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		<title>अष्टमी, नवमी या दशमी, नवरात्र में कब करें कलश विसर्जन?</title>
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		<pubDate>Sun, 18 Oct 2026 05:06:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="371" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4.jpg 826w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4-300x180.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4-768x461.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की भक्ति और आराधना का प्रतीक है। नौ दिनों में भक्त पूरे विधि-विधान से माता रानी की पूजा करते हैं। घरों और मंदिरों में कलश स्थापना की जाती है और नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाकर मां दुर्गा की आराधना की जाती है। नवरात्रि के अंतिम दिनों में भक्तों के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="371" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4.jpg 826w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4-300x180.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-4-768x461.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p>नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की भक्ति और आराधना का प्रतीक है। नौ दिनों में भक्त पूरे विधि-विधान से माता रानी की पूजा करते हैं। घरों और मंदिरों में कलश स्थापना की जाती है और नौ दिनों तक अखंड ज्योत जलाकर मां दुर्गा की आराधना की जाती है। नवरात्रि के अंतिम दिनों में भक्तों के मन में सवाल आता है कि कलश विसर्जन अष्टमी, नवमी या दशमी में से किस दिन करना चाहिए? इस विषय पर हमारी बातचीत उज्&#x200d;जैन के पंडित एवं ज्&#x200d;योतिषाचार्य मनीष शर्मा से हुई। वह कहते हैं, “घरों में नवमी के दिन और मंदिरों में जहां दुर्गा जी की स्&#x200d;थापना हुई होती है वहां दशमी के दिन कलश का विसर्जन करना चाहिए। ” आइए जानते हैं कलश विसर्जन का सही दिन, शुभ मुहूर्त और पूरी विधि।</p>
<p><strong>कलश विसर्जन अष्टमी, नवमी या दशमी में कब करें?<br />
</strong>कई घरों में महानवमी की पूजा, हवन और कन्या पूजन के बाद कलश विसर्जन किया जाता है। वहीं, कुछ जगह पर विजयादशमी यानी दशमी के दिन कलश और जवारे का विसर्जन करते हैं। अष्टमी के दिन कलश विसर्जन करना जरूरी नहीं है। इस दिन मुख्य रूप से मां महागौरी की पूजा, कन्या पूजन और हवन किया जाता है। हालांकि, जो लोग अष्&#x200d;टमी को ही व्रत का पारण कर लेते हैं, वो कलश और जवारों का विर्सजन भी कर देते हैं। पंडित मनीष जी कहते हैं, “सबसे अच्&#x200d;छा तो होता है कि नवरात्र की नवमी तिथि पर कलश का विसर्जन हो, मगर घरों में जैसे परंपरा चली आ रही है, उसके आधार पर भी तय कर सकते हैं। “</p>
<p><strong>शारदीय नवरात्र 2026 में नवमी की तिथि और मुहूर्त<br />
</strong>शारदीय नवरात्र 2026 में महानवमी 19 अक्टूबर को मनाई जाएगी। नवमी तिथि 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर समाप्त होगी।</p>
<p>19 अक्टूबर को नवमी पूजा, हवन और कन्या पूजन का शुभ समय सुबह 10 बजकर 53 मिनट से दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक बताया गया है। भक्त इस दौरान मां दुर्गा की पूजा कर सकते हैं और कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद ले सकते हैं। इसके बाद आप कलश विसर्जन कर सकते हैं।</p>
<p><strong>दशमी के दिन कलश विसर्जन का शुभ समय<br />
</strong>विजयादशमी का पर्व 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन मां दुर्गा की विदाई और कलश विसर्जन किया जा सकता है। पंचांग के अनुसार दशमी के दिन सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक शुभ समय बताया गया है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। दुर्गा विसर्जन के लिए दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से 3 बजकर 30 मिनट तक का समय भी अच्&#x200d;छा रहेगा है।</p>
<p><strong>कलश विसर्जन की सही विधि<br />
</strong>कलश विसर्जन करते समय साफ-सफाई और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसकी सामान्य विधि इस प्रकार है।</p>
<p>सबसे पहले माता रानी के सामने दीपक जलाएं और फूल, फल, मिठाई तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। मां दुर्गा से परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की प्रार्थना करें।<br />
माता की आरती करें और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें। इसके बाद परिवार के सभी सदस्यों को प्रसाद दें।<br />
पूजा पूरी होने के बाद कलश के ऊपर रखा नारियल और अन्य पूजन सामग्री श्रद्धापूर्वक हटाएं। नारियल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है।<br />
कलश में रखे जल को पवित्र माना जाता है। इसे आम के पत्तों की सहायता से घर में छिड़क सकते हैं। चाहें तो पौधों में भी डाल सकते हैं।<br />
