीज पर चंद्रमा को अर्घ्य देने का महत्व, जानिए चांद को जल चढ़ाने से कैसे मिलता है अखंड सौभाग्&#x200d;य ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Aug 2026 05:53:42 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[कजरी तीज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="378" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27.jpg 863w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27-300x184.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27-768x470.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />कजरी तीज, जिसे कजली तीज या सातुड़ी तीज भी कहा जाता है, सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद पवित्र पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और संतान की खुशहाली की कामना करती हैं निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत में चंद्रदेव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने का &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="378" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27.jpg 863w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27-300x184.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/08/8-27-768x470.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />
<p>कजरी तीज, जिसे कजली तीज या सातुड़ी तीज भी कहा जाता है, सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद पवित्र पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और संतान की खुशहाली की कामना करती हैं निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत में चंद्रदेव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने का विशेष महत्व बताया गया है।</p>



<p><strong>कजरी तीज पर चंद्रमा को अर्घ्य क्यों देते हैं?<br></strong>एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा के अनुसार, शास्त्रों में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। चंद्रदेव शीतलता, सौंदर्य और भावनाओं से जुड़े माने जाते हैं। इसलिए कजरी तीज के दिन चंद्रमा की पूजा करने से मन को शांति और सकारात्मकत ऊर्जा प्राप्&#x200d;त होती है।</p>



<p>भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं। शाम के समय नीमड़ी माता की पूजा करने के बाद रात में चंद्रमा के दर्शन किए जाते हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने और पूजा करने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।</p>



<p><strong>दांपत्य जीवन में आती है मधुरता<br></strong>धार्मिक मान्यता के अनुसार, कजरी तीज पर चंद्रदेव को जल अर्पित करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और मधुरता बनी रहती है। चंद्रमा मन और भावनाओं के कारक माने जाते हैं, इसलिए उनकी पूजा पति-पत्नी के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करने वाली मानी जाती है।</p>



<p>मान्यता है कि चंद्रदेव की कृपा से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और दांपत्य जीवन से जुड़े तनाव कम होते हैं। इसी वजह से सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना करते हुए चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं।</p>



<p><strong>चंद्रमा को अर्घ्य देने की सही विधि<br></strong>कजरी तीज के दिन रात में चंद्रमा के दर्शन होने के बाद एक लोटे में स्वच्छ जल लें। इसमें थोड़ा कच्चा दूध, रोली, अक्षत और दूर्वा मिलाई जा सकती है। इसके बाद चंद्रमा की ओर मुख करके श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें।</p>



<p>अर्घ्य देते समय चंद्रदेव का ध्यान करें और अपनी मनोकामना कहें। इसके बाद चंद्रमा के मंत्रों का जाप करें और पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन तथा परिवार की समृद्धि की प्रार्थना करें।</p>



<p>अत: अलग-अलग जगह पर इस पर्व को लेकर अलग रिवाज होते हैं। यदि आप भी चंद्रमा को अर्घ्&#x200d;य देती हैं, तो ऊपर बताई गई विधि को ध्&#x200d;यान में रखें।</p>
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