जवारे को सम्मानपूर्वक उठाएं। इन्हें किसी स्वच्छ और उपयुक्त स्थान पर मिट्टी में प्रवाहित या विसर्जित करें। नदी में विसर्जन करते समय पर्यावरण और स्थानीय नियमों का ध्यान रखें।</p>
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		<title>बजरंगबली के हाथ में वज्र और ध्वजा क्यों? हनुमान चालीसा की इस चौपाई से समझें इसका रहस्य</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 04:48:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[हनुमान चालीसा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="352" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg 1011w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4-300x171.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4-768x438.jpg 768w" sizes="(max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा को सबसे लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक माना जाता है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से हर प्रकार का अज्ञात भय, असुरक्षा और मृत्यु का डर दूर होता है। साथ ही हनुमान जी की कृपा &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="352" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4.jpg 1011w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4-300x171.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/67-4-768x438.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p class="wp-block-paragraph">हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा को सबसे लोकप्रिय स्तोत्रों में से एक माना जाता है। इसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सच्चे मन से हनुमान चालीसा का पाठ करने से हर प्रकार का अज्ञात भय, असुरक्षा और मृत्यु का डर दूर होता है। साथ ही हनुमान जी की कृपा से जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।</p>
<p class="wp-block-paragraph">वैसे तो हनुमान चालीसा की सभी चौपाइयों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन एक ऐसी चौपाई है जिससे यह संदेश मिलता है कि अपार शक्ति होने के बावजूद मनुष्य के भीतर ज्ञान और पवित्रता का होना ही उसे महान बनाता है। इस बात को जानकर आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि आखिर वह कौन-सी चौपाई है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको विस्तार से उस चौपाई और उसके हिंदी अर्थ के बारे में बताते हैं।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>हाथ बज्र और ध्वजा विराजे।<br />
कांधे मूंज जनेऊ साजै॥</strong></p>
<p class="wp-block-paragraph">हनुमान चालीसा की इस चौपाई का हिंदी अर्थ है कि बजरंगबली के एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में ध्वजा सुशोभित है। वहीं, उनके कंधे पर मूंज (एक प्रकार की पवित्र घास) से बना हुआ जनेऊ सजा हुआ है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>शब्दों के अनुसार अर्थ<br />
</strong>हाथ- हाथों में<br />
बज्र- वज्र (शक्तिशाली अस्त्र)<br />
ध्वजा- पताका<br />
विराजे- सुशोभित है<br />
कांधे- कंधे पर<br />
मूंज- एक प्रकार की पवित्र घास<br />
जनेऊ- यज्ञोपवीत<br />
साजै- सजा हुआ है</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>चौपाई का महत्व<br />
</strong>आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस चौपाई में हनुमान जी की शक्ति, भक्ति और ज्ञान का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है। हनुमान जी के हाथ में वज्र बुराई और संकटों के नाश का प्रतीक है। इस चौपाई में बताया गया है कि प्रभु बेहद शक्तिशाली हैं, जो अपने भक्तों और धर्म की रक्षा के लिए कठोर से कठोर प्रहार कर सकते हैं। कंधे पर जनेऊ धारण करना यह दर्शाता है कि बजरंगबली सिर्फ एक योद्धा ही नहीं हैं, बल्कि वेदों के ज्ञाता, परम विद्वान और अखण्ड ब्रह्मचारी भी हैं।</p>
<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यता के अनुसार, मंगलवार या शनिवार के दिन हनुमान चालीसा की इस चौपाई का पाठ करने से व्यक्ति के मन का हर प्रकार का डर दूर होता है और सुख-समृद्धि व आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इसके अलावा, किसी नए काम की शुरुआत करने या परीक्षा से पहले इस चौपाई का पाठ करने से कार्यों में निश्चित सफलता प्राप्त होती है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>मन की अशांति और दुखों से छुटकारा दिलाएगी अष्टावक्र गीता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2026 04:46:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[अष्टावक्र गीता]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="325" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3.jpg 966w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3-300x158.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3-768x404.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />जीवन में कई बार मन अशांत हो जाता है और छोटी-छोटी बातें भी बड़ा दुख दे जाती हैं। भागदौड़, इच्छाएं, रिश्तों में उलझन और खुद से उम्मीदें हमें भीतर से थका देती हैं। ऐसे समय में बाहर की दुनिया को बदलना हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी सोच को समझना और संभालना जरूर संभव &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="325" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3.jpg 966w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3-300x158.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/56-3-768x404.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p class="wp-block-paragraph">जीवन में कई बार मन अशांत हो जाता है और छोटी-छोटी बातें भी बड़ा दुख दे जाती हैं। भागदौड़, इच्छाएं, रिश्तों में उलझन और खुद से उम्मीदें हमें भीतर से थका देती हैं। ऐसे समय में बाहर की दुनिया को बदलना हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपनी सोच को समझना और संभालना जरूर संभव है। अष्टावक्र गीता इसी यात्रा का मार्ग दिखाती है।</p>
<p class="wp-block-paragraph">तो चलिए आज हम अष्टावक्र गीता की 5 ऐसी अनमोल सीखों के बारे में जानेंगे, जो बुरी बात को भी अच्छे में बदलने का नजरिया देती हैं और मन को शांति की ओर ले जाती हैं।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>तुम शरीर नहीं, बल्कि उसे देखने वाली चेतना हो<br />
</strong>अष्टावक्र गीता हमें सिखाती है कि हम केवल अपना शरीर या मन नहीं हैं। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है और मन में हर पल नए विचार आते-जाते रहते हैं। कभी खुशी होती है, तो कभी दुख। कभी मन शांत रहता है, तो कभी बेचैन हो जाता है। लेकिन इन सभी अनुभवों को देखने वाला हमारे भीतर मौजूद रहता है। जब हम खुद को अपने विचारों और भावनाओं से अलग समझने लगते हैं, तो उनके कारण होने वाली परेशानी कम हो सकती है। इसलिए जब मन में गुस्सा, डर या दुख आए, तो तुरंत उसमें उलझने के बजाय उसे समझने की कोशिश करें। याद रखें, विचार आपके भीतर आते हैं, लेकिन हर विचार आपकी पहचान नहीं है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>सुख और दुख का संबंध हमारी सोच से है<br />
</strong>हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हमारी इच्छाएं पूरी हो जाएं, लोग हमारी बात मान लें और जीवन हमारी उम्मीदों के अनुसार चले, तो हम हमेशा खुश रहेंगे। लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इसी तरह, जब परिस्थितियां हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं होतीं, तो मन दुखी हो जाता है। अष्टावक्र गीता हमें अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं को समझने की प्रेरणा देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में कुछ चाहना गलत है, बल्कि अपनी खुशी को हर इच्छा की पूर्ति पर निर्भर नहीं बनाना चाहिए।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>जीवन से भागें नहीं<br />
</strong>अक्सर हम अपने रिश्तों, धन, सफलता और लोगों की राय से इतना जुड़ जाते हैं कि उन्हें खोने का डर हमें परेशान करने लगता है। हम चाहते हैं कि हर व्यक्ति हमारे अनुसार व्यवहार करे और जीवन हमेशा हमारी इच्छा के मुताबिक चले। लेकिन संसार में बदलाव लगातार होता रहता है। अष्टावक्र गीता का संदेश है कि किसी भी चीज से अत्यधिक लगाव हमें मानसिक बंधन में डाल सकता है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>अहंकार छोड़ें और मन को हल्का बनाएं<br />
</strong>हमारे दुखों का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम हर समय खुद को सही साबित करना चाहते हैं। कोई हमारी आलोचना कर दे, हमारी बात न माने या हमें सम्मान न दे, तो मन में गुस्सा पैदा होने लगता है। हम बार-बार उसी घटना के बारे में सोचते रहते हैं और अपनी शांति खो देते हैं। अष्टावक्र गीता हमें अहंकार से ऊपर उठने का संदेश देती है। जब हम हर बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाना छोड़ देते हैं, तब जीवन सरल होने लगता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अपना सम्मान छोड़ दें, बल्कि यह समझें कि हर बहस जीतना जरूरी नहीं और हर व्यक्ति से प्रशंसा पाना भी आवश्यक नहीं है। कभी-कभी चुप रहना, गलती स्वीकार करना और दूसरों को समझना ही मन की सच्ची शांति है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>शांति बाहर नहीं, अपने भीतर खोजें<br />
</strong>हम अक्सर सोचते हैं कि जब हमें अच्छी नौकरी, अधिक पैसा, सफलता और लोगों का प्यार मिलेगा, तभी जीवन में शांति आएगी। लेकिन बाहरी उपलब्धियां मिलने के बाद भी मन में खालीपन रह सकता है। अष्टावक्र गीता का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए स्वयं को केवल अपनी उपलब्धियों, असफलताओं और सामाजिक पहचान तक सीमित न समझें। आप अपनी गलतियों से कहीं अधिक हैं और आपकी कीमत केवल इस बात से तय नहीं होती कि दुनिया आपको किस नजर से देखती है। कुछ समय शांत बैठें, अपने विचारों को देखें और वर्तमान क्षण को स्वीकार करना सीखें।</p>
<p class="wp-block-paragraph">अत: मन की शांति पाने के लिए हर बार दुनिया को बदलना जरूरी नहीं है। कई बार अपनी सोच, इच्छाओं, आसक्ति और अहंकार को समझना ही बदलाव की शुरुआत बन जाता है। जब हम विचारों को बिना उलझे देखना, परिस्थितियों को स्वीकार करना और अपने भीतर झांकना सीखते हैं, तब दुखों का प्रभाव कम होने लगता है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>शरद पूर्णिमा पर 16 कलाओं से पूर्ण क्यों होता है चंद्रमा?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 04:33:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="317" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg 934w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2-300x154.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2-768x394.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />हिंदू धर्म में आश्विन माह की शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) का विशेष महत्व है। इसे वर्ष की सबसे पवित्र और शुभ पूर्णिमा माना जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। इस दिन देवी लक्ष्मी की साधना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और धन लाभ के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="317" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2.jpg 934w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2-300x154.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/43-2-768x394.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p class="wp-block-paragraph">हिंदू धर्म में आश्विन माह की शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) का विशेष महत्व है। इसे वर्ष की सबसे पवित्र और शुभ पूर्णिमा माना जाता है। इस अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व है। इस दिन देवी लक्ष्मी की साधना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और धन लाभ के योग बनते हैं।</p>
<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और अमृत की वर्षा होती है। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे खीर रखी जाती है और सुबह उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इससे व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से क्यों परिपूर्ण रहता है और इसका क्या धार्मिक महत्व है? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>चंद्रमा की 16 कलाओं का महत्व<br />
</strong>धार्मिक मान्यता है कि पूरे वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा की रात ही चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से पूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे करीब होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चंद्रमा की 16 कलाएं उसकी 16 अलग-अलग अवस्थाओं को दर्शाती हैं। जिस तरह से सूर्य से 7 तरह की किरणें निकलती हैं, उसी तरह से चंद्रमा से भी 16 अलग-अलग तरह की किरणें निकलती हैं। इन्हीं 16 किरणों को चंद्रमा की 16 कलाएं कहा जाता है।</p>
<p class="wp-block-paragraph">भगवान श्रीराम 12 कलाओं से युक्त थे और श्रीकृष्ण को भी 16 कलाओं का पूर्ण अवतार माना गया है। ऐसी मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणें व्यक्ति के मानसिक तनाव और क्रोध को कम करती हैं। इस रात जागरण और पूजा-पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही मन एकाग्र होता है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>चंद्रमा की 16 कलाओं के नाम<br />
</strong>अमृता<br />
मनदा (विचार)<br />
पुष्प (सौंदर्य)<br />
पुष्टि (स्वस्थता)<br />
तुष्टि (इच्छापूर्ति)<br />
ध्रुति (विद्या)<br />
शाशनी (तेज)<br />
चंद्रिका (शांति)<br />
धरा<br />
कांति (कीर्ति)<br />
ज्योत्सना (प्रकाश)<br />
श्री (धन)<br />
प्रीति (प्रेम)<br />
अंगदा (स्थायित्व)<br />
पूर्ण (पूर्णता अर्थात कर्मशीलता)<br />
पूर्णामृत (सुख)</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>कब है शरद पूर्णिमा 2026<br />
</strong>शरद पूर्णिमा की तिथि की शुरुआत- 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट<br />
शरद पूर्णिमा की तिथि का समापन- 26 अक्टूबर को सुबह 09 बजकर 41 मिनट<br />
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>दशहरे पर &#8216;नीलकंठ&#8217; पक्षी का दिखना क्यों माना जाता है शुभ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Live Halchal Web_Wing]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2026 04:28:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अध्यात्म]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[नीलकंठ]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="618" height="386" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-1024x640.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-1024x640.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-300x188.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-768x480.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5.jpg 1062w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" />इस साल शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) 11 अक्तूबर 2026, रविवार से शुरू हो चुकी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा को समर्पित इस 9 दिवसीय पर्व का समापन 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के मौके पर होगा। पंचांग के हिसाब से हर वर्ष अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="618" height="386" src="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-1024x640.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-1024x640.jpg 1024w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-300x188.jpg 300w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5-768x480.jpg 768w, https://livehalchal.com/wp-content/uploads/2026/10/12-5.jpg 1062w" sizes="auto, (max-width: 618px) 100vw, 618px" /><p class="wp-block-paragraph">इस साल शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) 11 अक्तूबर 2026, रविवार से शुरू हो चुकी है। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा को समर्पित इस 9 दिवसीय पर्व का समापन 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के मौके पर होगा।</p>
<p class="wp-block-paragraph">पंचांग के हिसाब से हर वर्ष अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा (Dussehra 2026) का पर्व मनाया जाता है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसी दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण का वध किया।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>दशहरा पर नीलकंठ पक्षी देखने का महत्व<br />
</strong>दशहरा को लेकर हिंदू मान्यता है कि इस दिन एक खास पक्षी के दर्शन होना अत्यंत शुभ माना गया है। इस पक्षी का नाम ‘नीलकंठ’ है।</p>
<p class="wp-block-paragraph">धार्मिक मान्यता है कि इस पक्षी को भगवान शिव से जुड़ा माना जाता है। हिंदू धर्म में नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना अत्यंत शुभ माना गया है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>दशहरे पर नीलकंठ पक्षी देखना क्यों माना जाता है शुभ?<br />
</strong>एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना भाग्यशाली और विजय का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे मुख्य धार्मिक मान्यताएं इस प्रकार हैं-</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>श्रीराम और रावण विजय की कथा<br />
</strong>पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण पर विजय पाने के लिए भगवान श्रीराम ने नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसके पश्चात ही उन्हें रावण पर विजय प्राप्त हुई थी।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>भगवान शिव का स्वरूप<br />
</strong>नीलकंठ पक्षी को भगवान शिव का प्रतिनिधि या स्वरूप माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब शिवजी ने विषपान किया था, तब उनका कंठ नीला हो गया था और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए थे।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>पाप मुक्ति और सफलता<br />
</strong>माना जाता है कि दशहरे के दिन इस पक्षी के दर्शन करने से वर्षभर के पाप नष्ट होते हैं और कार्यक्षेत्र में सफलता व प्रगति मिलती है।</p>
<p class="wp-block-paragraph"><strong>प्रचलित पौराणिक कथा क्या कहती है?<br />
</strong>पौराणिक कथा के मुताबिक, दशहरे के मौके पर अगर नीलकंठ पक्षी के दर्शन हो जाए तो समझिए आपके सभी पाप मिट जाते हैं। दशहरे के दिन इस पक्षी को देखना किसी वरदान से कम नहीं है।</p>
<p class="wp-block-paragraph">इस पक्षी के दर्शन से जीवन में सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं। हिंदू धर्म ग्रंथों के मुताबिक, जब भगवान राम ने रावण का अंत किया था, तो उनपर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा था।</p>
<p class="wp-block-paragraph">इसी दौरान भगवान शिव ने नीलकंठ पक्षी का रूप लिया था। कहा जाता है कि जब भगवान राम ने नीलकंठ पक्षी को देखा तो उनके सभी पाप खत्म हो गए।</p>
<p class="wp-block-paragraph">तभी से लेकर आज तक यह माना जाता है कि दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि अगर ये पक्षी आपको नहीं दिखे तो आप तस्वीर देखकर भी आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।</p>
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